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'ये है सबसे बड़ा सवालिया निशान!'

Sat, 03 May 2014 03:18 PM IST
पारुल अग्रवाल/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पारुल अग्रवाल/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Sat, 03 May 2014 03:18 PM IST
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एक अरब लोग, 80 करोड़ मतदाता, 543 सीटें और विश्व के इतिहास का दूसरा सबसे महंगा चुनाव, अगर ये आंकड़े मिलकर भी आपको भारत के 16वें लोकसभा चुनाव के प्रति आकर्षित नहीं कर पा रहे तो मेरी राय में इसकी दो ही वजह हो सकती हैं।

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पहली ये कि आप कवि तुलसीदास के उस वक्त से भक्त हैं जब उन्होंने कहा था 'कोऊ नृप होऊ हमें का हानी' और दूसरी ये कि दो महीने से चल रही चुनावी प्रक्रिया से अब आप बुरी तरह उकता गए हैं।
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सोशल मीडिया पर इन दिनों एक जुमला मशहूर है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोकसभा चुनावों का सस्पेंस इस क़दर बढ़ता जा रहा है कि वो दुनिया का सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह (?) बन गया है!

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थकाऊ और उबाऊ?

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मीडिया जुटा है चुनाव के पल-पल की ख़बर आप तक पहुंचाने में, इंटरनेट जुटा है हर ट्वीट हर बयान पर बहस को आगे बढ़ाने में और हर कोई हांफ रहा है पल-पल की इस ख़बर पर नज़र रखने और उसे समझने में।

लेकिन चुनाव अगर थकाऊ और उबाऊ होते जा रहे हैं तो इसकी ज़िम्मेदारी मीडिया पर है या करोड़ों रुपए खर्च कर दिन-रात प्रचार के ज़रिए हर मिनट, हर घर, हर टीवी, हर फ़ोन में जा घुसी राजनीतिक पार्टियों पर।

कार्टूनिस्ट मंजुल, इशारा मीडिया की तरफ करते हैं, ''टीवी के साथ ये है कि उन्हें हर चीज़ में ड्रामा चाहिए। कहीं दूर किसी ने कोई वाहियात सा बयान दे दिया, अब वो उसे तब तक चलाते रहेंगे जबतक उन्हें उस तरह का कोई दूसरा बयान नहीं मिल जाता। जितने लोग चुनाव नहीं लड़ रहे हैं उससे ज़्यादा तो मीडिया लोगों को लड़वाने में लगा है। इससे पगालपन थोड़ा बढ़ गया है।''

हंगामा है क्यों बरपा?

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ग़ुलाम अली की मशहूर ग़ज़ल से एक पंक्ति उधार लेकर कार्टूनिस्ट पवन से हमने इस 'हंगामे' का ज़िक्र छेड़ा तो उन्होंने कहा, ''जिस तेज़ी से और तादाद में नेताओं के भाषण और बयान सामने आ रहे हैं उसमें चुनाव आयोग कि समस्या है कि कहां-कहां तक, क्या-क्या नोट करें, किस-किस चीज़ का रिकॉर्ड रखें। मेरी तो अब टीवी खोलने की इच्छा नहीं होती, लोग मुझसे कहते हैं कि माहौल ही पूरी तरह से कार्टून बन गया है अब आप क्या कार्टून बनाएंगे।''

रेडियो मिर्ची से जुड़े आरजे नावेद अपने रेडियो स्टेशन पर लगातार चुनाव से जुड़ी गपशप करते हैं। उनका मानना है कि जनता ही नहीं नेता भी अब थकान का शिकार होने लगे हैं।

वो कहते हैं, ''नेताओं को अब भाषण भी रट गए हैं। मैंने एक नेता जी से बात की तो वो शहर के मुद्दों, अपने मुद्दों, अपने वोटरों के मुद्दों पर शुरु हो गए। मैंने कहा सर दिल्ली मुंबई से बस 'सी-साइड' और 'बीच' के मामले में पीछे रह गया है। नेताजी ने कहा कि ये मुद्दा भी मेरी नज़र में आया है। इस पर हम बिलकुल काम करेंगे।''

'दिल की बात कह डाली’

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इस बीच अमेरिका में रहने वाले मशहूर ब्रिटिश कॉमेडियन जॉन ऑलिवर ने पिछले दिनों अपने कार्यक्रम में अमेरिकी मीडिया की जमकर ख़बर ली है।

वो इस बात से नाराज़ हैं कि, ''पृथ्वी के सबसे बड़े चुनाव की ख़बर को अमेरिका तवज्जो देकर राज़ी नहीं, जबकि भारतीय मीडिया अमरीकी चैनलों की तर्ज पर चीखने-चिल्लाने, टीवी स्क्रीन को आखाड़ा बनाने और रंग-बिरंगे आंकड़ों के ज़रिए दर्शक को चकराने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा!’’

बीबीसी के फेसबुक पन्ने पर हमने अपने पाठकों से यही सवाल पूछा तो ज़्यादातर ने कहा कि ‘आपने तो हमारे दिल की बात कह डाली’। राज यादव लिखते हैं कि नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच टॉफी और चाकलेट का झगड़ा जारी है, इन्हें देखकर डर लगता है कि ये हमारे देश के प्रधानमंत्री होने को हैं।

ट्विटर पर शिवानी मोहन ने लिखा कि, ''काश ऐसा हो कि मुझे अब नींद आ जाए और जब मैं सोकर उठूं तो तारीख़ 16 मई हो!''

पार्टियों पर भारी पड़ेगी ऊब?

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हालांकि कुछ लोग इस ‘बोरियत’ से लगातार लड़ रहे हैं और हर कीमत पर इस 'आपा-धापी' को भारतीय लोकतंत्र का ज़रूरी हिस्सा मानते हैं। मिक्की लिखते हैं, ‘’दो महीने माना बोरियत भरे हैं लेकिन माफ़ कीजिए पांच साल का आराम भी तो आप ही हिस्से आएगा।''

लेकिन सवाल है कि चुनाव की ये ऊब क्या पार्टियों पर भारी भी पड़ सकती है?

इधर कुछ दिनों से राजनीतिक जानकार भाजपा की 'टूटती लहर' के कयास लगा रहे हैं। इस बीच हर मतदान से पहले अब नरेंद्र मोदी के ट्विटर अकाउंट से हज़ारों की संख्या में लोगों को ट्वीट किया जा रहा है कि, 'बदलाव अभी आया नहीं, लड़ाई अभी बाकी है। बड़ी से बड़ी संख्या में बाहर निकलें और वोट दें'

ऐसे में एक मित्र ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर एक टिप्पणी साझा की तो महसूस हुआ कि मामला गंभीर है। वो लिखते हैं, ''पिछले छह महीनों से हर कोई नरेंद्र मोदी को भारत के प्रधानमंत्री के रुप में देख रहा है, कहीं ऐसा न हो कि उनके खिलाफ़ ही सत्ता-विरोधी लहर (एंटी-इनकम्बेंसी) असर कर जाए!''

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