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बड़े नेता अपने बेटों की कामयाबी में रोड़ा हैं?

Fri, 19 Feb 2016 08:21 PM IST
रशीद किदवई / राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी
रशीद किदवई / राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी Updated Fri, 19 Feb 2016 08:21 PM IST
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Family heads becoming hurdle in the progress of young leaders

कहा जाता है कि एक बात की बात है, तैमूरी वंश का संस्थापक तैमूर लंग मशहूर इतिहासकार और समाजविज्ञानी इब्न खलदून से राजवंशों के मुकद्दर पर चर्चा कर रहा था।

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खलदून ने कहा कि किसी भी राजवंश की शानो-शौकत चार पीढ़ियों के बाद मुश्किल से ही बरकरार रह पाती है। पहली पीढ़ी का ध्यान नए-नए इलाके फतह करने पर रहता है, दूसरी पीढ़ी का ध्यान प्रशासन पर। तीसरी पीढ़ी को न तो नए इलाके फतह करने की चिंता रहती है और न ही प्रशासन की, वो तो सिर्फ अपने पुरखों की जमा की गई दौलत को अपने शौक के लिए उड़ाती है और जो मन में आता है वो करती है।
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इसी का नतीजा होता है कि चौथी पीढ़ी आते आते वो राजवंश आमतौर पर न सिर्फ अपनी पूरी दौलत को उड़ा बैठता है, बल्कि उसके पास इंसानी उर्जा भी नहीं बचती है। इसीलिए जिस प्रकार किसी शाही खानदान का उभार होता है, उसी के साथ उसके पतन की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है। खलदून के मुताबिक, ये एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और इससे बचा नहीं जा सकता है।
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नेहरू गांधी परिवार खलदून की बात को सही साबित कर रहा

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इस बात को अगर समकालीन भारतीय इतिहास के परिवेश में देखें तो महान नेहरू गांधी परिवार खलदून की बात को सही साबित करता प्रतीत होता है। जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गांधी के नजदीकी सहयोगी के तौर पर ब्रितानी राज से भारत को आजादी दिलाने की लड़ाई लड़ी। उन्हें आधुनिक भारत का

निर्माता कहा जाता है। उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने प्रभाव का विस्तार किया, पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध जीता, बांग्लादेश का निर्माण कराया और वो 20वीं सदी की सबसे ताकतवर श‌ख्‍सियतों में से एक बनीं। इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी भी प्रधानमंत्री बने, उन्होंने कई प्रयोग किए और उनकी भारी कीमत भी चुकाई।

नेहरू-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व राहुल गांधी कर रहे हैं और शायद उनके इरादे भी नेक हैं, लेकिन वो कुछ कर नहीं पा रहे हैं, हालांकि ज्यादातर कांग्रेसी उन्हें पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लायक नेता मानते हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ गांधी परिवार की चमक ही कम हो रही है।

रामविलास की परछाईं भी नहीं छू पाए चिराग

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अभिनेता से नेता बने चिराग पासवान को उनके फेसबुक पेज पर पसंद करने वाले भले सैकड़ों लोग हों, लेकिन जूनियर पासवान अपने पिता रामविलास पासवान की परछाईं की बराबरी भी नहीं कर पाए हैं, जो सियासत के माहिर खिलाड़ी रहे हैं।

रामविलास पासवान ने चिराग को लोक जनशक्ति पार्टी के संसदीय बोर्ड का प्रमुख नियुक्त किया है और जब बिहार की जनता ने अपना जनादेश दिया तो उन्हें अपने बेटे की राजनीतिक सूझबूझ का पता चल गया।

लोक जनशक्ति पार्टी ने 42 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन वो सिर्फ दो सीटें ही जीत पाई और उसे सिर्फ 4.8 फीसदी वोट हासिल हुए।

चुनाव से पूर्व विभाजित नजर आ रहा करुणानिधि का कुनबा

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उधर करुणानिधि का कुनबा भी पूरी तरह विभाजित नजर आता है और खासकर तब जब इसी साल मई में तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होने हैं। करुणानिधि के बेटे अलागिरी और स्टालिन, दोनों 60 की उम्र को पार कर चुके हैं और उनकी लड़ाई जगजाहिर है, जिससे नुकसान के सिवा कुछ हासिल नहीं हो रहा है।

अलागिरी को डीएमके से निकाल दिया गया और अब वो चुनावों में डीएमके का खेल बिगाड़ सकते हैं, लेकिन सियासी पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि अलागिरी की हालत पिछले साल बिहार चुनावों में चिराग पासवान से भी बुरी होगी। डीएमके के नजरिए से देखें तो इस साल तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव ‘थलैइवर’(नेता) करुणानिधि के ही इर्द गिर्द घूमेंगे, न कि उनके बेटे स्टालिन के।

हूबहू यही तस्वीर चेन्नई से 2,406 किलोमीटर दूर चंडीगढ़ में नजर आती है जहां प्रकाश सिंह बादल का मुकाबला जाट सिख नेता अमरिंदर सिंह और पंजाब में तेजी से जड़ जमा रही आम आदमी पार्टी से है। ये देखना दिलचस्प होगा कि प्रकाश सिंह बादल और करुणानिधि अपने बेटों सुखबीर सिंह बादल और स्टालिन को लिए बिना, अपने मुश्किल गठबंधनों से बात आगे बढ़ा पाते हैं कि नहीं।

अखिलेश भी मुलायम के सहारे चला रहे राजनीति

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अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री हैं लेकिन स्टालिन और सुखबीर बादल की तरह उन्हें अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के लिए अपने पिता मुलायम सिंह यादव की जरूरत होती है।

मृदुभाषी अखिलेश को उनके पिता सार्वजनिक तौर पर डांटते डपते रहते हैं, लेकिन सूबे की सियासत में अपने कई चाचाओं को काबू करना बेटे के बस की बात नहीं है। चरण सिंह की दमदार विरासत भी उत्तर प्रदेश में तार तार नजर आती है। पिछले आम चुनाव में अजीत सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी, दोनों जाटों का गढ़ कहे जाने वाले बागपत और मथुरा से हार गए।

कांग्रेस पार्टी में ज्यादातर नेताओं के बेटे सिंधिया, पायलट, देवड़ा, प्रसाद जैसे कुलनामों पर सवार हैं और उन्हें अपने पिता के नामों का ही सहारा है। पीवी नरसिंह राव ने जब जितेंद्र सिंह को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया था, तो इसे जित्ती भैया (जितेंद्र प्रसाद) का डिमोशन माना गया था क्योंकि दिल्ली दरबार में तो उन्हें राजनेताओं के बीच राजनेता माना जाता था।

कुछ साल बाद उनके बेटे जितिन उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष के पद के लिए एक विश्वसनीय उम्मीदवार बनने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नेता पुत्रों की फीकी पकड़ती चमक के बीच नवीन पटनायक एक अपवाद नजर आते हैं।  हुमायूं के बाद जैसे अकबर हुआ, उसी तरह नवीन पटनायक अपने पिता बीजू पटनायक से भी आगे निकलते नजर आ रहे हैं। हालांकि उनके पिता अपने समय के एक बड़े नेता थे।

'राहुल के बाधा बन रही हैं सोनिया'

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यहां सवाल पैदा होता है कि राजवंश या सियासी वंश इस तरह नाकाम क्यों हो जाते हैं? क्या ये इब्न खलदुन की कही बात के मुताबिक एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिससे बचा नहीं जा सकता है या फिर कुछ और है? राहुल गांधी, अखिलेश यादव, स्टालिन, सुखबीर बादल और जयंत चौधरी पर नजदीकी नजर डालें तो पता चलता है कि उनके माता-पिता की मौजूदगी और हस्तक्षेप उनकी राजनीतिक संभावनाओं को घटाने में एक अहम कारक साबित हो रहा है।

ऐसे कांग्रेसियों की कोई कमी नहीं है जो मानते हैं कि सोनिया गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बने रहना राहुल गांधी के लिए बाधा बन रहा है और वो संगठन में अपनी सोच को लागू नहीं कर पा रहे हैं। शायद नवीन पटनायक इसलिए कामयाब रहे हैं क्योंकि जब बीजू पटनायक सियासत में सक्रिय थे तो नवीन पटनायक उससे दूर थे और ज्यादातर उनका समय विदेश में बीतता था। राजनीति में कामयाब रहे दो अन्य बेटों, श्यामा चरण और विद्या चरण भी इसी बात को पुख्ता करते हैं।

केंद्रीय प्रांत के पहले मुख्यमंत्री पंडित रवि शंकर शुक्ल के बेटे युवा विद्या एक उभरते हुए उद्योगपित थे, जब उनका मन राजनीति में आने को हुआ। उनके बड़े भाई श्यामा चरण की सियासत में आने की उतनी ही प्रबल इच्छा थी और उन्होंने जवाहर लाल नेहरू और पंडित रवि शंकर से राजनीति में आने की इजाजत मांगी। लेकिन एक बड़े स्वतंत्रता सेनानी रहे रवि शंकर ने उन्हें मना कर दिया।

जब 1956 में उनका देहांत हुआ तो नेहरू विद्या और श्यामा, दोनों को कांग्रेस में ले आए। नेहरू ने विद्या को लोकसभा चुनाव लड़ने की सलाह दी, जबकि श्यामा ने अपने आपको राज्य की राजनीति तक सीमित रखा और दोनों भाई इस विभाजन पर 2000 तक कायम रहे, लेकिन जब छत्तीसगढ़ बना तो विद्या भी राज्य की राजनीति में उतर आए। याद कीजिए वर्ष 1959 को, जब इंदिरा कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं और नेहरू प्रधानमंत्री थे।

इंदिरा गांधी उस समय प्रधानमंत्री नेहरू की नजदीकी सलाहकार थीं लेकिन फिर भी वो राजनीति से दूर रहती थीं और सार्वजिक जीवन की चकाचौंध भी उन्हें अपनी तरफ नहीं खींच पाती थी।

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