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चुनावी चकल्लस: बाजी किसके हाथ?

Wed, 22 Jan 2014 07:37 PM IST
Updated Wed, 22 Jan 2014 07:37 PM IST
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election discussion on arvind kejriwal dharna

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का पांच पुलिस वालों के निलंबन की मांग को लेकर धरना खत्म क्या हुआ, लोगों को गॉसिप का अच्छा सबजेक्ट मिल गया। आखिर जीत किसकी हुई।

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क्या केजरीवाल की, जिनके आंदोलन की वजह से दो पुलिस अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया या केंद्र की सियासी रणनीति की जिसके तहत मामला इतने में निपट गया। क्या दिल्ली क्या गाजियाबाद, हर जगह यही चर्चा थी। रिक्शे में बैठिए या बस में। आखिर जीता कौन। बस कोई एक व्यक्ति चर्चा की शुरूआत कर दे, फिर तो उस चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए कहीं कोई मशक्कत की जरूरत नहीं।
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भाजपाई सुर भी अपने आप पहचान में आ जाता है जह कोई कह देता था देखिए कोई धरना वरना नहीं, ये तो कांग्रेस और केजरवाल की मिली भगत है। न तो पुलिस अधिकारियों को निलंबित होना था, न केजरीवाल के धरने ने दो दिन से आगे चलना था। बस हंगामा हो गया और आप को चर्चा मिल गई। एक ने कहा, इस सरकार को जीने नहीं देगी कांग्रेस। दूसरे ने स्कावर कट लगाया, तो जीना भी कहां चाहती है अरविंद केजरीवाल की सरकार।

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आपके पास पुरानी क्लीपिंग है

election discussion on arvind kejriwal dharna

जब कहीं सार्वजनिक जगह में बोल रहे हों तो थोड़ा संभल कर बोलिए। कहीं ऐसा न हो आपकी थोड़ी असावधानी परेशानी का सबब बन जाए। कुमार विश्वास जब छह साल पहले अपनी तुकबंदियों से एक महफिल में छाने की कोशिश कर रहे थे, तो उन्हें क्या पता था कि आगे तब कही बातों से वो मुश्किल में पड़ जाएंगे।

इस तरह कि दूर केरल में भी उनके खिलाफ नारेबाजी होगी। न तो तब कुमार विश्वास ने राजनीति में आने की सोची होगी, न तब ऐसी कोई सुगबुगाहट थी जिसमें आने वाले समय में अन्ना के आंदोलन का उभार होना था। तब मंच में जो कह दिया वह वहीं सिमट कर रह जाता था। हां कवि आशुकवि अपनी महफिल लूट लेते थे।

कभी कभी शब्दों की मर्यादा पार भी हो जाती थी। लेकिन तब की कही बातें आज कुछ संगठनों और राजनीतिक पार्टियों के काम आ रही है। आज मोबाइल अत्याधुनिक हैं। फोटो और रिकार्डिंग की बेहतर क्वालिटी के साथ बाजार में छाए हैं। कब कहां कौन सी बात रिकार्ड हो जाए और सारे किए कराए पर पानी फेर दे, कह नहीं सकते। कम से कम कुमार विश्वास को जो झेलना पड रहा है, उससे इसे समझा जा सकता है।

अरुधंती की मम्मी

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अरुंधती की मम्मी मैरी भी राजनीति में आ रही हैं। बेशक वह स्वयं में सेलिब्रिटी नहीं है, लेकिन उनकी बिटिया अरुंधती जाना पहचानी शख्सियत हैं। अरुंधती का लेखन दक्षिणपंथियों के बीच आलोचना का केंद्र रहा है। वहीं अपने को प्रगतिशील कहने वाली धारा अरुंधती के साथ खड़ी हुई दिखती है।

वाद विवाद का दौर जब तब तला करता है। चाहे अरुंधती कश्मीर पर कुछ कह दें या असम के दंगों पर कुछ न कहें, उनको लेकर टिप्पणिया चलती रहती हैं। वह अपने आप भी सुर्खियों में आना जानती है। उन्हें पता रहता है कि क्या दो लाइन कहकर अगले दस बीस दिन चर्चा में बना रहा जा सकता है। वह स्वयं तो राजनीति में नहीं आई हैं लेकिन उनकी मम्मी की दिलचस्पी आप पार्टी के लिए जागी है।

वह शायद केरल में पार्टी के लिए सक्रिय हों। अब ऐसे समय जब आप पार्टी में प्रशांत भूषण के कश्मीर में जनमत संग्रह पर दिए बयानों से काफी हो हल्ला मचा है, अरुंधती की मम्मी भी इस पार्टी में शामिल हो रही है तो बयानबाजी, तीखी टिप्पणियों के लिए काफी गुंजाइश रहेगी।

अब मिथुन पर दांव

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देश की सभी राजनीतिक पार्टियां राज्यसभा के लिए फिल्म खेल की हस्तियों की ही तलाश कर रही है। राज्यसभा का औचित्य यही था कि जो समाज को दिशा देने वाले जो विलक्षण लोग लोकसभा के रास्ते संसद में नहीं आ पाते हैं उनके लिए राज्यसभा एक बेहतर माध्यम हो। आजादी के बाद से देश के विचारक, चिंतक राजनेता इस तरह राज्यसभा मे अपनी जगह बनाते रहे।

इसी के साथ फिल्म खेल जैसी विधाओं के लोगों भी मनोनीत सदस्य के तौर पर राज्यसभा को सुशोभित करते रहे हैं। लेकिन अब राजनीति में राज्यसभा में किसी भी तरह खेल फिल्म की हस्तियों को ज्यादा तवज्जो देने की परंपरा चल पड़ी है। यही लगने लगता है कि मानो राज्यसभा सेलिब्रिटी के लिए ही बनी है। मनोनीत सदस्यों के रूप में ही नहीं चुनाव लड़वाकर भी उनके लिए सीट का इंतजाम किया जाता है।

जया बच्चन, सचिन तेंदुलकर रेखा राज्यसभा में आए।  पश्चिम बंगाल में अपनी पहचान के लिए ललक रही भाजपा ने सौरभ गांगुली पर दांव चलना चाहा, लेकिन बात नहीं बनी। उधर ममता ने मिथुन के लिए रास्ता तैयार किया है। तृणमूल कांग्रेस के आकड़ों पर राज्यसभा के लिए तीन से पांच सीटों की जगह बन सकती है। लिहाजा तृणमूल पार्टी ने साफ कह दिया है कि एक सीट तो मिथुन के लिए तय कर ही ली है। यानी राज्यसभा में एक और सेलिब्रिटी।

सलमान तुम किसके साथ हो

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सलमान ने पंतग उड़ाते उड़ाते नरेंद्र मोदी की प्रंशसा क्या कर दी, मीडिया, कांग्रेस और कुछ लोग उनके पीछे पड़ गए हैं। हैदराबाद के सांसद अल्लाउदीन ओबेसी ने तो यहां तक ऐलान कर दिया कि सलमान खान की पिक्चर जय हो देखने न जाएं। सलमान और विवाद एक दूसरे के पूरक है।

सलमान होंगे तो विवाद तो होंगा ही। लेकिन यहां मामला राजनीतिक करवट का है। वह भी ऐसे समय जब लोकसभा चुनाव बिल्कुल सामने हो और एक एक शब्द अपना महत्व रख रहे हैं। इसलिए पतंग की पेंच में सलमान पतंग की डोर की तारीफ नहीं कर रहे थे, बल्कि उन्होंने सीधे सीधे नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में कही जिनपर भाजपा का दारोमदार है।

फिर भला कांग्रेस क्यों चुप रहती। शुरु में कुछ स्वर उभरे। कहां जाने लगा कि मोदी सलमान खान के पिता सलीम खान को राजसभा की सीट दिलाएंगे। लेकिन बाद में पार्टी को लगा होगा कि सलमान के बारे में ज्यादा न कहा जाए तो अच्छा। दिक्कत यही कि वह पार्टी स्तर पर सीधे सलमान का विरोध भी नहीं कर सकती।

लता मंगेशकर के मामले में भी पार्टी के प्रवक्ताओं की आलोचना को गंभीरता से नहीं लिया गया। लिहाजा कांग्रेस के लिए सुकून की बात यही थी कि मोदी की तो प्रशंसा हो गई कुछ प्रशसा कांग्रेस के नेताओं की भी हो जाए। दरियादिल सलमान ने उन्हें भी निराश नहीं किया। अब कांग्रेसी खुश हो रहे हैं कि सलमान ने उनके नेताओं की भी प्रशंसा की।

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