फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   eletions_issues_leaders_loksabha election 2014

जुमलों की राजनीति से पीछे छूटे असल मुद्दे

Mon, 12 May 2014 05:05 PM IST
Updated Mon, 12 May 2014 05:05 PM IST
विज्ञापन
eletions_issues_leaders_loksabha election 2014

चुनाव की प्रक्रिया खत्म हो चुकी है। अब शायद अच्छे दिन आने वाले हैं। अब शायद हर हाथ शक्ति और हर हाथ तरक्की मिलने वाली है। या शायद ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला और फिर एक बार जिंदा कौमे अगले पांच साल इंतजार करने वाली हैं। आने वाले समय की इन बातों का सच क्या होगा यह समय बताएगा।

विज्ञापन


मगर बीते समय पर नजर डालें और सोचें कि इस लोकसभा चुनाव ने हमें क्या-क्या दिया तो उसमें एक बड़ी दौलत उन जुमलों के रूप में सामने आएगी जो नेताओं के मुंह से निकले और सोशल नेटवर्किंग साइट्स से लेकर लोगों की बोलचाल तक में शामिल हो गए।
विज्ञापन


चुनाव प्रचार के आखिरी दौर तक नेताओं ने एक-दूसरे पर शब्दबाण बरसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कई बार नेताओं ने इन बयानों पर माफी मांगी और कई बार वे अपनी बात पर अड़े रहे। मगर सवाल ये है कि क्या ये महज जाने-अनजाने मुंह से निकले कुछ शब्द हैं या फिर इनके पीछे भी एक अलग तरह की राजनीति थी।

विज्ञापन
विज्ञापन

असल मुद्दों से भटकाने की कोशिश

eletions_issues_leaders_loksabha election 2014

समाजशास्त्री मणिंद्र ठाकुर की मानें तो, 'इस तरह की भाषा का इस्तेमाल भी एक अलग तरह की राजनीति के तहत ही आता है। इसे जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाने की रणनीति कहा जा सकता है।'

यह रणनीति हो या राजनीति, नतीजे में हमारे सामने हैं 'नमो चाय', '56 इंच का सीना', 'एके-49', 'आरएसवीपी', 'टॉफी मॉडल', 'नमूना', 'मैंने बेटा दिया है ख्याल रखना', 'मैं बीजेपी की बेटी हूं', 'देश का चौकीदार', 'मोदी की आंधी', 'मोदी की लहर'...। इन जुमलों की लहर का आलम यह रहा कि एक बार तो खुद नरेंद्र मोदी को ही अपने लिए इस्तेमाल किए जा रहे एक जुमले को नकारना पड़ा।

'हर-हर मोदी, घर-घर मोदी' के बदस्तूर इस्तेमाल और इस पर हो रही आलोचना के चलते मोदी ने अपील की थी कि इस जुमले का इस्तेमाल न किया जाए। मंणिंद्र कहते हैं, ''चुनाव के समय नेताओं की भाषा को जनता द्वारा सबसे ज्यादा ग्रहण किया जाता है, क्योंकि इस वक्त हर आयु और समुदाय वर्ग का व्यक्ति इस बात पर गौर करता है कि कौन सा नेता क्या कह रहा है। उनकी भाषा सामूहिक चेतना का हिस्सा बन जाती है, इसलिए उनके कहे शब्दों को आम लोगों की जुबां पर आने में भी देर नहीं लगती।

दुर्भाग्य यह है कि इस बार नेता जैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वह फिल्मों की तरह द्विअर्थी है।'' मणिंद्र की मानें तो ऐसे शब्दों का इस्तेमाल जनता का ध्यान असल मुद्दों से हटाने के लिए भी किया जाता है, क्योंकि कुल-मिलाकर सभी राजनीतिक पार्टियों के मूल एजेंडे एक जैसे ही होते हैं।

'सख्ती से लागू किए जाएं कानून'

eletions_issues_leaders_loksabha election 2014

इस पर संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप की राय भी अलग नहीं है। सुभाष कश्यप कहते हैं, ''नेताओं के भड़काऊ बयानों पर इलेक्शन कमीशन भी कार्रवाई करता है और उन पर इंडियन पीनल कोड के तहत भी एफआईआर दर्ज की जा सकती है। इससे पहले भी कई नेताओं पर ऐसी एफआईआर दर्ज होती रही हैं। ऐसे ही एक मामले में बाल ठाकरे के वोटिंग अधिकार भी कुछ समय के लिए खत्म कर दिए गए थे।

इन कानूनों को और सख्ती से लागू किया जा सकता है, मगर किसी को तमीजदार बनाने में कानून या इलेक्शन कमीशन से ज्यादा भूमिका व्यक्ति के खुद के विवेक की होती है। नेताओं ने इन चुनावों में ‌जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया उनसे समाज में तेजी से हो रहे चारित्रिक ह्वास के ही संकेत मिलते हैं।''

नतीजे आने के बाद शायद लोकसभा चुनाव 2014 एक अलग तरह से इतिहास में दर्ज किए जाएंगे, मगर नेताओं के इन द्विअर्थी जुमलों की यादें भी जनता के जेहन में कई अर्थों में शामिल रहेंगी।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed