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यूपी टीईटी के करोड़ों का नहीं मिल रहा हिसाब

Tue, 27 Nov 2012 11:42 AM IST
लखनऊ/ब्यूरो
लखनऊ/ब्यूरो Updated Tue, 27 Nov 2012 11:42 AM IST
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financial irregularity may be in up tet

अध्यापक पात्रता परीक्षा (टीईटी)-2011 के पैसों का हिसाब नहीं मिल पा रहा है। बेसिक शिक्षा विभाग पिछले तीन महीनों से लगातार पत्राचार कर रहा है कि टीईटी फार्म भरने वालों से मिले पैसे का हिसाब कर दिया जाए। यह बताया जाए कि परीक्षा कराने पर कितने खर्च हुए और अभी कितना बचा हुआ है, लेकिन माध्यमिक शिक्षा विभाग है कि हिसाब देने को तैयार नहीं है।

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कहा तो यह भी जा रहा है कि टीईटी के पैसों का पूरा हिसाब नहीं मिल रहा है। तत्कालीन माध्यमिक शिक्षा निदेशक जेल में हैं और उस समय की सचिव माध्यमिक शिक्षा परिषद प्रभा त्रिपाठी कुछ भी स्पष्ट नहीं बता पा रही हैं। इसके चलते माध्यमिक शिक्षा परिषद बेसिक शिक्षा विभाग को बचे हुए पैसे का हिसाब नहीं दे पा रहा है।
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यूपी में वर्ष 2011 में पहली बार टीईटी आयोजित कराई गई थी। बेसिक शिक्षा विभाग से आयोजित होने वाली परीक्षा  माध्यमिक शिक्षा विभाग को सौंप दी गई थी। उस समय टीईटी के लिए करीब 14 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किए। सामान्य और पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों से 500 और अनुसूचित जाति व जनजाति से 250 रुपये परीक्षा शुल्क लिया गया।
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माध्यमिक शिक्षा विभाग को इससे करीब 16 करोड़ रुपए की आय हुई। जानकारों का कहना है कि परीक्षा कराने के लिए प्रत्येक मंडलों को 30 से 32 लाख रुपए दिए गए। इस हिसाब से इसके आयोजन पर करीब 5 करोड़ 75 लाख रुपए के आसपास खर्च हुआ। इसके अलावा परीक्षा का रिजल्ट तैयार करने वाली कंप्यूटर कंपनी को करीब 5 करोड़ रुपए दिए जाने की बात प्रकाश में आई है। इसके अलावा अन्य पैसे कहां गए इसका पता नहीं चल रहा है। इस संबंध में माध्यमिक शिक्षा विभाग के अधिकारी चुप्पी साधे हुए है।

प्रमुख सचिव बेसिक शिक्षा सुनील कुमार ने माध्यमिक शिक्षा विभाग को सितंबर 2012 में पहला पत्र लिखा कि टीईटी के आयोजन की जिम्मेदारी परीक्षा नियामक प्राधिकारी को सौंप दी गई है। इसलिए टीईटी 2011 के आयोजन के बाद जो पैसा बचा है, उसे परीक्षा नियामक प्राधिकारी को सौंप दिया जाए। प्रमुख सचिव के इस पत्र के बाद भी टीईटी के पैसों का हिसाब नहीं दिया जा रहा है। बेसिक शिक्षा विभाग ने इस संबंध में पुन: माध्यमिक शिक्षा विभाग को पत्र लिखा है कि पैसा वापस कर दिया जाए।

शिक्षक बनने वालों का फंसा 70 लाख
माया सरकार ने वर्ष 2011 में शिक्षक भर्ती के लिए आवेदन निकाले थे। इसके लिए 2 लाख से अधिक टीईटी पास बीएड डिग्रीधारकों ने आवेदन किया था। एक-एक अभ्यर्थियों ने चार से पांच जिलों में आवेदन किए थे। इससे राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र (एससीईआरटी) को 70 लाख रुपए मिले थे। टीईटी के विवादों के चलते शिक्षकों की भर्ती नहीं हो पाई।


प्रदेश में सत्ता बदलने के बाद अखिलेश सरकार ने कहा था कि शिक्षक भर्ती के लिए आवेदन करने वालों का पैसा वापस किया जाएगा, लेकिन इसका भी कुछ नहीं हुआ। राज्य सरकार शिक्षकों की न तो भर्ती कर रही है और न ही बीएड डिग्रीधारकों का जमा पैसा वापस कर रही है।

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