फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   faiz ahmad faiz birth anniversary

फैज अहमद फैज:कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब, आज तुम याद बेहिसाब आए

Sun, 01 May 2016 07:12 PM IST
रिज़वान/अमर उजाला, दिल्ली
रिज़वान/अमर उजाला, दिल्ली Updated Sun, 01 May 2016 07:12 PM IST
विज्ञापन
faiz ahmad faiz birth anniversary

बोल, कि लब आजाद हैं तेरे

विज्ञापन

बोल, जबां अब तक है तेरी।
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल, कि जां अब तक तेरी है।

अपनी हर नज्म से सोते हुए जमीरों को जगा देने वाले, इंकलाबी शायरी में उर्दू दुनिया के सबसे बड़े नामों में एक फैज अहमद फैज की आज 105वीं जयंती है। एक ऐसा शायर जिसका एक-एक शेर दबे-कुचलों की आवाज कई सालों से बना हुआ है। फैज ने अपनी गजलों और नज्मों के जरिए हमेशा हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और तमाम उर्दू बोलने वालों के दिलों में अपनी अलग जगह बनाई है।

आमतौर पर किसी शायर को उसकी शायरी के लिए याद किया जाता है, लेकिन फैज शायरी और शख्सियत दोनों ही वजहों से लाखों लोगों के दिल में रहते हैं। फैज की शायरी हमेशा हमारी जिंदगी के मसाइल को हमारे सामने रखती है, हमारे सोये हुए जहनों को झंझोड़ देती है। गाह-बगाहे फैज किसी शेर किसी मिसरे के जरिए हमारे साथ आ खड़े होते हैं। फैज ने ऐसे जिंदगी की हकीकतों को गजलों और नज्मों में पिरोया है, कि वो याद आ ही जाते हैं।
विज्ञापन


भले ही आज आजादी को सात दशक के ज्यादा वक्त हो गया है लेकिन ये सच है कि आज भी फौज का ये शेर उतना ही नया लगता है जितना इस मुल्क से अंग्रेजों के जाने के कुछ सालों बाद लगता था। जिस खुशनुमा सुबह का इंतजार मुल्क के बाशिंदों को आजादी के बाद बरसों से है, वो नहीं आती दिखती तो फैज याद आते हैं। फैज कहते हैं
विज्ञापन
विज्ञापन


ये दाग-दाग उजाला, ये शब-गजीदा सहर
वो इंतजार था जिसका, ये वो सुबह तो नहीं।

फैज की शायरी के मशहूर होने की वजह है उनकी शायरी में जिंदगी की कशमकश, नाइंसाफी के खिलाफ विद्रोह, एक क्रान्ति, एक आग। फैज के शेर यूं तो हर भूख से मरते इंसान की मौत के बाद याद आते हैं, हर किसान की खुदकुशी के बाद याद आते हैं। लेकिन फैज पिछले कुछ दिनों से कुछ ज्यादा ही याद आ रहे हैं।

जब जुबान खोलते ही गद्दार हो जाने का डर हो, जब हर किसी को देशभक्ति को आस्तीन पर चढ़ा के रखना हो, जब देश में शिक्षक दिवस पर ऐलान हो जाए 'अपने बच्चों से कहो, मेरे मुताबिक सोचें', जब एक खास सोच से अलग आप सोचें तो आपको मुल्क के बदनुमा दाग की तरह दिखाया जाए, जब क्या खाया के सवाल पर किसी को कत्ल कर दिया जाए तो फिर फैज याद आते हैं और बेइंतिहा याद आते हैं। शायद ये सारी वजहें ही हैं कि आज फैज खबरिया चैनलों पर भी खूब याद किए जाने लगे हैं।

हर रग-ए-खूं में फिर चरागा हो
सामने फिर वो बेनकाब आए
कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आए।

एक पत्रकार, शायर, फौजी, अनुवादक और आधा दर्जन से ज्यादा भाषाएं जानने वाले फैज 13 फरवरी 1911 पंजाब के नारनौल कस्बे में पैदा हुए। फैज अहमद को दुनियाभर में फैज अहमद 'फैज' के नाम से पहचान मिली। फैज जिस कस्बे में पैदा हुए वो भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान के हिस्से में आया। फैज भले ही पाकिस्तान के बाशिंदे हो गए लेकिन उनकी नज्में और गजलें हमेशा ही सरहदों के बहुत दूर तर पसंद की जाती रहीं। उनकी नज्मों में जो विद्रोह है, जो बंदिशों को तोड़ने की चाह है, सिस्टम पर जो तंज है वो भले ही सत्ता में बैठे कुछ 'खास' लोगों को मुतास्सिर ना करे, उन्हें पसंद ना आए लेकिन आम लोगों को जरूर अपनी लगती है।

निसार मैं तेरी गलियों पे ए वतन के जहां
चली है रस्म कि कोई ना सर उठाके चले।
जो कोई चाहने वाला तवाफ को निकले
नजर चुरा के चले, जिस्मों-जां बचाके चले।

एक बैरिस्टर के घर पैदा हुए फैज अहमद का 'फैज' बनना भी किसी कहानी जैसा है। जिसने घर में कभी गरीबी नहीं देखी, हर तरफ एशो-आराम देखी। उस शायर ने क्यों पूंजीवाद की मुखालफत में क्यों अपनी जिंदगी के अहम साल जेलों में गुजार दिए, क्यों वो शायर वतन से निकाला गया। दरअसल फैज अहमद के इंकलाबी फैज बनने की शुरुआत अमृतसर में हुई।

अरे मियां छोड़िए, मैं नेहरु नहीं फैज अहमद फैज हूं

faiz ahmad faiz birth anniversary

फैज अहमद फैज सियालकोट के मशहूर बैरिस्टर सुल्तान महम्मद खां के घर पैदा हुए। घर में चार घोड़ों की बग्गी थी, जो उस समय किसी का पास होना बड़ी बात मानी जाती थी। फैज की पांच बहनें और चार भाई थे। पढ़ने में फैज सबसे तेज थे, इसलिए उनपर सबका प्यार भी सबसे ज्यादा था। परिवार में बड़ा धार्मिक माहौल था। फैज को कुरआन पढ़ने के लिए भेजा गया दो सिपारे (कुरआन के दो पाठ) उन्होंने हिफ्ज (कंठस्थ करना) भी कर लिए कि आंख दुख आईं और उन्होंने हिफ्ज छोड़ दिया।

इसके बाद फैज को स्कूल में दाखिल कराया गया और वो हमेशा अव्वल आते रहे। फैड ने अपने कॉलिज के दिनों में ही शायरी करना शुरू कर दिया था। तबीयत के शर्मीले और कम बोलने वाले फैज ने इंकलाबी ही नहीं रूमानी शायरी भी की।

राजे-उल्फत छुपा के देख लिया
दिल बहुत कुछ जला के देख लिया।
और क्या देखने को बाकी है
आपसे दिल लगा के देख लिया।
  
स्कूल खत्म कर फैज कॉलिज पहुंचे। कॉलिज के दिनों का बेहद खूबसूरत किस्सा उनके बड़ी बहन बीबी गुल ने एक इंटरव्यू में बताया। बीबी गुल धर्मशाला में रहती थीं, उनके शौहर शुजाउद्दीन बड़े वकील थे। फैज अक्सर कॉलिज से छुट्टी मिलने पर अपनी बहन बीबी गुल के यहां धर्मशाला जाया करते थे। एक बार फैज धर्मशाला में चूड़ीदार पाजामा और अचकन पहनकर घूमने निकल गए।

फैज को घूमता देख कुछ लोगों ने उनको घेर लिया। लोगों ने फैज से पूछा कि आप कहां ठहरे हैं, फैज ने जवाब दिया कि बैरिस्टर शुजाउद्दीन के यहां। इस पर वहां मौजूद लोगों ने कहा कि पंडित जी आप मुसलमान के यहां क्यों ठहरे हैं? इस बीच कुछ औरतों भी थाली लेकर आ गईं। तब कहीं जा के फैज को बात समझ में आई। वो उस भीड़ से बाहर निकले और बोले अरे साहब, मैं पंडित नेहरु नहीं फैज हूं, शुजाउद्दीन का साला। दरअसल भीड़ अचकन पहने इस सजीले नौजवान को जवाहरलाल नेहरु समझ बैठी थी।

फैज ने अंग्रेजी और अरबी में एम. ए. किया। 1934 में उन्होंने तालीम मुक्ममल की। 1935 में फैज अमृतसर के एक कॉलिज में अंग्रेजी के प्रवक्ता हो गए। यहीं उनकी मुलाकात देहरादून की रशीदा आपा से हुई। रशीदा आपा ने उनको कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो पढ़ने को दिया। इसके बाद फैज पूरी तरह मार्क्सवाद की तरफ मुड़ गए। यहां से एक नए फैज का जन्म हुआ, जो उनके ही शब्दों में 'यार की गली से फांसी के तख्त की तरफ' चल दिया।

मुकामे फैज कोई राह में जचां ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले।

कम्युनिज्म की तरफ मुड़ने के बाद ही फैज ने यादगार नज्म 'मुझसे पहली सी मुहब्ब्त मेरे महबूब ना मांग' लिखी। इस नज्म को नूरजहां ने आवाज देकर अमर कर दिया। इस नज्म में जिस तरह से एक फैज तमाम दुनिया के दुख को समेटते हैं। वो कमाल है।

अमृतसर में रहते हुए ही फैज की मुलाकात एलिस से हुई। जो उनकी हमसफर बनीं। एलिस अमृतसर के एम ओ कॉलिज के प्रिसिंपल डॉ. तासीर की बीवी की बहन थीं। वो हिन्दुस्तान अपनी बहन से मिलने आईं थी, यहीं उन्हें मिल गए फैज। एलिस ने एक इंटरव्यू में बताया था कि फैज जब पहली बार उनकी यहां आए तो पहली मुलाकात में ही हम एक-दूसरे को दिल दे बैठे। फैज से मुलाकातें प्यार में बदल गईं। 1941 में दोनों ने शादी कर ली।

गर बाजी इश्क की बाजी है, तो जो भी लगा दो डर कैसा,
जीत गए तो बात ही क्या, हारे भी तो हार नहीं।।

एलिस फैज से शादी के बाद उनके परिवार में कैसे ढलीं ये उन्होंने खुद ही एक इंटरव्यू में बताया। एलिस बताती है कि मैंने बड़े से गोटे का दुपट्टा ओढ़ा, लंहगा पहना लेकिन मैंने घूंघट करने से मना कर दिया जिसे उनके परिवार ने मान लिया। एलिस को फैज की मां ने अपनी तरफ से नाम भी दिया था, कुलसुम। इस नाम को ना एलिस ने अपनाया ना फैज ने। वो एलिस फैज के नाम से मशहूर हुईं।

एलिस 50 और 60 के दशक में लाहौर की लड़कियों के बीच में खूब मशहूर थीं। वो टीचर थीं और उनका साइकिल से रोज यनिवर्सिटा से जाने के किस्से को अपने कई इंटरव्यू में शायरा किश्वर नहीद ने बताया। किश्वर नहीद ने फैज और एलिस के बारे अपने एक संस्मरण में लिखा है। 50 के दशक में हम कॉलिज जाने वाली लड़कियां अक्सर इस बात की चर्चा करती थीं, कि फैज की बीवी आखिर साइकिल से क्यों आती है? एलिस सामाजिक कामों में भी बेहद सक्रिय रहती थीं। कॉलिज की लड़कियों के साथ दूर-दराज के गांवो में जाकर वो गांव की लड़कियों को पढ़ाया करती थीं। फैज की दो बेटियां हैं मुनीजा और सलीमा।

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान फैज जर्मनी और जापान को हराने की गरज से अंग्रेजी फौज में शामिल हो गए। 1942 से 1947 तक अंग्रेजी फौज में कैप्टन से लेकर मेजर तक कई पदों पर रहे। 1947 में वो सेना से इस्तीफा देकर लाहौर चले गए। अब वो नए मुल्क पाकिस्तान का हिस्सा थे। नए बने पाकिस्तान में एक-एक करके जब आवाम के सपने टूटने लगे, तो इससे फैज जैसे वामपंथी बेहद आहत हुए। फैज और सज्जाद जहीर जैसे लोग प्रगतिशील संगठन से जुड़ गए। नए बने पाकिस्तान में सरकार की आंखों में फैज खटकने लगे। जिन्ना के इस नए बने मुल्क में फैज के हिस्से में जेल आई।

पांच साल की कैद ने फैज को मशहूर कर दिया

faiz ahmad faiz birth anniversary

1951 में पाकिस्तान के रावलपिंडी में प्रधानमंत्री लियाकत अली खां का तख्ता पलटने की साजिश हुई। इस साजिश का खुलासा हो गया इसमें जो लोग गिरफ्तार किए गए। उनमें मुख्य अभियुक्तों में फैज का भी नाम था। फैज के साथ मशहूर शायर सज्जाद जहीर भी गिरफ्तार हुए। फैज पर मुकदमा चला उस समय पाकिस्तान के अखबारों में ये आम चर्चा थी कि फैज को फांसी होगी। फैज के खिलाफ इल्जाम साबित ना हो सके वो 1955 में छूट गए।

जेल के दौरान फैज ने जो अदबी-खिदमात अंजाम दी वो ना सिर्फ उनकी शायरी में मील का पत्थर हैं बल्कि उर्दू दुनिया में उसकी अलग जगह है। जेल में रहकर जो शायरी फैज साहब ने की वो उनको मिर्जा गालिब और अल्लामा इकबाल के बराबर लाकर खड़ा करती हैं। फैज ने जेल में रहकर बड़ी इंकलाबी शायरी की। हैदराबाद जेल मे रहते हुए उन्होंने लिखा।

कटते भी चलो, बढ़ते भी चलो/ बाजू बहुत हैं, सिर भी बहुत/ चलते भी चलो कि अब डेरे/ मंजिल पे ही डाले जाएंगे।

जेल में रहते हुए ही फैज शायरी की महफिलें लगाने लगे। उनके साथ दूसरे कैदी भी शामिल हो जाते। सज्जाद जहीर ने एक इंटरव्यू में बताया था, कि फैज साबह की शायरी ही जेल के उस दौर में हम सबका हौंसला बढाती थी। फैज का दिल सबसे ज्यादा टूटा जब जेल में उन्हें साथी कैदियों से अलग कर दिया गया। यहां तक कि उनको कलम और कागज भी नहीं दिया गया। इस सबके बावजूद फैज ने हार नहीं मानी। उन्होंने इस स्थिति पर भी लिखा।

मताए लौह-ओ-कलम छिन गई तो क्या गम है
कि खून-ए-दिल में डूबो ली हैं उगलियां मैंने।
जुबां पे मुहर लगी है तो क्या, कि रख दी है
हर एक हल्का-ए-जंजीर में जुबां मैंने।

हालांकि फैज और उनके करीबियों ने हमेशा यही कहा कि वो बेवजह ही जेल में डाले गए। उनका रावलपिंडी केस में कोई हाथ नहीं था। उन्होंने इस पर एक शेर में भी जिक्र किया।

सारे फसाने में जिसका कहीं जिक्र ना था
वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है।

फैज के जेल के दौर ने ना सिर्फ पाकिस्तान में बल्कि रूस और भारत में भी उनको बेहद मशहूर कर दिया। फैज की जेल में रहकर लिखी गई नज्में पाकिस्तान और भारत में तकरीरों में खूब सुनी जानें लगी। भारत में तो उनको लोकप्रियता इतनी थी कि पाकिस्तान में उनको इस बात को लेकर निशाना भी बनाया जाता था। वो उनको हिन्दुस्तान में किस कदर प्यार मिलता था, इसके बारे में उनके साथ के कई शायरों ने अपने संस्मरणों मे इसका जिक्र किया है।

'फैज साहब तो हिन्दुस्तान में अशोक कुमार बने हुए थे'

faiz ahmad faiz birth anniversary

मशहूर साहित्यार कुर्तुलएन हैदर फैज की भारत में मशहूर होने का एक उदाहरण देते हुए अपने संस्मरण में लिखती हैं। 1956 में दिल्ली में एशियन राइटर्स कांफ्रेंस आयोजित हुई। उसमें लाहौर से फैज साहब और एजाज हुसैन बटालवी शिरकत करने आए। इस दौरान फैज साहब को जो प्यार मिला उसको देखते हुए एजाज बटालवी ने लाहौर लौटकर कहा 'फैज साहब तो कांफ्रेस में अशोक कुमार बने हुए थे'

कुर्तुलएन हैदर लिखती हैं, फैज साहब की हिन्दुस्तान में मकबूलियत से सब वाकिफ हैं। उनकी रूस में जबरदस्त आवभगत होती है। हैदर कहती हैं कि कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड समेत दुनिया भर में जहां-जहां उर्दू बोलने वाले और खासतौर से पंजाबी जुबान के जानने वाले हैं फैज साहब के लिए लोग पलक-पावड़े बिछाते हैं।

विदेश में फैज भी भारतीयों से बड़ी गर्मजोशी से मिलते थे। 1967 में ऐसा भी हुआ जब वो रूस में एक कार्यक्रम में पूरे हॉल में भारत का झंडा ढूंढ़ रहे थे।

'पूरा हॉल भीगी आंखों से मुझे और फैज को देख रहा था'

faiz ahmad faiz birth anniversary

मशहूर कहानीकार कृष्णचंदर फैज के बारे में एक लेख में उनसे हुई बड़ी भावुक मुलाकात को याद करते हैं। वो बताते हैं कि 1967 में मुझे सोवियत साहित्यकारों की कांग्रेस में जाने का मौका मिला। पाकिस्तान से फैज भी इस कांग्रेस में भाग लेने के लिए आए थे। ये 1965 की भारत और पाक की जंग के बाद दोनों मुल्कों में तनाव का दौर था।

कृष्णचंदर लिखते हैं कि शाम के वक्त जब खाने के लिए सब इकट्टा हुए तो आयोजकों ने इस बात का खास ख्याल रखा कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के मेजों के बीच कम से कम बीस मेजे हों। कृष्णचंदर कहते हैं कि जब मुझे पाकिस्तान की मेज ना दिखी तो मैं बैठ गया तभी फैज साहब आए। वो भी शायद कुछ ढूंढ़ रहे थे। हम दोनों की नजरें मिली, उन्होंने अपनी मेज से झंडा उठाया मैने अपनी मेज से, हम दोनों बीच हॉल में लिपट-लिपट कर गले मिले।

कृष्णचंदर लिखते है कि हम गले मिले तो सारा हॉल नम आंखों से ताली बजा रहा था। हमने एक मेज पर ही दोनो देशों के झंडे रखे और देर तक शराब का दौर चला। फैज साहब बोले साहब जो काम सियासत वालों का हैं, वो उसे करेंगे हम तो सिर्फ अमन की बात करेंगे। कृष्णचंदर बताते हैं कि मेरे लिए दुभाषिए का काम करने वाली लड़की को देखकर बोले बड़ी सुंदर हैं, कहां से एंठी? कृष्णचंदर कहते हैं कि मैंने जब कहा कि ये यहूदिन है, तो हंसने लगे। कृष्णचंदर कहते हैं कि इसके बाद उनसे ना मिल सका लेकिन उन चंद दिनों में फैज साहब से जो सीखा वो कभी भूल नहीं सकता।

फैज साहब पाकिस्तान में सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में आए जब जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार में उन्होंने बड़े पद स्वीकार कर लिए। मगर उनके दिल में हमेशा आम आदमी का दर्द था, ये जुल्फिकार भुट्टो के प्रधानमंत्री रहते बांग्लादेश की जंग के दैरान भी दिखा।

'खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद'

faiz ahmad faiz birth anniversary

1970-71 में पाकिस्तानी फौज के पूर्वी पाकिस्तान में बांग्ला बोलने वालों पर जुल्म की खबरों से अखबार लाल थे। इसी वक्त फैज इस पर कुछ नहीं बोल रहे थे। वो इस जंग के दौरान प्रधानमंत्री भुट्टो के साथ ढाका भी गए। ढाका जाकर जब उन्होंने खून के मंजर देखे तो वो सिहर उठे। वापस आकर उन्होंने एक नज्म लिखी। इस नज्म में उन्होंने सभी कुछ कह दिया।

हम कि ठहरे अजनबी कितनी मदारातों के बाद
फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाकातों के बाद।
कब नजर में आएगी बेदाग सब्ज की बहार
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद।


फैज 1984 में दुनिया छोड़ गए। उनके मौत के बाद 1990 में उन्हें पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज से नवाजा गया। फैज ने जिंदा रहते कभी अपनी तारीफ सुननी पंसद नहीं की। वो कहते रहे मुझे तो ज्यादा करके आंका गया। हम कहें कि गालिब और इकबाल के बाद के युग को फैज युग कहा जाए तो गलत नहीं होगा। आखिर कहा भी क्यों ना जाए, जब गुनगुनाओ तभी फैज का एक-एक शेर ताजगी देता है।

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले।

फैज की शायरी में ऐसा जादू है कि कभी वो वीणा की झंकार की तरह तो कभी धनुण की टंकार की तरह बजती है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियां फैज और उनका शायरी के लिए।

इसी हेतु है जन्म टंकार का, न टूटे कभी तार झंकार का।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed