महाराष्ट्र के इस इलाके में हजामत नहीं बनवाते किसान, जानें क्यों?
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लातूर के सोनावटी गांव के हज्जाम चंद्रकांत बाबू परेशान हैं। अब उनकी दुकान पर उतने किसान हजामत बनवाने नहीं आते जितने दो साल पहले आते थे।चंद्रकांत का धंधा आधा रह गया है। मराठवाडा के इस गांव में इस साल बारिश सामान्य से आधी हुई है।
सूखे के बावजूद इस साल लोगों ने गन्ना उगाने की कोशिश की ताकि वो पिछले साल के नुकसान की भरपाई कर सकें, मगर हो गया उल्टा। योगेंद्र यादव की संवेदना यात्रा के साथ जब मैं देर रात सोनावटी गांव पहुँचा तो देखा कि चंद्रकांत बाबू की दुकान खुली थी।
पूछा तो पता चला कि चंद्रकांत की दुकान में भी उतना ही सूखा है जितना पडोस के खेत में।वो मुझसे बोले, ''बारिश की वजह से काम नहीं रहा है अब। इनके (किसानों के) खेत में ही काम नहीं है, तो ये लोग कहां से दाढी बनवाने आएंगे।
और कम होती जा रही है बारिश
ये भी खाली बैठे हैं। दाढी बनवाने के लिए पैसा नहीं
है। अगर बनवाते हैं, तो उधार करते हैं। हम भी चार-आठ दिन तक ढकेलते हैं,
सोचते हैं कि चलो आज नहीं तो कल देंगे।''कर्नाटक, तेलंगाना और महाराष्ट्र
से लेकर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा तक, हर जगह इस बात
के सबूत मिलते गए कि बारिश की कमी ने किसान ही नहीं, उससे जुडे हर
पेशे-कारोबार को सुखा डाला है।
चंद्रकांत बताते हैं कि दो साल पहले तक उनकी
दुकान पर रोज औसतन 15 किसान आते थे, अब सिर्फ 7-8 ही आते हैं और उनमें भी
ज्यादातर उधार पर हजामत बनवाते हैं।चंद्रकांत की परेशानी है कि ऐसे हालात
में वो भी उनसे कहें तो क्या कहें। जब फसल कटती है तो उन्हें किसान एक
हिस्सा दे देते हैं, जिसके बदले वो साल भर उनके बाल काटने और हजामत बनाने
का काम करते हैं। जब फसल ही नहीं होगी तो किसान उन्हें क्या देगा।
वह कहते हैं, ''बारिश दो साल से कम है और कम होती जा रही है। खेत में जो माल निकलता है उसी से दाढी बनाने के पैसे देते हैं। ये हमारी परेशानी है न। हम उनको बोलेंगे तो क्या बोलेंगे।''बाल काटने के काम में लगने वाले पानी की कीमत भी उन्हें पहले के मुकाबले ज्यादा देनी पड रही है।
लॉंड्री का धंधा पड़ गया मंदा
सोनावटी का हर
किसान और मजदूर खरीदकर पानी पीता है।15 लीटर पानी के घडे की कीमत है दो
रुपए। चंद्रकांत भी 400 रुपए महीने देकर पानी खरीदते हैं, क्योंकि हजामत
बनाने और ग्राहकों को पिलाने पर 10 लीटर पानी लग जाता है।उनका कहना था,
''रोज 10 लीटर के अंदर पानी इस्तेमाल होता है। दो लीटर तो ग्राहकों के पीने
के लिए काम आता है। दिन में डेढ सौ लीटर पानी लगता है घर, जानवर और दुकान
में। केवल दुकान में ही बिसलेरी का 10 रुपए का पानी लगता है। बिसलेरी की
बोतल है 25 रुपए की, और दाढी बनती है 10 रुपए की।'
'मुझे बीड के गांव
मादलमोही में पहुँचने पर पता चला कि चंद्रकांत बाबू से अच्छी हालत लॉन्ड्री
चलाने वाले भास्कर लक्ष्मण जादव की भी नहीं है।वो कहते हैं कि किसान अब
कपडे धुलवाने नहीं आते। पहले 300 रुपए रोज का काम होता था तो अब डेढ सौ भी
दुकान से मुश्किल से उठा पाते हैं।
नतीजा ये कि तीन बच्चों का पेट भरने और
स्कूल की फीस देने के लिए उनकी पत्नी नंदा भास्कर ने घरों में बर्तन धोने
का काम शुरू कर दिया है। खेती सूखी पडी है तो वो किसान भी उन्हें 300 रुपए
महीने से ज्यादा देने को तैयार नहीं, जिनके यहां वो काम करती हैं।
बेड़ा गर्क होने के कगार पर
संवेदना
यात्रा में शामिल एडवोकेट पीएस शारदा ने खेती से जुडे धंधों और लोगों को
लेकर काफी पडताल की है।उनका कहना था,
''जो-जो लोग किसान की आर्थिक स्थिति
पर निर्भर करते हैं, उनका भी बेड़ा गर्क होने के कगार पर है। किसी का धंधा
आधा हो गया, किसी का 60 फीसदी कम हो गया और जो वर्कर आता है, वह कहता है कि
यहां भी सब भूखे ही हैं। वह भी सोच रहा है कि मैं कहां जाऊं।''
मैंने सुना
है कि जब एक पेड सूखता है तो सिर्फ उसकी पत्तियां ही नहीं सूखतीं, फूल ही
नहीं कुम्हलाते बल्कि उससे जुडी पूरी सृष्टि ही जैसे बांझ हो जाती है।