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मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ ऐसा फतवा कि मच गया बवाल

Sat, 03 Oct 2015 09:18 PM IST
Updated Sat, 03 Oct 2015 09:18 PM IST
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fatwa on Muslim women contesting

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में मुस्लिम महिलाओं के चुनाव लड़ने के खिलाफ फतवे से हलचल मची हुई है। हालांकि कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं और संगठनों ने इस फतवे का विरोध किया है, लेकिन फतवा जारी होने से प्रगतिशील कहे जाने वाले इस राज्य को झटका जरूर लगा है। कोल्हापुर के स्थानीय मौलवियों के संगठन 'मजलिसे शुरा उलेमा ए कोल्हापुर' ने दो दिन पहले एक फतवा जारी किया था।

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इसके अनुसार मुस्लिम महिलाओं का चुनाव लड़ना मुस्लिम धर्म के खिलाफ है। इस संगठन के कई राजनीतिक दलों को पत्र भी लिखा था जिसमें महिलाओं को उम्मीदवारी न देने की गुजारिश की गई थी। कोल्हापुर नगर निगम के चुनाव अगले महीने होने है और लगभग 20-25 महिलाओं के उम्मीदवार बनने की संभावना है।

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फतवे का विरोध

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इस खबर के फैलने के बाद राज्य के प्रगतिशील मुसलमानों ने इस फतवे का कड़ा विरोध किया। मुस्लिम बोर्ड के अध्यक्ष गनी अजरेकर ने कहा कि सभी पार्टियों की ओर से महिला उम्मीदवार बनेंगी और इस फतवे के कारण वे पीछे हटेंगी इसकी कोई गुंजाइश नहीं है। शुक्रवार को मुस्लिम धर्मगुरुओं की एक बैठक हुई जिसमें इस फतवे को अमान्य घोषित किया गया।

हिलाल कमिटी के अध्यक्ष मौलाना मंसूर काज़मी ने कहा, "हम महिलाओं को भारतीय संविधान में दिए गए अधिकारों का सम्मान करते है। महिलाओं को अपने अधिकारों का प्रयोग करना चाहिए।" हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं को इस्लाम की चौखट में रहकर ही राजनीति में सहभाग लेना चाहिए।

धार्मिक कट्टरवाद

fatwa on Muslim women contesting

इस घटना को महाराष्ट्र में बढ़ते हुए धार्मिक कट्टरवाद के रूप में देखा जा रहा है। जिस दिन यह फतवा जारी हुआ उसी दिन नासिक में शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती ने कहा कि मानस सरोवर से पानी लाकर गोदावरी में डालने की मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस की कृति धर्मविरोधी है और इसलिए वे हिंदू नहीं है। उन्होंने कहा कि इसकी वजह से गोदावरी नदी की पवित्रता भंग हुई है।

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सोशल मीडिया पर रोष

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सोशल मीडिया पर भी इस मसले पर चर्चा हो रही है। ट्विटर पर एक यूज़र ने सवाल किया है, ''मुस्लिम समुदाय में महिलाओं का मानवाधिकार कहां है? वे लोकतंत्र का माखौल बना रहे हैं।

'' एक दूसरी यूज़र एरम आगा ने ट्वीट किया, ''मुझे लखनऊ में एक मौलवी की कही बात याद आ गई कि महिलाएं नेता बनने के लिए नहीं बल्कि नेताओं को जन्म देने के लिए बनी हैं।

'' ट्विटर यूजर मनोज ने लिखा, ''मुसलमानों को यह समझना चाहिए कि वे अपने पिछड़ेपन के लिए समान रूप से ज‌िम्मेदार हैं।'' कुछ लोगों ने दादरी की घटना का हवाला देते हुए ट्वीट किया कि धर्मनिरपेक्ष लोग कहां गए, वे इस घटना पर अपनी प्रतिक्रया क्यों नहीं देते?

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