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मानसिक रोगियों को बिजली का झटका दिया तो खैर नहीं

Wed, 11 Dec 2013 11:25 AM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 11 Dec 2013 11:25 AM IST
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experts seek integration of mental health in healthcare

मानसिक रूप से विक्षिप्त रोगी अब इलाज के नाम पर किसी तरह की क्रूरता के शिकार नहीं होंगे।

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बतौर इलाज उन्हें न ही इलेक्ट्रो-कनवल्सिव थेरेपी (बिजली के झटके) दी जाएगी और न ही उन्हें जंजीरों से बांध कर रखा जाएगा।

मानसिक रोगियों का इलाज सामान्य रोगियों की तरह ही किया जाएगा। मानसिक रोगियों के बेहतर उपचार और देखभाल के लिए सरकार नया कानून बना रही है।

नए कानून में रोगियों को यह अधिकार दिया गया है कि वह समाज का हिस्सा बनकर अपना इलाज कराएं। साथ ही सरकार का दायित्व है कि उन्हें हाफ वे होम, सामुदायिक परिचर्चा केंद्र आदि प्रदान करे।

नए कानून में मानसिक बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति अपने लिए निर्णय लेने के लिए एक नामित प्रतिनिधि नियुक्त कर सकता है।

साथ ही मानसिक रोगी को यह अधिकार भी है कि वह समाज का हिस्सा बन कर रहे और उसे समाज से बाहर न किया जाए।

मौजूदा कानून में इस तरह की व्यवस्था न होने से मानसिक रोगी न सिर्फ एक कैदी की तरह जिंदगी जीते हैं बल्कि उन्हें परिवार से भी कभी-कभार ही मिलने दिया जाता है। साथ ही इलाज के नाम पर भी उनके साथ क्रूरता का व्यवहार किया जाता है।
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स्वास्थ्य मंत्रालय ने मानसिक रोगियों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए ‘मानसिक स्वास्थ्य परिचर्चा विधेयक 2013’ को मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में पेश किया था।
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इस पर इन दिनों स्थायी समिति विचार कर रही है। स्थायी समिति ने विधेयक में कई महत्वपूर्ण बदलाव की सिफारिश की है। इसमें अन्य सुझावों के साथ ही इसका नाम बदले जाने की बात भी कही गई है।

स्थायी समिति ने इसका नाम ‘मानसिक स्वास्थ्य देख-रेख विधेयक 2013’ करने का सुझाव दिया है। विधेयक में मुफ्त इलाज की व्यवस्था तो की ही गई है।

साथ ही मानसिक रूप से ग्रस्त व्यक्ति को यह अधिकार भी दिया गया है कि उसकी क्रूर, अमानवीय और निम्न कोटि के उपचार से सुरक्षा की जाए।

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