जुमलों की राजनीति से पीछे छूटे असल मुद्दे
चुनाव की प्रक्रिया खत्म हो चुकी है। अब शायद अच्छे दिन आने वाले हैं। अब शायद हर हाथ शक्ति और हर हाथ तरक्की मिलने वाली है। या शायद ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला और फिर एक बार जिंदा कौमे अगले पांच साल इंतजार करने वाली हैं। आने वाले समय की इन बातों का सच क्या होगा यह समय बताएगा।
मगर बीते समय पर नजर डालें और सोचें कि इस लोकसभा चुनाव ने हमें क्या-क्या दिया तो उसमें एक बड़ी दौलत उन जुमलों के रूप में सामने आएगी जो नेताओं के मुंह से निकले और सोशल नेटवर्किंग साइट्स से लेकर लोगों की बोलचाल तक में शामिल हो गए।
चुनाव प्रचार के आखिरी दौर तक नेताओं ने एक-दूसरे पर शब्दबाण बरसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कई बार नेताओं ने इन बयानों पर माफी मांगी और कई बार वे अपनी बात पर अड़े रहे। मगर सवाल ये है कि क्या ये महज जाने-अनजाने मुंह से निकले कुछ शब्द हैं या फिर इनके पीछे भी एक अलग तरह की राजनीति थी।
असल मुद्दों से भटकाने की कोशिश
समाजशास्त्री मणिंद्र ठाकुर की मानें तो, 'इस तरह की भाषा का इस्तेमाल भी एक अलग तरह की राजनीति के तहत ही आता है। इसे जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाने की रणनीति कहा जा सकता है।'
यह रणनीति हो या राजनीति, नतीजे में हमारे सामने हैं 'नमो चाय', '56 इंच का सीना', 'एके-49', 'आरएसवीपी', 'टॉफी मॉडल', 'नमूना', 'मैंने बेटा दिया है ख्याल रखना', 'मैं बीजेपी की बेटी हूं', 'देश का चौकीदार', 'मोदी की आंधी', 'मोदी की लहर'...। इन जुमलों की लहर का आलम यह रहा कि एक बार तो खुद नरेंद्र मोदी को ही अपने लिए इस्तेमाल किए जा रहे एक जुमले को नकारना पड़ा।
'हर-हर मोदी, घर-घर मोदी' के बदस्तूर इस्तेमाल और इस पर हो रही आलोचना के चलते मोदी ने अपील की थी कि इस जुमले का इस्तेमाल न किया जाए। मंणिंद्र कहते हैं, ''चुनाव के समय नेताओं की भाषा को जनता द्वारा सबसे ज्यादा ग्रहण किया जाता है, क्योंकि इस वक्त हर आयु और समुदाय वर्ग का व्यक्ति इस बात पर गौर करता है कि कौन सा नेता क्या कह रहा है। उनकी भाषा सामूहिक चेतना का हिस्सा बन जाती है, इसलिए उनके कहे शब्दों को आम लोगों की जुबां पर आने में भी देर नहीं लगती।
दुर्भाग्य यह है कि इस बार नेता जैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वह फिल्मों की तरह द्विअर्थी है।'' मणिंद्र की मानें तो ऐसे शब्दों का इस्तेमाल जनता का ध्यान असल मुद्दों से हटाने के लिए भी किया जाता है, क्योंकि कुल-मिलाकर सभी राजनीतिक पार्टियों के मूल एजेंडे एक जैसे ही होते हैं।
'सख्ती से लागू किए जाएं कानून'
इस पर संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप की राय भी अलग नहीं है। सुभाष कश्यप कहते हैं, ''नेताओं के भड़काऊ बयानों पर इलेक्शन कमीशन भी कार्रवाई करता है और उन पर इंडियन पीनल कोड के तहत भी एफआईआर दर्ज की जा सकती है। इससे पहले भी कई नेताओं पर ऐसी एफआईआर दर्ज होती रही हैं। ऐसे ही एक मामले में बाल ठाकरे के वोटिंग अधिकार भी कुछ समय के लिए खत्म कर दिए गए थे।
इन कानूनों को और सख्ती से लागू किया जा सकता है, मगर किसी को तमीजदार बनाने में कानून या इलेक्शन कमीशन से ज्यादा भूमिका व्यक्ति के खुद के विवेक की होती है। नेताओं ने इन चुनावों में जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया उनसे समाज में तेजी से हो रहे चारित्रिक ह्वास के ही संकेत मिलते हैं।''
नतीजे आने के बाद शायद लोकसभा चुनाव 2014 एक अलग तरह से इतिहास में दर्ज किए जाएंगे, मगर नेताओं के इन द्विअर्थी जुमलों की यादें भी जनता के जेहन में कई अर्थों में शामिल रहेंगी।