नीतीश-लालू के सामाजिक गणित के सामने फेल हुई एनडीए सियासी केमिस्ट्री
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बिहार के चुनावी जंग में महागठबंधन के सामाजिक गणित के आगे भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए की पूरी सियासी केमिस्ट्री फेल हो गई। अति पिछड़ी जातियों को समेटे रखने के साथ नीतीश-लालू के गठबंधन ने भाजपा के वोट बैंक माने जाने वाली उच्च जातियों के मतों में भी सेंधमारी की है।
बेगुसराय, जहानाबाद, औरंगाबाद, भोजपुर, बक्सर, गोपालगंज, छपरा और सीवान सरीखे जिलों में भाजपा की करारी पराजय यह दर्शाती है कि महागठबंधन की सोशल इंजीनियरिंग भारी पड़ी है। यही नहीं सूबे के मतदाताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ओबीसी और पिछड़ी जाति से होने की अपील को भी खारिज किया है।
सामाजिक रणनीति भी रही फेल
भाजपा की रामविलास पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को लेकर बनी सामाजिक रणनीति भी फेल रही। आलम यह है कि बिहार में भाजपा की स्थिति 15 वर्ष पुराने वाली हो गई है।
लालू के ‘जंगलराज’ व उनके माई समीकरण से बिहार को मुक्त कराने के लिए पार्टी के तब के शीर्ष नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने जॉर्ज फर्नांडीस के जरिए भाजपा के साथ नीतीश के गठबंधन को परवान चढ़ाया था। लेकिन, भाजपा में मोदी युग की शुरुआत के साथ ही नीतीश ने भगवा परिवार से किनारा कर लिया।
मगर विधानसभा चुनाव में लालू के साथ गठबंधन का जोखिम उठाते हुए नीतीश ने सिद्ध कर दिया है कि वे ही बिहार की सत्ता के शहंशाह हैं।