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'दहेज कानून पर कोर्ट का फैसला खेदजनक'

Fri, 04 Jul 2014 07:47 AM IST
Updated Fri, 04 Jul 2014 07:47 AM IST
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'Dowry law regrettable decision of the Supreme Court'

माकपा ने दहेज विरोधी कानून के तहत आरोपी की सीधे गिरफ्तारी पर रोक लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना करते हुए इसे पीछे धकेलने वाला और खेदजनक निर्णय करार दिया है।

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माकपा की वरिष्ठ नेता वृंदा करात ने कहा कि इस फैसले ने मामले से जुड़े वर्तमान कानून को कमजोर कर दिया है। उन्होंने कहा कि अदालत के पास एक संज्ञेय अपराध को असंज्ञेय में तब्दील करने का अधिकार नहीं है। वह भी ऐसे समय में जब देश में दहेज की मांग का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है।
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उन्होंने कहा कि अदालत ने दहेज पीड़ित महिलाओं के साथ अन्याय किया है। ऐसी महिलाओं की संख्या रोज बढ़ रही है। उन्होंने बिहार सरकार से शीर्ष अदालत के इस फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दाखिल करने की मांग की। बिहार के ही एक व्यक्ति की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था।
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क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट

'Dowry law regrettable decision of the Supreme Court'

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को असंतुष्ट पत्नियों द्वारा पति और ससुराल के लोगों के खिलाफ दहेज विरोधी कानून के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि पुलिस ऐसे मामलों में स्वत: आरोपियों को गिरफ्तार नहीं कर सकती।

पुलिस को ऐसा करने के पीछे कारण बताना होगा, जिसका न्यायिक परीक्षण किया जाएगा। इसके लिए सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि दहेज उत्पीड़न सहित सात वर्ष तक की सजा वाले सभी अपराधों में गिरफ्तारी का सहारा न लिया जाए।

जस्टिस सीके प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा था कि वे सभी राज्य सरकारों से पुलिस अधिकारियों को निर्देश देने का आदेश देते हैं कि पुलिस आईपीसी की धारा 498-ए (दहेज उत्पीड़न) के मामले में स्वत: गिरफ्तारी न करें।

बल्कि वे (पुलिस अधिकारी) सीआरपीसी की धारा 41 के प्रावधानों के अनुसार गिरफ्तारी की जरूरत महसूस होने पर ही ऐसा करें। खंडपीठ ने कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने पुलिस को गिरफ्तारी के कारणों के बारे में बताना होगा। अदालत ने कहा कि आईपीसी की धारा 498-ए एक गंभीर और गैरजमानती अपराध है, जिसे असंतुष्ट पत्नियां अपने पति के खिलाफ एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही हैं।

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