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'दुष्कर्म मामले में चश्मदीद गवाह नहीं किए जा सकते नजअंदाज'
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 21 Mar 2014 11:23 PM IST
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बुजुर्ग महिला के साथ दुष्कर्म के मामले में चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी को सुप्रीम कोर्ट ने अधेड़ उम्र के दोषी की सजा को बरकरार रखने के लिए काफी बताया है। निचली अदालत से मिली सख्त सजा को बरकरार रखे जाने की गुजारिश उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से की है।
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राज्य सरकार ने दोषी की अपील का कड़ा विरोध करते हुए कहा, कि आरोपी के इस घृणित कृत्य के दो गवाह हैं, जिन्हें झूठा बताने का आरोपी का दावा पूरी तरह से गलत है। ऐसे में निचली अदालत और हाईकोर्ट की ओर से दोषी के खिलाफ तय की गई दस साल कैद की सजा को बरकरार रखा जाए।
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सर्वोच्च अदालत में दोषी ने नैनीताल हाईकोर्ट के मई, 2013 के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी। साथ ही जमानत देने की गुहार लगाई थी। जस्टिस केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने जेल में बंद दोषी अली हसन की जमानत की मांग पर तत्काल विचार करने से इनकार कर दिया।
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वहीं राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता आशुतोष कुमार शर्मा ने कहा कि पीड़ित की ओर से एफआईआर दर्ज कराने में 24 घंटे देरी की विपक्षी की दलील सुप्रीम कोर्ट की दी गई व्यवस्थाओं के विपरीत है। दोषी पक्ष की ओर से लगातार पीड़ित और उसके परिवार को धमकाने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि इससे पहले दो गवाह धमकियों से डरकर अपने बयान को बदल चुके हैं।
ऐसे में आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा-376 के तहत मिली दस साल की सजा को बरकरार रखा जाए। पीठ ने कहा कि इस मामले में चश्मदीद गवाह और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं, जो सजा को बरकरार रखने के लिए काफी हैं।
इन्हें कोई भी अदालत सीधे तौर पर नकार नहीं सकती। अदालत को मामले के तथ्यों की जानकारी देते हुए राज्य सरकार ने कहा कि जुलाई, 2003 में दोषी ने हरिद्वार के भगवानपुर स्थित महिला के घर में घुसकर बलात्कार किया।
उस दौरान महिला की उम्र 52 साल से अधिक थी और उसका पति यूपी के सहारनपुर शहर काम से गया हुआ था। जबकि बेटा रुड़की गया हुआ था। पीठ ने राज्य सरकार की दलीलों पर कहा कि अदालत फिलहाल मामले में दोषी की जमानत की मांग पर विचार नहीं कर रही है। राज्य सरकार की ओर से दायर किए गए जवाब पर प्रतिपक्ष अपना जवाब दाखिल करें।