जानिए, दिग्गजों की टक्कर में काशी पर क्या-क्या गुजरी?
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फेसबुक पर एक दोस्त ने टिप्पणी की, 'हम पिछले एक महिन्ना से कह रहें हैं बनारस सुनता सबकी है, इसका ईं अर्थ कत्तई नहिं है कि उ सप्पोर्टर हो गया गया है।' बनारस से सैंकड़ों किलोमीटर दूर बैठकर लंका, गोदौलिया, नई सड़क या गोलगड्डा की भीड़ से शहर के वोटरों की नब्ज टटोलने की कोशिश कर रहे विश्लेषकों का ये नसीहत शायद ही गले उतरे।
नरेंद्र मोदी का हेलीकॉप्टर छोड़कर लंका से बारास्ते गोदौलिया, रथयात्रा होकर सिगरा तक जाना, और 6 किमी के रास्ते में दोनों और हजारों लोगों का हुजूम, अगले ही दिन ही उसी लंका से अरविंद केजरीवाल का रोडशो, और आज राहुलगांधी का शक्तिप्रदर्शन।
भीड़ को समर्थक और जनता को कार्यकर्ता मान चुके लोगों को बनारस ने 'कंफ्यूज' कर दिया है। अड़ीबाजी और अललटप्पूपने के लिए मशहूर बनारस के बारे में अब लोग तुक्के लगाने से भी डरने लगे हैं।
बनारस अपनी मुश्किलों के लिए याद रखेगा ये चुनाव
15 लाख से अधिक वोटरों की वाराणसी लोकसभा पिछले दो चुनावों में 45 फीसदी से भी कम मतदान की गवाह रही है। राजनीतिक दलों और मीडिया ने दो पखवाड़े में शहर को जैसे मथा है, उम्मीद है कि इस बार अधिक मतदाता घरों से बाहर निकलेंगे।
चुनाव प्रचार को शोर थमने के बाद कई नए समीकरण भी उभरेंगे। अगले 24 घंटों में वे नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल और अजय राय के समीकरणों में उलटफेर भी कर देंगे।
फिर भी ये शहर 16वीं लोकसभा चुनाव के सबसे बड़े रण को नतीजों के लिए नहीं, बल्कि मुश्किलों के लिए याद रखेगा।
किसी भी दल ने छात्र-छात्राओं की ध्यान नहीं रखा
दुनिया भर में 'सर्वविद्या की राजधानी' के रूप में पहचाना जाने वाराणसी शहर अप्रैल और मई महीनें में प्रवेश परीक्षाओं में व्यस्त रहता है। अप्रैल-मई महीने वाराणसी में तीन प्रमुख विश्वविद्यालयों और कई डिग्री कॉलेजों में प्रवेश परिक्षाओं का आयोजन किया जाता है।
केवल काशी हिंदु विश्वविद्यालय में ही 20 से अधिक प्रवेश परिक्षाएं आयोजित होती हैं, जिसमें औसतन 10 लाख छात्र-छात्राएं शामिल होते हैं। लेकिन चुनाव प्रचार के उत्साह में किसी भी दल ने छात्र-छात्राओं की ध्यान नहीं रखा, उनकी सुविधाओं के बारे में सोचना तो दूर की बात रही।
आठ मई को ये उत्साह हद पार कर गया। बेनियाबाग में रैली में से मना किए जाने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं ने सिंहद्वार पर ही धरना दिया। मीडिया, राहगीरों और भाजपा कार्यकर्ताओं की भीड़ ने परीक्षा देकर छूटे छात्र-छात्राओं को मुश्किल में डाल दिया।
विश्वविद्यालय को भी बना दिया राजनीति का अखाड़ा
राजनीतिक दलों की गतिविधियां बीएचयूगेट तक ही सीमित नहीं रही। उन्होंने विश्वविद्यालय कैंपस को भी राजनीति का अखाड़ा बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
आम आदमी पार्टी ने बगैर इजाजत कैंपस में प्रचार की कोशिश की, जिसकी वजह से बीएचयू प्रशासन को हस्तक्षेप कर उन्हें कैंपस से बाहर करना पड़ा। इसी प्रचार के दौरान अखिल भारतीय छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं से उनकी मुठभेड़ भी हुई है।
चर्चा ये रही है कि एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने आप की नेता गुलपनाग और रघु पर हमले किए। हालांकि गुलपनाग ने ऐसे किसी हमले से इनकार किया।
बनारस को ही कहना पड़ा, ये बनारस की संस्कृति नहीं
लगभग दो महीने पहले जब नरेंद्र मोदी की बनारस से चुनाव लड़ने की घोषणा हुई, आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल ने भी वहीं से चुनाव लड़ने की घोषणा की।
लोकतंत्र की प्रक्रिया में यकीन रखने वालों के लिए ये सामान्य घोषणा भर थी। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान ऐसे कई वाकये हुए, जिसके बाद बनारस के लोगों को ही कहना पड़ा, ये बनारस की संस्कृति नहीं।
अरविंद केजरीवाल ने बनारस में चुनाव लड़ने की घोषणा के लिए पहली बार शहर की यात्रा की तब उनपर स्याही फेंकी गई। कई बार शहर में आम आदमी पार्टी और भाजपा कार्यकर्ताओं में झड़प की स्थिति बनीं, जिससे स्थानीय लोगों को भी परेशानी हुई।
आम लोगों के सभी मुद्दे बातचीत से बाहर हो गए
काशी पर चुनाव का रंग चढ़ना शुरू हुआ तो विकास की चर्चा थी, स्थानीय मुद्दों का जिक्र था। लेकिन जैसे-जैसे ये रंग गाढ़ा हुआ आम लोगों के सभी मुद्दे बातचीत से बाहर हो गए।
केवल आरोपों-प्रत्यारोपों का शोरगुल रहा। कई स्थानीय सामाजिक संगठनों ने जनहित के मुद्दों को जोरशोर से उठाया। सांस्कृतिक और सामाजिक सवालों को उठाने के लिए जनसंगठनों ने मिलकर साझा सांस्कृतिक मंच और फासीवादी सांप्रदायिकता विरोधी मंच का गठन भी किया।
फिर भी वाराणसी के आर्थिक और सांस्कृति सवालों पर राजनीतिक दलों ने चर्चा की। घोषणापत्रों में हवाई सपनों के रूप में जरूर विकास के कुछ वादे किए गए।