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रसातल में कांग्रेस, पतन का जिम्मेदार कौन?

Sat, 22 Feb 2014 05:00 PM IST
रेहान फजल/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
रेहान फजल/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Sat, 22 Feb 2014 05:00 PM IST
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fall of congress in indian politics

पिछले महीने दिल्ली में हुए कांग्रेस अधिवेशन को राहुल गाँधी की ताजपोशी के लिए बुलाया गया था लेकिन आख़िरी क्षणों में आलेख को बदल दिया गया। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा नहीं हुई लेकिन उन्होंने एक जोशीला भाषण देकर कांग्रेसियों को ये जताने की कोशिश की कि अभी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है।

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कांग्रेसी हलकों में उनके इस तेवर को पार्टी में जान फूंकने के एक कदम और अगले चुनाव के लिए रणभेरी फूंकने के तौर पर देखा गया। लेकिन उनके एक आलोचक ने कहा कि ये उसी तरह हुआ जैसे कि 0-4 से पिछड़ी हुई कोई फ़ुटबॉल टीम विजय नृत्य कर रही हो और वो भी तब जब खेल ख़त्म होने में कुछ ही मिनट बचे हों।
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राहुल ने जिस तरह आवाज़ ऊँची कर, आक्रामक भाव भंगिमा से अपनी ही सरकार को आड़े हाथों लिया, उसे मनमोहन सिंह के साथ जुड़ी एंटी इंकंबेंसी से दूरी बनाने और अपने आपको एक 'विद्रोही राजकुमार' के तौर पर पेश करने की कोशिश के तौर पर देखा गया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत कहते हैं कि 'राहुल गाँधी के मीडिया सलाहकारों को लगता है कि उनकी 'एंग्री यंग मैन' की छवि बनाई जाए। किसी दिन दाढ़ी बढ़ा ली जाए। किसी दिन दाढ़ी मुंडा ली जाए लेकिन दाढ़ी बढ़ाकर एंग्री यंग मैन वाली फ़िल्म देखने वाले लोग इस देश में बचे नहीं हैं।'

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राहुल की राजनीति

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प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, "मुझे लगता है कि राहुल गाँधी आज के हिंदुस्तान के नौजवान की दिल की धड़कन या हाथ की नब्ज़ पकड़ने में असफल रहे हैं।" दूसरी तरफ़ दैनिक हिंदुस्तान के संपादक शशि शेखर की राय है,"भारतीय राजनीति में ये पहला मौका नहीं है जब इस तरह का दिखावा किया गया हो। भाजपा और अटल बिहारी वाजपेयी के मतभेदों को याद करिए। राम मंदिर के मुद्दे पर भाजपा कुछ बोलती थी और अटल जी कुछ बोलते थे। राहुल की राजनीति को अचरज से देखने की ज़रूरत नहीं है। ऐसा होता आया है पिछले 65 वर्षों में इस देश में।"

कांग्रेस को रसातल में पहुंचाने में बहुत बड़ी भूमिका उन 'घोटालों' की रही है जिन्होंने इस सरकार को अप्रभावी, पतवारविहीन और भ्रष्ट बना दिया है।

भारत में फ़ाइनेंशियल टाइम्स के पूर्व संवाददाता जॉन इलियट कहते हैं, "मेरा अनुमान है कि सभी मंत्रियों को प्रत्यक्ष कारणों से अपने नीचे कुछ हद तक भ्रष्टाचार पनपने की अनुमति देनी होती है, चाहे वो व्यक्तिगत रूप से ख़ुद भ्रष्ट न हों। लेकिन 2जी और कोयला ब्लॉक आवंटन के मामले में जिस तरह की छूट मनमोहन सिंह ने दी, वो चौंकाने वाली है।"

सोनिया उतनी ही दोषी

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जॉन का कहना है, "मनमोहन सिंह ने अपनी आंखें और दिमाग़ दोनों ही बंद कर लिए और चीज़ें बिगड़ती चली गईं।" इलियट ये भी कहते हैं कि भारत की समस्याओं के लिए सिर्फ़ मनमोहन सिंह को दोषी ठहराना सही नहीं है। वो कभी सरकार के अकेले कर्ताधर्ता नहीं रहे और सोनिया गाँधी के साथ दोहरी ज़िम्मेदारी उठाते रहे।

वे कहते हैं, "आप किसी भी चीज़ के लिए उन्हें दोषी मानें, आपको उसके लिए सोनिया गाँधी को भी दोषी ठहराना होगा।" काग्रेस को नज़दीक से देखने वाले और सोनिया गाँधी की जीवनी लिखने वाले रशीद किदवई जॉन ईलियट से पूरी तरह सहमत हैं। वो कहते हैं, "मेरी राय में मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी दोनों ही दोषी हैं। ये एक अस्थाई व्यवस्था हो सकती थी कि आप किसी को सीईओ की तरह प्रधानमंत्री बना दें लेकिन प्रजातंत्र में प्रधानमंत्री का बहुत बड़ा रोल होता है।"

"ऐसा प्रधानमंत्री जो सालों तक सार्वजनिक जीवन में रहा हो, दो-दो पीएचडी कर चुका हो, उसे ये बात सामने लानी चाहिए था कि उस पर किस तरह का दबाव है। प्रधानमंत्री ने अपनी वैध ताकतों का इस्तेमाल भी नहीं किया। मसलन हमारे देश में न्यायिक सुधारों की कितनी ज़रूरत है, प्रशासनिक सुधारों की कितनी ज़रूरत है। लेकिन मनमोहन सिंह ने ये कहते हुए इन पर कोई पहल नहीं की कि वो राजनीतिक प्रधानमंत्री नहीं हैं।"

मनमोहन, एक ढाल

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दूसरी तरफ़ सोनिया गांधी भी इस बात की दोषी हैं कि उनके रहते कांग्रेस के ही कोर एजेंडे का पालन क्यों नहीं हुआ? भ्रष्टाचार क्यों इतना बढ़ा? मंत्रियों को निकालने में इतनी देरी क्यों हुई? इन तमाम चीज़ों की वजह से दोनों लोग कटघरे में खड़े होते हैं। पुष्पेश पंत भी कहते हैं कि सोनिया गाँधी को जो हुनर है वो यही है कि उन्होंने मनमोहन सिंह को एक प्रभावशाली ढाल की तरह इस्तेमाल किया है। उधर मनमोहन सिंह का ये आलम है कि उन्होंने इस तरह व्यवहार किया है जैसे वो बुत हों।

दैनिक हिंदुस्तान के संपादक शशि शेखर कहते हैं कि लाख ख़राबियों के बावजूद कांग्रेस को सबसे ज़्यादा नुकसान सत्ता में रहने की वजह से हो रहा है।

शशि शेखर की राय में, "यह कहना ग़लत है कि उन्होंने मोदी को वॉकओवर दे दिया है। ये बात अलग है कि मोदी बहुत सुनियोजित तरीके से अपना प्रचार कर रहे हैं। लेकिन हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस पार्टी दस साल से सत्ता में हैं और लोगों को फ़टीग हो जाता है देखते देखते। एंटी इंकंबेंसी एक हक़ीकत है जिसका लाभ मोदी उठा रहे हैं।"

पारिवारिक जागीर

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यूँ तो कांग्रेस के संभावित पतन के कई कारण गिनाए जा रहे हैं लेकिन पुष्पेश पंत इसके लिए सिर्फ़ इस बात को ज़िम्मेदार मानते हैं कि कांग्रेस अब एक राजनीतिक दल नहीं रह गया है बल्कि अब वो सामंतशाही, पारिवारिक दुकान या जागीर बन कर रह गया है जिसके वारिसों में गद्दी संभालने की क़ाबलियत ही नहीं है।

वो कहते हैं, "कांग्रेस की जो विचारधारा थी, उसे आप बेमेल खिचड़ी कहें, भानुमति का कुनबा कहें। लेकिन ये कुनबा एक छत के नीचे जुड़ इसलिए सका था कि उसकी विचारधारा में इतने सारे ज़ायके थे कि उस दावत को खाने के लिए कई तरह के लोग आ कर जुट जाते थे।"

"वो समाजवादी था, वो ग़रीबों का हिमायती अपने को कहता था और उसके सेकुलरिज़्म में लोगों को एक विश्वसनीयता नज़र आती थी। आज की जो कांग्रेस है, न तो वो ग़रीबों को अपना हमदर्द नज़र आता है और न ही अल्पसंख्यकों को। ये बड़ी दर्दनाक बात है कि कांग्रेस के राज में सांप्रदायिक दंगे ज़्यादा हुए हैं, उन सूबों से जहाँ घोर हिंदुत्ववादी लोगों के समर्थक लोग राज कर रहे हैं।"

नेहरू ब्रांड की चमक फीकी

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हाल के सालों में अमेरिका में ब्रांड केनेडी और बुश और पाकिस्तान में ब्रांड भुट्टो की चमक में कमी दिखाई देने लगी है। क्या भारत में भी ब्रांड नेहरू-गाँधी की चमक फीकी पड़ रही है? राजनीतिक विश्लेषक रशीद क़िदवई कहते हैं कि आप अगर किसी भी वंश को देखे, चाहे मुगल वंश को ही लें तो तीन या चार पीढ़ियों के बाद फीकापन आने लगता है।

वो कहते हैं कि जहाँ तक राहुल गाँधी की बात है आप या तो राजनीति में हैं या नहीं है। अगर आप राजनीति में है तो आप को दमख़म से लड़ना चाहिए। राहुल गाँधी को सब चीज़ें थाली में सजी हुई मिलीं।

किदवई का कहना है, "मेरा मानना है कि कांग्रेस की जो स्थिति है उसके लिए मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी से ज़्यादा राहुल ज़िम्मेदार हैं क्योंकि ख़ुद उन्हें अपने रोडमैप को ले कर क्लैरिटी नहीं है और उनमें अन्तर्विरोध भी बहुत है।"

रिझाने की कोशिश

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पिछले दिनों यूपीए सरकार ने मतदाताओं को 12 सिलेंडरों की सौगात, सीएनजी के दाम में भारी कमी और सरकारी कर्मचारियों के मूल वेतन और मंहगाई भत्ते के विलय का वादा कर रिझाने की कोशिश की है। क्या घोषणाएं चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं ? पुष्पेश पंत ऐसा नहीं मानते। वो कहते हैं, "आप बतौर बख़्शीश कोई चीज़ किसी को दें तो उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। आज का मतदाता इतना होशियार है कि माल-ए-मुफ़्त दिल-ए-बेरहम जो भी हाथ आएगा, उसको वो ले लेगा लेकिन उसके बदले में वो आपको कुछ देगा, उसके बारे में मुझे बहुत शक है।"

सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस के लिए सब कुछ समाप्त हो चुका है? क्या अभी भी कोई रामबाण है जो उन्हें मुकाबले में वापस ला सकता है? रशीद क़िदवई कहते हैं कि अब भी वो अगर पूरे दमख़म से चुनाव लड़ें तो कम से कम ये तो सुनिश्चित कर सकते हैं कि दूसरे दल को पूर्ण बहुमत न मिल सके।

शशि शेखर की सलाह है कि अगर आप भ्रष्टाचार से लड़ने की बात करते हैं तो पहले भ्रष्टाचारियों को निकालिए। एक चुनाव अगर हार भी जाते हैं तो भी क्या। कांग्रेस इससे पहले भी चुनाव हारी है। लेकिन क्या कांग्रेस के लिए इस पर अमल करना आसान होगा?

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