किसानों की किस्मत चमकाएगा अरहर का नया बीज
अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष में भारत के कृषि वैज्ञानिकों ने देश के दलहन संकट का समाधान खोज लिया है। वैज्ञानिकों ने अरहर दाल का ऐसा बीज विकसित किया है, जिससे गेहूं व धान की तरह दालों का बंपर उत्पादन हो सकेगा। इस बीज से पंजाब, बुंदेलखंड, हरियाणा और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे इलाकों में किसानों को लाभ होगा।
एक ओर किसान इस नई उन्नत बीज से एक हेक्टेयर में 20 क्विंटल की फसल 120 दिन में ले सकेंगे जबकि इसकी लागत गेहूं की खेती से भी कम आएगी। कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए भी यह वरदान साबित होगा। दूसरी ओर वैज्ञानिकों ने उन्नत किस्मों के जरिये खेसारी दाल के उत्पादन की राह भी आसान बना दी है।
आईसीएआर के संयुक्त निदेशक अनुसंधान डॉ केवी प्रभु के निर्देशन में वैज्ञानिकों की टीम ने आठ वर्षों के रिसर्च के बाद अरहर की नई किस्म के बीज तैयार किए हैं। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने बताया कि बीज का फील्ड ट्रायल विभिन्न परिस्थिति वाले राज्यों में शुरू कर दिया गया है और अगले दो वर्ष में यह बीज किसानों को उपलब्ध करा दिया जाएगा।
देश दलहन संकट से मुक्त हो जाएगा
प्रभु के अनुसार सब कुछ ठीक रहा, तो जल्द ही देश दलहन संकट से मुक्त हो
जाएगा और किसान कम पानी होने के बावजूद भारी पैदावार कर सकेंगे। खास बात यह
है कि गैर सिंचित और सिंचित दोनों ही इलाकों के लिए बेहतर होगा और किसान
दो फसल ले सकेंगे।
अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष में इसे भारतीय कृषि
वैज्ञानिकों की एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इसके पौधे 92 सेमी तक
होंगे। पौध में फूल व फली एक ही समय में लगेंगे और पक कर तैयार होंगे।
गेहूं के पौधे जैसी लंबाई होने से दवा छिड़काव भी ठीक तरह से होगा और इस
फसल की मात्र दो बार सिंचाई करनी होगी।
जुलाई के प्रथम सप्ताह से लेकर
सितंबर के बीच किसान इसकी बुवाई कर 120 दिन बाद फसल काट लेंगे। वहीं पानी व
नमी वाले इलाकों में पुन: इसकी बुवाई की जा सकेगी। प्रभु के अनुसार पुराने
बीज से फसल 160 से 270 दिन में तैयार होती थी। उसके पौधे भी बड़े पेड़
जैसे हो जाते हैं, जिसके वजह से कीड़े लगने पर दवा का छिड़काव ठीक ढंग से
नहीं हो पाता है। साथ ही, खेत फंसने के कारण किसान वर्ष भर अन्य फसल नहीं
ले पाते थे।
सुरक्षित खेसारी दाल की उन्नत किस्में
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने कम ओडीएपी वाले रतन, प्रतीक और महातेओरा नामक खेसारी दाल की तीन नई किस्में जारी की है।
कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि इन किस्मों में ओडीएपी की मात्रा 0.07 से 0.1 प्रतिशत की सीमा में है जो कि मानवीय उपयोग के लिए सुरक्षित है।
1980 के दशक तक देश में खेसारी लगभग 10 लाख हेक्टेयर में उगाई जाती थी। लेकिन खेसारी में उपलब्ध विषाक्त रसायन ओडीएपी के कारण विभिन्न राज्यों में वर्ष 1961 में खेसारी के व्यापार पर प्रतिबंध लगाया गया था।