कौन चाहता है कि भारत में बैन हो जाए अंडा?
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पिछले कुछ सालों से भारत के कई राज्यों ने स्कूलों या आंगनबाड़ी केंद्रों या फिर दोनों जगहों पर मिड डे मील में अंडा परोसना शुरू किया है। यह क़दम सामाजिक नीति के क्षेत्र में हुए बेहतरीन चीज़ों में एक है। भारतीय बच्चे दुनिया के सर्वाधिक कुपोषित बच्चों में शुमार हैं।
उन्हें प्रोटीन, विटामिन, आयरन तथा अन्य ज़रूरी पोषक-तत्वों से भरपूर भोजन नहीं मिल पाता। रोज़ाना अंडा खाने से उन्हें पलने-बढ़ने और सोचने-समझने में मदद मिलेगी। दरअसल बढ़ते हुए बच्चों के लिए अंडा एक बेहतरीन आहार है। इसमें विटामिन सी को छोड़कर शेष सभी पोषक-तत्व होते हैं।
बेहतरीन आहार
आंगनबाड़ी केंद्रों पर मिलने वाले अंडे का राज्यवार ब्यौरा। मिड डे मील में अंडे को शामिल करने के पक्ष में कम से कम तीन तर्क और दिए जा सकते हैं। एक तो यह कि ज़्यादातर बच्चे (ख़ासकर ग़रीब घरों के) चाव से अंडा खाते हैं। मिड डे मील में अंडा परोसने से स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने में मदद मिलेगी और उनके लिए खुशनुमा माहौल बनेगा।
दूसरा यह कि समेकित बाल विकास कार्यक्रम को इससे पुनर्जीवन मिलेगा जो कि कई राज्यों में अब भी जैसे-तैसे चल रहा है। तीसरी बात यह है कि मुर्गी-पालन ग्रामीण परिवारों और महिला स्व-सहायता समूहों के लिए एक स्थानीय रोजगार है। स्कूली भोजन में अंडा परोसने का काम सबसे पहले तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश जैसे राज्यों में हुआ।
सकारात्मक अनुभव
आज, तमिलनाडु में स्कूलों में हफ्ते में पांच बार और आंगनबाड़ी में हफ्ते में तीन बार अंडा परोसा जाता है। लेकिन दूसरे राज्य भी इस मामले में तेज़ी से आगे बढ़े हैं। मिसाल के लिए ओडीशा में आंगनबाड़ियों में हफ़्ते में तीन बार और स्कूलों में हफ़्ते में दो बार अंडा परोसा जा रहा है। अन्य बड़े राज्यों में बिहार, झारखंड तथा पश्चिम बंगाल ने भी मिड डे मील में अंडा परोसने की शुरुआत की है।
सकारात्मक अनुभव
मिड डे मील के रूप में स्कूलों में अंडे का वितरण करने वाले राज्यों का ब्यौरा। इस दिशा में अब तक के अनुभव बहुत सकारात्मक रहे हैं। बच्चे अंडा चाव से खाते भी हैं और अंडा परोसना सुरक्षित भी है। स्कूल में अंडा खाने से बच्चों की तबीयत ख़राब हुई हो, ऐसा कोई उदाहरण मेरी जानकारी में नहीं है। ना ही मैंने कभी यह सुना है कि ऊंची जाति के मां-बाप ही इस मामले में समस्या खड़ी करते हों।
यहां यह बात भी याद रखी जानी चाहिए कि जिन राज्यों में मिड डे मील के मेन्यू में अंडे को रखा गया है वहां इसका शाकाहारी विकल्प(जैसे केला) भी शामिल है। इस अनुभव के आलोक में, पूरे देश में मिड डे मील में अंडा परोसने के कई कारण सामने आते हैं।
फिर क्या वजह है कि मिड डे मील में अंडा परोसने के प्रस्ताव को कुछ राज्य जैसे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक तथा राजस्थान बार-बार ठुकरा रहे हैं? ऐसे हर राज्य में घूम-फिरकर कहानी एक ही है। शाकाहारियों की एक छोटी सी जमात ने इन राज्यों में सरकार को अपनी मुट्ठी में कर रखा है।
शाकाहारियों का एजेंडा
मिड डे मील के रूप में स्कूलों में अंडा, दूध और फल का वितरण करने वाले राज्यों का ब्यौरा। मैं स्वयं शाकाहारी हूं लेकिन इस शाकाहारी जमात की प्रवृत्ति को देखकर हैरान हूं। शाकाहार मतलब होता है कुछ ख़ास किस्म का भोजन खाने से परहेज करना।
इसका मतलब यह नहीं होता कि जिस भोजन को खाने से मैंने अपने को रोक रखा है उसे खाने से दूसरे को भी रोक दूं। मिड डे मील में अंडा शामिल करने के विरोधी अपनी बात की तरफदारी में तर्कसंगत एक युक्ति तक तलाश नहीं पाते।
ऐसे पैरोकारों की ढेर सारी अंसगत बातों (जैसे यह कि शाकाहार में ताकत है इसका प्रमाण हाथी है) को छोड़ दें तो उनका मुख्य दावा दूध या केला जैसे विकल्पों की मौजूदगी का है।
पोषक तत्वों के मामले में केला, अंडे के बराबर नहीं बैठता और दूध के साथ सुरक्षा का गंभीर मुद्दा जुड़ा हुआ है। जल्द ख़राब होने वाली चीज़ होने के कारण दूध के वितरण में भी कठिनाई है। बात जो भी हो लेकिन अगर अदने से अंडे के रूप में एक कारगर, सुरक्षित, आजमाया हुआ, किफ़ायती और लोकप्रिय विकल्प मौजूद है तो हम इसकी जगह कुछ और के बारे में क्यों सोचें?
जाति-भेद और वर्ग-भेद से संबंध
दरअसल अंडे पर रोक का मामला जाति-भेद और वर्ग-भेद से जुड़ा है। जाति-व्यवस्था को बहाल रखने में अपनी रुचि के भोजन और उसको मिल-बांटकर खाने पर रोक एक अहम भूमिका निभाती है।
इस तरह की रोक के हामी अक्सर ऊंची जातियों के होते हैं जिनके लिए हित जाति-व्यवस्था को बहाल रखने से बंधे हैं। ये लोग सुविधा-संपन्न वर्ग के भी होते हैं जो अपने बच्चों को पोषक आहार देने के लिए स्कूली भोजन पर निर्भर नहीं।
अपनी बात मनवाने का उनका हठ दरअसल अगड़ी जातियों के इस दंभ का ही सूचक है कि "हम जो कहते हैं, वही चलता है।"
तानाशाही रवैया
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में प्रदेश में मिड डे मील में अंडा परोसने को ना कह दिया। यह बिहार के एकदम विपरीत है जहां बिना किसी हो-हल्ले के एक साल पहले अंडा परोसना शुरू हुआ। तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी से आंगनबाड़ियों में अंडा परोसने की बात कही गई तो उन्होंने तुरंत ही इस बात को मान लिया।
मुसहर परिवार में जन्मे और बचपन में भुखमरी से जूझ चुके जीतनराम मांझी इस बात को खूब समझते हैं किसी ग़रीब बच्चे के लिए स्कूल में अंडे का मिलना क्या मायने रखता है। उन्होंने खुद ही कहा कि मैं ऐसे बहुत से मुसहर बच्चों को जानता हूं जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में कभी अंडा नहीं खाया। कुछ ही हफ़्तों के भीतर बिहार सरकार ने प्रस्ताव पर क्रियान्वयन शुरू कर दिया।
मज़े की बात यह रही कि बिहार में ऊंची जाति के अभिभावकों ने इसका कोई मुखर विरोध भी नहीं किया। अंडे के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ने वाले लोग भूल रहे हैं कि वे व्यापक जनता के मनोभावनाओं की नुमाइंदगी नहीं कर रहे बल्कि एक छोटी सी तानाशाह जमात की तरह बर्ताव कर रहे हैं। उम्मीद की जाए कि आख़िरकर बच्चों के हित (दरअसल उनके अधिकार) को ही देर-सबेर बढ़ावा मिलेगा।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)