'आम आदमी के लिए धड़कती थी उनकी जिंदगी'
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बहुत ही गहरे इंसान थे कलाम साहब। अच्छी दोस्ती थी हमारी। लोगों के लिए वे अग्नि पुरुष, मिसाइल मैन और न जाने क्या क्या थे। मगर हमारे लिए इन सबके अलावा सबसे अहम वे एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने अपने जीवन में इंसानियत को सबसे ज्यादा तवज्जो दी। मैं अपने को खुशकिस्मत मानता था कि उनके जैसे इनसान के साथ मेरा कुछ वक्त गुजरा।
वह सच्चाई और शांति के साथ किसी भी काम को करने में यकीन रखते थे। वैज्ञानिक होते हुए भी मूल्यों पर भरोसा करते थे। बौद्ध, हिंदू जैसे दुनिया के तमाम धर्मों में उनकी गहरी रुचि थी।
अच्छी सोच होना अलग बात है, मगर उसे अपने जीवन में अमल में लाना बिल्कुल दूसरी बात। मगर कलाम साहब ने अच्छी सोच को अपनी जिंदगी में उतारा भी। सच्चाई, साफगोई और शालीनता उनकी पहचान थी। दोहरेपन का जीवन तो उन्होंने कभी जिया ही नहीं।
दुनिया से एक अच्छा इंसान कम हो गया
उनके जाने से ऐसा लग रहा है कि दुनिया से एक अच्छा इंसान कम हो गया। देश की कई अंतरिक्ष परियोजनाओं और वैज्ञानिक गतिविधियों के दौरान उनसे जुड़ा।
खासियत यह थी कि जिससे भी वह मिलते, वह उनको अपना दोस्त समझने लगता। बेहद कम समय में ही वह बड़ी ही गहराई के साथ लोगों से जुड़ जाते थे। असफलताएं उन्हें निराश नहीं करती थीं।
वह उनसे सीख कर आगे बढ़ जाते। जब वह भारत के पहले एसएलवी-3 के परियोजना निदेशक थे तब भी वह छोटे से छोटे कर्मचारी को भी कभी डांटते नहीं थे।
बडे़ ही प्यार से बात करते थे। उनकी इज्जत करते थे। उनकी सलाह पर ध्यान देते थे। यही वजह थी कि अग्नि जैसे भारत के मिसाइल कार्यक्रम उनकी अगुवाई में कामयाब रहे। ऊंच-नीच की परवाह किए बगैर हर शख्स की बात को अहमियत देते थे।
भले ही तकनीक उनके कदम चूमती रही हो, मगर वह दूसरों पर इसका कभी रौब नहीं झाड़ते थे। वास्तव में वह एक दार्शनिक थे। उन्होंने जिंदगी के फलसफे को पढ़ा, समझा और उसी में पूरा जीवन लगा दिया।
उनका हर काम जिंदगी को बेहतर करने के लिए था। उनकी सोच जीवन को खुशनुमा बनाने के लिए थी। भले ही उन्होंने मिसाइलें बनाई, मगर उनकी सोच, उनका दिल आम आदमी की जिंदगी के बेहतरी के लिए धड़कता था।
राष्ट्रपति बनने का कभी दंभ नहीं रहा
उन्हें राष्ट्रपति बनने का कभी दंभ नहीं रहा। जब वह राष्ट्रपति बने तो भी हम दोस्तों के साथ बेतकल्लुफी के साथ वक्त गुजारते थे। अमूमन कोई राष्ट्रपति ऐसा करता नहीं है, उसमें राष्ट्रपति भवन की गरिमा और उसका अभिमान आ जाता है। मगर कलाम साहब अपने पूर्ववर्तिंयों में सबसे जुदा थे।
वह हमारे साथ राष्ट्रपति भवन के गार्डन में समय देते और हमारे बीच खूब बातचीत होती। मगर इस दौरान भी वह कभी विज्ञान या अंतरिक्ष की चर्चा नहीं करते। वह लोगों की जिंदगी के बारे में बात करते। देश की समस्याओं के हल के बारे में बातें करते। राष्ट्रपति भवन में भी वह छोटे-छोटे से कर्मचारियों के सुख-दुख का ख्याल रखते थे।
उनसे मिलते-जुलते, उनकी तकलीफें सुनते थे। राष्ट्रपतीय ठाट बाट उन्हें कभी रास नहीं आया। अक्सर वह प्रोटोकॉल तोड़ देते। बच्चों से मुलाकात के दौरान तो वह खुद बच्चे हो जाते। यही वजह है कि ताउम्र बच्चों से मिलने में उन्होंने कभी गुरेज नहीं किया। लाखों बच्चों से मिले। भारत के बारे में, जिंदगी के बारे में और समाज के बारे में उनके नजरिये को अपने साथ साझा किया।
वे बच्चों की जिज्ञासा और उत्सुकता को शांत करने की कोशिश करते। भले ही कोई बच्चा बार-बार एक ही सवाल पूछता, मगर वह कभी नाराज नहीं होते। उन्हीं के बीच बैठकर उनकी सवालों का जवाब देते।
वह घूमते भी बहुत थे। इस दौरान वह किताबें भी लिखते। उनके जाने का दुख तो बहुत है, मगर एक खुशी यह होती है कि हिंदुस्तान को ऐसा राष्ट्रपति मिला, जिसने सही मायने में जिंदगी को जाना। जो आम लोगों का राष्ट्रपति था। जिससे बच्चे, महिलाएं और बूढे़ सभी प्यार करते थे। (दिनेश मिश्र से बातचीत पर आधारित)