बिजली की भरमार, फिर भी मचा हाहाकार
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लगातार नए रिकॉर्ड बनाती भीषण गर्मी के बीच बिजली कटौती ने लोगों को हाल बेहाल कर दिया है। ऐसे में बिजली की बढ़ती मांग के आगे अधिकतर राज्यों की वितरण कंपनियों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि देश में बिजली की कोई कमी नहीं है और मांग से ज्यादा उत्पादन हो रहा है।
मगर पुरानी हो चुकी वितरण प्रणाली और खस्ताहाल ट्रांसमिशन नेटवर्क के चलते दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य लोगों को सुविधा मुहैया कराने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। साथ ही ये राज्य महंगी दर पर बिजली खरीदने की बजाय लोड शेडिंग जैसे उपाय को अपनाना ज्यादा बेहतर समझ रहे हैं।
बिजली है पर बेच नहीं रहे हैं
आलम यह है कि हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों के हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट अतिरिक्त बिजली का उत्पादन तो कर रहे हैं, लेकिन उसे अन्य राज्यों को बेच नहीं पा रहे हैं। अन्य राज्यों के विद्युत बोर्ड (एसईबी) बहुत ज्यादा घाटे में चल रहे हैं और अतिरिक्त बिजली खरीदने के लिए उनके पास पैसा ही नहीं है।
इसी वजह से भारी बिजली कटौती झेल रहे उत्तर प्रदेश को हिमाचल प्रदेश ने अतिरिक्त बिजली देने से इनकार कर दिया क्योंकि वह पिछला बकाया नहीं चुका पा रहा है। यहां तक कि अगर कुछ राज्य बिजली खरीद भी रहे हैं, तो उपयुक्त वितरण प्रणाली न होने की वजह से स्थिति संभल नहीं पा रही है।
स्थिति यह है कि राज्य बिजली बोर्ड 2 लाख करोड़ से भी ज्यादा के घाटे में चल रहे हैं। उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्य ऊर्जा मंत्रालय के वित्तीय पुनर्गठन पैकेज का भी लाभ उठाने में नाकाम रहे हैं। ऊर्जा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, ‘देश में बिजली की भारी मांग है, लेकिन राज्य सरकारें बिजली खरीदना नहीं चाहतीं। इसकी बजाय वे लोड शेडिंग और बिजली कटौती को ज्यादा बेहतर उपाय मान रही हैं।’
मांग से ज्यादा है उत्पादन
केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (सीईआरसी) के अध्यक्ष गिरीश प्रधान ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में कहा कि देश में बिजली की कोई कमी नहीं है, लेकिन राज्य सिर्फ इसलिए खरीदना नहीं चाहते क्योंकि इसके लिए उन्हें ज्यादा कीमत चुकानी होगी।
उन्होंने कहा, ‘देश में 2.50 लाख मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता है जबकि मांग 1.55 लाख मेगावाट की है। ऐसे में मुझे समझ नहीं आ रहा कि आखिर क्यों लोग बिजली की कमी को लेकर विरोध कर रहे हैं।’
उन्होंने बताया कि अधिकतर राज्य पुराने प्लांट एनटीपीसी से ही बिजली खरीदना चाहते हैं क्योंकि वह 3 से 4 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली मुहैया कराता है। लेकिन एनटीपीसी सभी की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता। इसी वजह से न सिर्फ राज्य सरकारें बल्कि प्राइवेट डेवलपर्स भी बिजली के अतिरिक्त उत्पादन को नहीं बेच पा रहे हैं।
बिजली की मात्रा है खूब
इंडिया एनर्जी एक्सचेंज के अधिकारियों के मुताबिक दो में से एक पावर एक्सचेंज ने अपनी कीमत में कमी की है क्योंकि मांग से ज्यादा सप्लाई है। उदाहरण के तौर पर अगस्त, 2013 में रोजाना औसतन करीब 7500 मेगावाट बिजली उपलब्ध थी, लेकिन सिर्फ 4000 मेगावाट बिजली ही खरीदी गई।
हिमाचल प्रदेश में स्थित हाइड्रो पावर की क्षमता 23 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन की है। इनमें से 8432.47 मेगावाट पहले से ही लगाया जा चुका है। जबकि बाकी के 7000 मेगावाट उत्पादन के प्रोजेक्ट भी जल्द ही शुरू होने वाले हैं। केंद्र सरकार की नीति के अनुसार करीब 600 मेगावाट बिजली तो उन्हें रॉयल्टी के रूप में ही मिल जाती है।
इसके अलावा अन्य प्रोजेक्ट से उन्हें 300 मेगावाट बिजली मिल जाती है। पिछले साल हिमाचल इस अतिरिक्त 900 मेगावाट में से सिर्फ 400 मेगावाट बिजली को ही बेच पाया। बाकी की बिजली के लिए उन्हें खरीददार ही नहीं मिला। इस कारण उन्हें 40 फीसदी बिजली कम दाम पर पावर एक्सचेंज को बेचनी पड़ी।
हिमाचल को नहीं मिल रहे खरीददार
पिछले साल नवंबर में हिमाचल प्रदेश ने विभिन्न डिस्कॉम्स को पत्र लिखकर कुल्लू जिले के रामपुर हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट से अपने हिस्से की 108 मेगावाट बिजली बेचने का प्रस्ताव दिया था। मगर महीने बीत जाने के बावजूद किसी ने भी इसमें रुचि नहीं दिखाई। हिमाचल को करीब 1200 मेगावाट बिजली की जरूरत पड़ती है, जिसकी पूर्ति आसानी से हो जाती है।
क्या है स्थिति
2.50 लाख मेगावाट है देश की बिजली उत्पादन क्षमता
1.55 लाख मेगावाट है देश की कुल मांग
90 हजार मेगावाट अतिरिक्त उत्पादन है देश में
यूपी में 1015 मेगावाट बिजली की कमी
उत्तर प्रदेश में बिजली की कुल मांग 13,195 मेगावाट तक पहुंच चुकी है, जबकि सप्लाई करीब 12,180 मेगावाट है। 1015 मेगावाट बिजली कम पड़ने की वजह से राज्य को भारी बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा है।
केंद्र के कोटे से राज्य को 6282 मेगावाट बिजली मिल रही है जबकि 4923 मेगावाट क्षमता का यूपी का अपना पावर प्लांट 50 फीसदी यानी 2727 मेगावाट बिजली का ही उत्पादन कर पा रहा है। इसके अलावा वितरण और ट्रांसमिशन के भी सही ढंग से न होने की वजह स्थिति खराब है।
बिजली खरीदने से बेहतर लोड शेडिंग
राज्यों की बिजली वितरण कंपनियां महंगी दर पर बिजली खरीद लोगों को राहत देने की बजाय लोड शेडिंग और बिजली कटौती को बेहतर मान रहे हैं। ऊर्जा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक देश में बिजली की जबरदस्त मांग हो रही है, लेकिन उस पर सही ढंग से ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इसकी बजाय लोड शेडिंग की जा रही है।