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पठानकोट: 'मोदी ही नहीं, पाक का भी इम्तिहान'

Mon, 04 Jan 2016 03:27 PM IST
Updated Mon, 04 Jan 2016 03:27 PM IST
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expert reactions on pathankot attack

पठानकोट एयरबेस पर हुए चरमपंथी हमले में अब तक भारत के सात सैनिकों की मौत हो चुकी है और 20 सुरक्षाकर्मी घायल हुए हैं। इस दौरान चार चरमपंथियों की भी मौत हुई है।

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यह चरमपंथी हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाहौर दौरे के ठीक आठ दिन बाद हुआ है।

हमले के बाद दोनों देशों के बीच आपसी बातचीत को लेकर सवाल शुरू हो गए हैं। पठानकोट हमले का बातचीत पर क्या असर हो सकता है। आइए जानते हैं भारत और पाकिस्तान के सैन्य विशेषज्ञों से।

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'मामूली चरमपंथी हमला नहीं है ये'

expert reactions on pathankot attack

पठानकोट हमले को देखकर लगता है कि यह काफी योजना के बाद किया गया हमला है, जिस तरह से सैन्य ठिकाने पर हमला हुआ है, वह मामूली चरमपंथी हमला नहीं है, इसको काफी कुछ समर्थन मिला होगा।

भारत के लिए यह एक तरह से छाया युद्ध जैसा है। इसकी पूरी रूपरेखा है, जिस तरह के सबूत मिल रहे हैं, टेलीफ़ोन पर बातचीत भी मिली है, उसे भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी इंटरप्रेट करने की कोशिश कर रही है।ये बताता है कि भारत की आंतरिक सुरक्षा को लेकर पाकिस्तानी सीमा की ओर से चुनौतीपूर्ण स्थितियां रही हैं। इन गुटों को पाकिस्तान में जो समर्थन मिल रहा है, वो अभी भी जारी है। मोदी के पाकिस्तान दौरे के ठीक बाद ये हमला हुआ है, ऐसे में पाकिस्तान से बातचीत को लेकर जो चुनौतियां और इम्तिहान हैं, वे मोदी का नहीं बल्कि पाकिस्तान का है।

ये नवाज़ शरीफ़ और उनकी सरकार का इम्तिहान है कि वो चरमपंथ को खत्म करने के लिए ठोस कार्रवाई करे, वो भी बिना किसी भेदभाव के। अभी तक हमने ये देखा कि पाकिस्तान में हमला करने वालों के साथ सख्ती से निपटा जाता है, जबकि भारत या अफगानिस्तान में सक्रिय चरमपंथियों के मामले में ऐसा कम देखने को मिलता है।

पिछले 20-25 साल के दौरान पाकिस्तान में चरमपंथी गुटों को बढ़ावा दिया गया है। मोदी की पाकिस्तान यात्रा के बाद हम लोगों ने ये नहीं सोचा था कि सबकुछ खत्म हो जाएगा, कुछ लोगों ने ये आशंका जताई थी कि ऐसा एक हमला होगा। अब जब हमला हो गया तो ये इम्तिहान पाकिस्तानी सरकार के लिए है कि वह क्या क़दम उठाते हैं। पठानकोट के हमले के बाद उन्हें जो प्रमाण दिए जाएंगे, उन पर पाकिस्तान का रुख देखने वाला होगा। पेशावर हमले के बाद, पाकिस्तान ने चरमपंथियों पर अंकुश लगाने के लिए कई क़दम उठाए हैं। वो इसमें सक्षम हैं। कई लोगों को सजाएं हुई हैं और कई अदालतें बनाई गई हैं।

अब देखना है कि वे क्या भारत और अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ चरमपंथी हमले करने वालों पर उसी तरह कार्रवाई करता है या नहीं, जिस तरह से पाकिस्तान में हमले करने वालों पर करता है।
(उदय भास्कर, भारतीय सैन्य विश्लेषक)

'अमन के दुश्मन पूरे इलाके में मौजूद'

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निश्चित तौर पर पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तान पर दबाव बढ़ेगा। लेकिन दहशतगर्दी के जो मामले हैं, या फिर छाया युद्ध के मामले हैं, इसका लंबा इतिहास है। अगर हमने इस पर बात करनी शुरू की तो हम अतीत में चले जाएंगे। हमें अगर इस पूरे इलाके में शांति और अमन लाना है तो उस अतीत से निकलना होगा।

दरअसल अमन का रास्ता कोई आसान रास्ता नहीं है, वो बहुत कठिन है। हमें इसके ऊपर चलना है तो काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। सिर्फ़ ये उम्मीद करना बेमानी होगा कि दोनों देशों के प्रधानमंत्री मिल लिए और अब सब कुछ ठीक हो जाएगा।

हकीकत ये है कि इस अमन के दुश्मन पूरे इलाके में मौजूद हैं। हमारे राजनेताओं को फ़ैसला लेना है कि उन्हें अमन के रास्ते पर चलना है या फिर अमन के दुश्मनों के एजेंडे पर चलना है। जो पाकिस्तान की सियासी ताक़त है और जो फौजी ताक़त है, वह इस नतीजे पर पहुंच चुकी है कि पूरे इलाके में अगर अमन लाना है तो दहशतगर्द ताक़तों को ख़त्म करना होगा।

लेकिन कोई जादू की छड़ी तो है नहीं कि उसे घुमाया और ये ताक़तें खत्म हो जाएंगी। ऐसी संगठनों के पास काफी समर्थन है। उनको अलग-अलग जगहों से समर्थन मिल रहे हैं। पूरे क्षेत्र में समस्याएं मौजूद हैं, पठानकोट उसका एक उदाहरण है। हमें इस नज़रिए से देखना होगा और मसले के हल की तरफ़ सोचना होगा।

इसके लिए मुझे लगता है कि दोनों देशों को एक दूसरे की मदद करनी चाहिए। जिद नहीं करनी चाहिए और ना ही ऐसी कोई भी शर्त थोपनी चाहिए, जिसे तय समय सीमा में पूरा करना संभव नहीं हो।

(रिटायर्ड ब्रिगेडियर साद मोहम्मद, पाकिस्तानी सैन्य विश्लेषक)

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