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नेताजी सुभाषचंद्र बोस के ड्राइवर की भी गुमनाम मौत

Fri, 23 Jan 2015 01:08 PM IST
Updated Fri, 23 Jan 2015 01:08 PM IST
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Driver of Netaji Subhash Chandra Bose died anonymously

नेताजी सुभाषचंद्र बोस के ड्राइवर रह चुके प्रीतम सिंह उर्फ स्वामी परमानंद की मुजफ्फरनगर के शुक्रताल में गुमनाम मौत हो चुकी है। इंडियन मिलिट्री के सिपाही प्रीतम ने कई देशों में नेताजी की गाड़ी चलाई थी। नेताजी के पांच ड्राइवरों में वह अकेले जीवित थे। प्रीतम के पास नेताजी के रहस्यों से जुड़े तमाम दस्तावेज थे।

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नेताजी की मौत आज तक मिस्ट्री बनी हुई है। इसी तरह उनके ड्राइवर प्रीतम सिंह की 104 वर्ष की उम्र में मौत की किसी को भनक नहीं लगी। नेताजी की जयंती पर ‘अमर उजाला’ ने उनकी टोह ली तो पता चला कि बोस के सहयोगी की दो माह पहले मौत हो चुकी है। मेरठ जनपद के गांव जैनपुर में किसान काले सिंह के घर में जन्मे प्रीतम सिंह वर्ष 1932 में सेना में भर्ती हुए थे। दो साल बाद उन्हें इटली भेज दिया गया। वहीं, उनकी नेताजी से पहली भेंट हुई। सेना के कर्नल रामबीर सिंह (रोहतक) से सुभाष चंद्र बोस ने ड्राइवर की आवश्यकता बताई, तो प्रीतम को नेताजी की सेवा में भेज दिया गया। इराक, ईरान, रूस, जापान आदि कई देशों की यात्राओं के दौरान वह नेताजी के साथ रहे थे। प्रीतम नेताजी के पांच ड्राइवरों में अंतिम जीवित थे।
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17 साल पहले प्रीतम सिंह ने शुकतीर्थ में गोरक्षक आश्रम बनाया और स्वामी परमानंद बन गए। देशभक्ति की जीवटता के साथ उन्होंने खुद को सत्संग और सेवा में रमा लिया। हालांकि उनका दावा था कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी। उनके शिष्य स्वामी प्रेमानंद ने बताया कि 27 नवंबर को उनकी मृत्यु हो गई थी। अगले दिन शुक्रताल में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया। गौरतलब है कि बोस की मौत की गुत्थी को लेकर मोदी सरकार के सामने अनगिनत सवाल हैं। पहले नेताजी के परिजनों ने मृत्यु की गुप्त फाइलें सार्वजनिक करने की बात रखी तो हाल ही में भाजपा नेता सुब्रह्मणयम स्वामी ने कोलकाता में स्टालिन द्वारा नेताजी की हत्या किए जाने का सनसनीखेज बयान दिया था।
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नेताजी को सुनने उमड़े थे लोग

Driver of Netaji Subhash Chandra Bose died anonymously

फिरंगी मुक्त भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन में अमर हो गए नेताजी ने मुजफ्फरनगर में भी देशप्रेम की मशाल जलाई थी। शहर के टाउन हॉल में सुभाष चंद्र बोस की सभा ने युवाओं को संघर्ष का जोश दिया। आजाद हिंद फौज में जिले के सैकड़ों रणबांकुरों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।

आजादी में नेताजी की भूमिका इतिहास के सुनहरे पन्नों में सुशोभित है। जिले की मिट्टी भी सुभाष चंद्र बोस की देशभक्ति से महकी है। ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मुजफ्फरनगर का योगदान’ पुस्तक में नेताजी के जीवन की दास्तां संकलित की है। वर्ष 1940 में बोस ने शहर के टाउन हॉल में सभा की और फारवर्ड ब्लॉक संगठन की नींव रखी। केदारनाथ मुख्तार, शुगनचंद मजदूर, कृष्णकांत अशोक, रामप्रसाद आदि जोशीले कार्यकर्ताओं को बागडोर दी।

मई माह में युवाओं ने जिले में हैंडबिल-‘अंग्रेजी लड़ाई में न देंगे पाई और न देंगे एक भी भाई’ बंटवाया तो अंग्रेजों के अत्याचार झेलने पड़े। यह विरोध दूसरे विश्व युद्ध में भारत की फौज को झोंक दिए जाने पर था। आठ मई 1940 को कलक्टर जेवी लिंच की कुर्सी पर शुगनचंद मजदूर ने कब्जा कर लिया था। जापान पहुंचने के बाद नेताजी ने देश के सैनिकों को आजाद हिंद फौज के रूप में संगठित किया तो गांव-गांव से जोशे वतन में वीर सेनानियों के कदम बढ़ गए।

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