जानिए, कैसा रहेगा बनारस का चुनावी दंगल?
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उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी शतरंज की शुरुआत पूरे ज़ोर-शोर से कर दी है। वाराणसी से नरेंद्र मोदी के प्रत्याशी बनाए जाने के बाद पार्टी में एक नया जोश नज़र आ रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस खेमा विभाजित लगता है।
वैसे अभी कांग्रेस ने वाराणसी सीट से अपना प्रत्याशी घोषित नहीं किया है लेकिन ऐसे क़यास लगाए जा रहे हैं कि इस बार पार्टी राजेश मिश्रा के बजाए अजय राय को टिकट देगी। अजय राय भूमिहार हैं और वाराणसी में लगभग डेढ़ लाख भूमिहार हैं। लेकिन डर इस बात का है कि राजेश मिश्रा का टिकट कटने से दो लाख के आसपास ब्राह्मण नाराज़ हो जाएंगे।
एक कारण जिसकी वजह से राय को कांग्रेस के कार्यकर्ता पूरी तरह स्वीकार नहीं करेंगे वह है उनका भाजपा से सम्बन्ध। वे तीन बार यहाँ से भाजपा के विधायक रह चुके हैं और 2009 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं।
पहली बार पीएम प्रत्याशी होगा भोले की नगरी से
राजेश मिश्रा एक बार वाराणसी से कांग्रेस के सांसद रह चुके हैं लेकिन इस बार पार्टी को लग रहा है कि अन्य पिछड़ी जाति के वोट के साथ ब्राह्मण वोट भी भाजपा को जाएंगे जबकि भूमिहार वोट के साथ शायद ऐसा न हो।
यह पहली बार होगा कि बाबा भोलेनाथ की नगरी काशी से कोई प्रत्याशी प्रधानमंत्री पद का मजबूत दावेदार होगा। यह भी पहली बार हो रहा है कि एक अन्य पिछड़ा जाति का व्यक्ति यहाँ से लोकसभा के लिए भाजपा का प्रत्याशी है। इससे पहले साल 2009 में मुरली मनोहर जोशी यहाँ से जीते थे।
तीन बार- 1996, 1998 और 1999 में एसपी जायसवाल भाजपा के सांसद रहे और 1991 में श्रीश चन्द्र दीक्षित भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते। इस बार भाजपा उत्तर प्रदेश में नए जातीय समीकरण के साथ इस उम्मीद से मैदान में उतर रही है कि वह साल 1998 का इतिहास दोहरा सके।
पार्टी की कोशिश रहेगी कि वो यूपी की 80 सीटों में कम से कम 50 सीट जीत सके। नरेन्द्र मोदी पार्टी को कुल कितनी सीट दिला पायेंगे अभी कहना मुश्किल होगा लेकिन उनकी ख़ुद की जीत सुनिश्चित लग रही है।
कमजोर होते विरोधी प्रत्याशी
ध्यान देने योग्य बात यह है कि समाजवादी पार्टी ने वाराणसी सीट के लिए मोदी के खिलाफ एक ऐसे प्रत्याशी को टिकट दिया है जिसे कई लोग कमज़ोर प्रत्याशी मान रहे हैं। मिर्ज़ापुर से सपा के विधायक कैलाश चौरसिया पहली बार इस क्षेत्र से संसद का चुनाव लड़ेंगे। सपा के मुस्लिम-यादव वोट बैंक की राजनीति को क़ौमी एकता दल के प्रत्याशी मुख़्तार अंसारी से झटका लग सकता है।
साल 2009 में अंसारी बहुजन समाज के प्रत्याशी थे और मुरली मनोहर जोशी से तक़रीबन 17-18 हज़ार वोट से हारे थे। यदि किसी कारण से अंसारी चुनाव नहीं लड़ते हैं तो मुस्लिम वोट कांग्रेस को मिलने की संभावना रहेगी। सपा की तरह बहुजन समाज पार्टी ने भी जिसे चुनाव में उतारा है उसे राजनीतिक जानकार एक अजनबी को प्रत्याशी बनाया है।
पार्टी के प्रवक्ता कहते हैं कि फिलहाल विजय प्रकाश जायसवाल उनके प्रत्याशी हैं लेकिन हो सकता मायावती अब कुछ और निर्णय लें। जायसवाल को वे एक कर्मठ कार्यकर्ता बताते हैं। हो सकता है कि यह आकलन आज की स्थिति में ठीक हो, लेकिन वाराणसी से आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनौती स्वीकार करने का ऐलान किया है। यानी केजरीवाल यहाँ से लड़ते हैं तो इस ऐतिहासिक शहर में सारे चुनावी समीकरण एक नया आयाम ले लेंगे।