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तीस साल बाद टूटी 'गठबंधन की बैसाखी'

Fri, 16 May 2014 06:46 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Fri, 16 May 2014 06:46 PM IST
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end of alliance after thirty years
पिछले तीस साल का रिकार्ड उठाकर देखा जाए तो कांग्रेस और भाजपानीत सरकारों पर गठबंधन की राजनीति हावी रही है।
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इंद्र कुमार गुजराल, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, एच डी देवैगोड़ा, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की गठबंधन की मजबूरी में सहयोगियों के दबाव में कई ऐसे फैसले शायद नहीं ले पाए जो वो अपने दम पर बनी सरकार में ले सकते थे।

दरअसल गठबंधन की राजनीति की मजबूरियां भी सरकार को अपने दम पर फैसले लेने नहीं देती।

अकेले दम पर लोकसभा पहुंची भाजपा

end of alliance after thirty years

क्षत्रपों के बढ़ते दखल के चलते पिछली कई सरकारें दबाव में फैसले करती आई जो अवाम के साथ साथ लोकतंत्र के लिए भी सही नहीं रहे। लेकिन इस बार भाजपा अकेले दम पर ही इतनी सीटें जीतने में कामयाब रही है कि उसे किसी और दल की जरूरत नहीं रहेगी।

नई सरकार को गठबंधन की बैसाखी की जरूरत न रहे इसके लिए मतदाताओं की बंपर वोटिंग ने बड़ा योगदान दिया।

हालांकि इस चुनाव में कई क्षत्रपों को मायूसी हासिल हुई है लेकिन स्थिर और बहुमत पाने वाली सरकार के नाम पर यह मायूसी बड़ी नहीं है।

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एंटी इन्कम्बेंसी फैक्टर

end of alliance after thirty years

गठबंधन सरकारों की विवशता को देखते हुए इस बार मतदान में एंटी इन्कम्बेंसी फैक्टर हावी रहा।

कांग्रेस के दस साल के शासनकाल को खारिज करते हुए मतदाताओं ने एक नई सरकार को इतना मजबूत कर दिया है कि आने वाले पांच साल में उसे किसी क्षत्रप या सहयोगी की मनमानी नहीं सहनी पड़ेगी।

हो सकता है कि भावी केंद्र सरकार को मिली ये मजबूती की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ साथ जनता के लिए भी लाभदायक हो।

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