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भ्रूण हत्या के मुकदमों को 6 माह में निपटाएं अदालतें

Mon, 04 Mar 2013 09:19 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Mon, 04 Mar 2013 09:19 PM IST
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देश में कन्या भ्रूण हत्या पर अंकुश लगाने के लिए सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश देते हुए कहा कि लंबित मुकदमों का निपटारा हर हाल में छह माह के अंदर किया जाए।

साथ ही उसने निर्देश दिए हैं कि कन्या भ्रूण हत्या में शामिल चिकित्सा केंद्रों की मशीनें भी जब्त की जाएं।

जस्टिस केएस राधाकृष्णन और जस्टिस दीपक मिश्र की पीठ ने कहा कि प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण कानून (पीएन एंड पीएनडीटी एक्ट, 1994) के तहत केंद्रीय और राज्य स्तर के बोर्डों की जिम्मेदारी है कि वह कन्या भ्रूण की पहचान करने वाले केंद्रों की निगरानी रखें। मगर यह बोर्ड अपना फर्ज निभाने में नाकाम रहे हैं।

अधिनियम के प्रावधानों का सख्ती से पालन करने के लिए यह बोर्ड हर छह माह में कम से कम से एक बार अपनी बैठक करेंगे। राज्य सलाहकार समिति और जिला सलाहकार समिति कानून का उल्लंघन करने वाले चिकित्सा केंद्रों और क्लीनिकों पर निगाह रखेगी और इस संबंध में सूचनाएं एकत्र करेंगी।
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सर्वोच्च अदालत ने कहा कि कानून का उल्लंघन करने वाले केंद्रों की मशीनें और रिकॉर्ड सील करने के लिए कदम उठाए जाएंगे। कन्या भ्रूण हत्या में लिप्त लोगों के खिलाफ अदालत में आरोप निर्धारित होने तथा दोषी ठहराए जाने पर राज्य के मेडिकल काउंसिल को सूचित किया जाए।
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इस अपराध में शामिल डॉक्टरों का लाइसेंस रद्द करने के लिए कदम उठाए जाएं। इनफर्टिलटी सेंटर आदि अपना रिकॉर्ड रखें और जिला सलाहकार समिति इस पर नजर रखे।

जिला और राज्य सलाहकार समिति यह सुनिश्चित करे कि अल्ट्रा सोनोग्राफी मशीनों का कारोबार करने वाले व्यापारी सिर्फ पंजीकृत चिकित्सा केंद्रों को ही मशीनें बेचे।

तीन महीने के अंदर सभी पंजीकृत और गैर-पंजीकृत अल्ट्रा सोनोग्राफी सेंटरों का पता लगाया जाए। इस संबंध में वर्कशॉप आदि के जरिए जागरूकता पैदा की जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि समाज का संभ्रात वर्ग इस बुराई में शामिल है। शिक्षित मध्यम वर्ग इस अपराध की गंभीरता को नहीं समझ रहा है। कन्या भ्रूण हत्या में शामिल डायग्नोस्टिक सेंटरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती।


यहां तक जब्त मशीनों को बाद में रिलीज कर दिया जाता है। कुछेक केस दर्ज किए गए हैं लेकिन इनका अंत दोष साबित करने तक नहीं होता। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में एक हजार लड़कों पर छह साल तक की बालिकाओं का औसत अनुपात 914 है जबकि 2001 की जनगणना में यह संख्या 927 था।

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