चुनावी चकल्लसः BJP क्यों करती है नकल?
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भाजपा वाले नया कुछ नहीं करते हैं। दूसरे के फार्मूले को चुपके से अपना बनाने की कोशिश करते हैं। दिल्ली में कई साल तक शीला दीक्षित की सरकार बनी रही। लेकिन भाजपा भी चैन से सोती रही।
एक आक्रामक और सजग विपक्षी होने का आभास कहीं से नहीं दिया। जो काम दिल्ली में भाजपा को करना था वह अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों ने किया। फिर भाजपा को लगा कि दिल्ली सरकार का विरोध करने लायक भी कुछ बातें हैं।
बिजली पानी तमाम मुद्दों पर भाजपाई भी झंडा बुलंद करने लगे। लेकिन बाजी तो केजरीवाल ने मार ली थी। अब जब केजरीवाल केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के विरोध में धरने प्रदर्शन के लिए आए तो भाजपा को कहीं कुछ सूझा नहीं।
भाजपाईयों के विचार विमर्श में यही निकला कि किसी तरह सोमनाथ के कारण ही सही एक धरना प्रदर्शन का शानदार कार्यक्रम हो जाए। इस बहाने आंदोलन के नाम पर एक इंट्री हो जाए।
और पार्टी कुछ करने के लिए लिए मचल रही है, यह संदेश भी जनता के पास जाए। लिहाजा 26 जनवरी के बाद भाजपाई भी अपनी केसरी टोपी लगाए दिल्ली की सड़कों पर होंगे। वो भी पीछे क्यों रहें।
क्यों भूले नेताजी को
देश में तीन बड़ी रैलियां। धारदार भाषण। मुहावरों से युक्त भाषा। प्रहार और व्यंग्य। लोगों को लुभाने की आकर्षक शैली। एक दूसरे पर तंज। सब कुछ सुनने-देखने को मिला।
बनारस में सपा के सुप्रीमो मुलायम सिंह थे तो गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ की भूमि से नरेंद्र मोदी धारदार भाषण कर रहे थे। शिवसेना से उम्मीद नहीं होती कि महाराष्ट्र के बाहर कहीं रैली करे तो उद्धव ठाकरे की रैली मुंबई में ही हुई।
तीनों रैलियों में मजमा जमा। लेकिन मोदी ने ही सुभाष चंद्र बोस को याद किया। 23 जनवरी को उनकी जयंती थी। उन्हें श्रद्धासुमन के रूप में ये वक्ता उनका स्मरण कर सकते थे।
अपनी अपनी पार्टी के लिए मुहिम संभाल रहे बाकी दोनों वक्ताओं को तो नेताजी की याद नहीं रही। अमेठी में अपनी राजनीतिक विरासत को संभाल रहे राहुल गांधी हो या राहुल को चुनौती देने के लिए डोर टू डोर कैंपेनिंग करने वाले कुमार विश्वास किसी ने भी नेताजी का जिक्र करना मुनासिब नहीं समझा। और तो और संसद के केंद्रीय भवन में जयंती समारोह में भी लालकृष्ण आडवाणी को छोड़कर कोई मंत्री सांसद वहां नहीं पहुंचा।
संत स्वभाव
शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का कहना है कि कोई व्यक्ति उनके निकट नहीं आए। लेकिन डॉक्टरों ने यह नहीं कहा था कि कोई निकट आ ही जाए तो उसे तमाचा मार दिया जाए। पर संत स्वभाव डगमगा गया।
संतजी को पत्रकार का निकट आना नहीं भाया या निकट से कही गई कोई बात नहीं भाई लेकिन उन्होंने तमाचा मार ही दिया। संत स्वभाव ने कई चर्चाओं को जन्म दे दिया। आज के समय में संत खांचों में बंटे हैं। कोई कांग्रेसी कोई भाजपाई।
यहां तक कि मुलायम सिंह की पार्टी भी कुछ संतों का नाम लेकर कहती है कि असली संत तो वह है। खैर इतना जरूर है कि संत स्वरूपानंद सरस्वती ने जो किया उसके बाद लोगों के लिए यह संकेत की तरह हो सकता है कि किसी के बहुत निकट नहीं जाए।
जब संत को गुस्सा आ सकता है तो आम आदमी का क्या कहना। कब किस बात पर गुस्सा आ जाए। संतों की महिमा अलग है।
कोई कह रहा है कि संत स्वरूपानंदजी से अलग निकट आकर राहुल भइया के बारे में कुछ पूछा होता तो जवाब भी मिलता और प्रसाद में फूल नैवेद्य भी। पर पत्रकार की गलती यह थी कि पूछ कुछ और लिया था।
राहुल की कार में बैठने का सौभाग्य
राहुल गांधी की कार में बैठने का सौभाग्य किसी किसी को मिल पाता है। दूर न जाए कांग्रेस में ही कई जले भुने रहते हैं कि फलां राहुलजी की बगल में बैठा है।
फिर अमेठी में राहुल गांधी आएं और किसी अपरिचित को थोड़ी देर के लिए ही सही अपनी गाड़ी में बिठा लें तो वह तो बाग बाग हो जाए। ऐसा हमेशा नहीं हो पाता। लेकिन कब राहुल का मूड है कि किसी को कहें,आइए गाड़ी में बैठिए।
गाड़ी में बैठना ही नहीं, कुछ लोगों को साथ चाय पीने का, तो कुछ लोगों को पांच दस कदम साथ टहल कर जाने का सौभाग्य मिलता है।
एक तरह से जीवन का ऐसा अनुभव जिसे वह सालों सुनाते रहेंगे कि किस तरह राहुलजी के साथ बैठकर चाय पी ली थी। अमेठी में ऐसे दृश्य दिख जाते हैं। इस बार राहुलजी ने अमेठी की एक महिला को कार में सम्मान दिया।
पीछे की सीट पर प्रियंका भी बैठी हुई थीं। बस उस महिला के लिए यह गौरव की बात थी। वह आगे की सीट पर बैठी मगर दरवाजा खोल दिया और फिर भाषण देने लगी।
जाहिर है भाषण यही कि राहुलजी अमेठी के हैं। हमारे हैं। उसके चेहरे से उसकी खुशी झलक रही थी। प्रियंका ने भी होले से उसकी पीठ थपथपाई। अमेठी में कुछ ऐसे नजारे आपको दिखते रहेंगे।