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एआर रहमान का संगीत विवाद: मुल्ला का हर बयान फतवा नहीं

Wed, 16 Sep 2015 04:21 PM IST
Updated Wed, 16 Sep 2015 04:21 PM IST
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facts of Fatawa and mulla's comment

भारत में 25 सालों से पत्रकारिता कर रहा हूँ लेकिन जब भी मुस्लिम सम्बंधित कोई मुद्दा उठता है तो मुझे पत्रकार बिरादरी की जहालत पर तरस आता है। बरसों पहले मैंने फतवा के सिलसिले में जो बात कही थी आज भी दोहराना पड़ रहा है क्योंकि ये एक ऐसा शब्द है जिसे मीडिया के अधिकतर लोग समझ नहीं सके हैं या समझने का प्रयास नहीं करते।

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ऑस्कर से सम्मानित एआर रहमान ने पैगंबर मोहम्मद पर बनी एक ईरानी फिल्म में संगीत दिया है जिसके कारण मुंबई की रजा एकेडमी ने आपत्ति जताई है और फिल्म पर पाबंदी लगाने की मांग की है। रजा एकेडमी के सईद नूरी ने पिछले शुक्रवार को एक इंटरव्यू में कहा था कि इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक, संगीतकार रहमान और इस फिल्म में काम करने वाले दूसरे लोगों से गलती हुई है और उन्हें माफी मांगनी चाहिए।
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उन्होंने कहा था कि फिल्म से जुड़े मुसलमानों को दोबारा कलमा (इस्लाम धर्म स्वीकार करने की पहली शर्त) पढ़कर इस्लाम में दाख़िल होना चाहिए।

जानिए कौन जारी कर सकता है फतवा

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रजा एकेडमी की इस आलोचना को अंग्रेजी प्रेस और सोशल मीडिया पर फतवा कहा जा रहा है। ये फतवा नहीं है। ये एक आलोचना है और भारतीय सरकार से फिल्म पर पाबन्दी की एक मांग। इसकी कोई इस्लामी हैसियत नहीं है। फतवा एक बड़ा अमल होता है जिसे एक संस्था सोच विचार करके जारी करती है। हर मामले में फतवा नहीं जारी किया जाता। ईरान, सऊदी अरब और मिस्र जैसे मुस्लिम देशों में फतवा देने वाले आलिमों और संस्थाओं को सरकारी मान्यता होती है।

ईरान के इस्लामी इंकलाब के बाद लेखक सलमान रुश्दी के खिलाफ जारी किया गया फतवा राजनीति से प्रेरित जरूर था, लेकिन उसे फतवा कहना सही था। पैगंबर मोहम्म्द पर बनी फिल्म 'मोहम्मद: मैसेंजर ऑफ गॉड' का निर्देशन ईरान के माजिद मजीदी ने किया है। ईरान में इसपर कोई फतवा नहीं जारी किया गया है।

भारत में भी कुछ ऐसी संस्थाएं और आलिम हैं जो फतवा जारी कर सकते हैं, लेकिन इस्लामी देशों के विपरीत ये भारत के मुसलमानों पर बाध्यकारी नहीं है। जो चाहे वो माने जो न चाहे वो न माने। दारुल उलूम देवबन्द और इमारत शरिया (बिहार और ओडिशा) दो ऐसी संस्थाएं हैं जो फतवा जारी कर सकती हैं। मुंबई की रजा अकादमी भी फतवा दे सकती है।

आलोचना से डर

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हालांकि रहमान के ख़िलाफ जो बयान आया है वो आलोचना है फतवा नहीं। मगर भारतीय मीडिया पर इसे फतवा कहे जा रहा है। मुझे याद है इस तरह के कई मुद्दों पर आए बयानों को मीडिया ने फतवा की तरह पेश किया है जो लोगों को गुमराह करने के अलावा और कुछ नहीं कर रहे। अगर मैं रहमान होता तो रजा एकेडमी की आलोचना पर ध्यान देता ही नहीं।

हाँ ये बात समझ में आती है कि अगर आप मुंबई में रहते हों तो इस एकेडमी को नजर अंदाज नहीं कर सकते। ये मुंबई और इसके आस-पास काफी तेजी से अपना असर बढ़ाने में कामयाब रही है। कुछ साल पहले इस एकेडमी ने प्रदर्शनों का आयोजन भी किया था जो बाद में हिंसात्मक हो गईं थीं। मैंने मुंबई में बाल ठाकरे और राज ठाकरे के सामने बॉलीवुड की हस्तियों को घुटने टेकते देखा है।
हो सकता है कि रहमान को भी इस एकेडमी की आलोचना से भय हो।

इसीलिए उन्होंने बहुत इज्जत के साथ रजा एकेडमी की आलोचना का जवाब दिया है। रहमान को उम्मीद होगी कि रजा एकेडमी को उनका जवाब पसंद आया होगा। मगर एकेडमी ने अपनी मांग वापस नहीं ली है। फिलहाल मुझे फिल्म के भारत में रिलीज होने का बेसब्री से इंतजार है।

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