'पतियों के खिलाफ दहेज कानून का दुरूपयोग कर रहीं पत्नियां'
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सुप्रीम कोर्ट ने दहेज विरोधी कानून के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए बुधवार को कहा कि पुलिस ऐसे मामलों में स्वत: आरोपियों को गिरफ्तार नहीं कर सकती।
असंतुष्ट पत्नियों द्वारा पति और ससुराल के लोगों के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कराने के मामलों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस को ऐसा करने के पीछे कारण बताना होगा, जिसका न्यायिक परीक्षण किया जाएगा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि पहले गिरफ्तारी और फिर कार्यवाही निंदनीय है, जिस पर निश्चिततौर पर रोक लगनी चाहिए। इसके लिए सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि दहेज उत्पीड़न सहित सात वर्ष तक की सजा वाले सभी अपराधों में गिरफ्तारी का सहारा न लिया जाए।
'दहेज उत्पीड़न के मामले में स्वत: गिरफ्तारी न करें'
जस्टिस सीके प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि वे सभी राज्य सरकारों से पुलिस अधिकारियों को निर्देश देने का आदेश देते हैं कि पुलिस आईपीसी की धारा 498-ए (दहेज उत्पीड़न) के मामले में स्वत: गिरफ्तारी न करें।
बल्कि वे (पुलिस अधिकारी) सीआरपीसी की धारा 41 के प्रावधानों के अनुसार गिरफ्तारी की जरूरत महसूस होने पर ही ऐसा करें।
खंडपीठ ने कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने पुलिस को गिरफ्तारी के कारणों के बारे में बताना होगा। अदालत ने कहा कि आईपीसी की धारा 498-ए एक गंभीर और गैरजमानती अपराध है, जिसे असंतुष्ट पत्नियां अपने पति के खिलाफ एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है।
'दहेज कानून पति को प्रताड़ित करना आसान तरीका है'
खंडपीठ ने कहा कि पति और उसके रिश्तेदारों को प्रताड़ित करना एक बेहद आसान तरीका है। कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें बेड पर पड़े रहने वाले पति के दादा-दादी, वर्षों से विदेश में रह रही उसकी बहनों को आरोपी बना दिया जाता है।
पीठ ने कहा कि यदि संबंधित पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट अदालत की ओर से इस मामले में जारी किए गए दिशा-निर्देशों का अनुपालन करने में विफल रहता है तो उसके खिलाफ अदालत की अवमानना या विभागीय कार्यवाही की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
पीठ ने कहा है कि आजादी के छह दशक बाद भी पुलिस अपनी छवि नहीं बदल सकी है और गिरफ्तारी को बड़े स्तर पर उत्पीड़न या अत्याचार के हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है।
जताया दहेज उत्पीड़न के बढ़ते मामलों पर आश्चर्य
शीर्षस्थ अदालत ने कहा कि हमारा मानना है कि गिरफ्तारी तभी नहीं होनी चाहिए, जबकि अपराध गैर-जमानती हो या संज्ञेय हो, बल्कि ऐसे में पुलिस अधिकारी को कानून के दायरे में ऐसा निर्णय लेना चाहिए।
पीठ ने इस मामले में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का भी हवाला दिया।
498-ए और अन्य दहेज उत्पीड़न के मामलों के अपराध की बड़ी संख्या पर आश्चर्य जताया। पीठ ने कहा ये प्रावधान मौजूदा समय हथियारों की तरह प्रयोग में लाए जा रहे हैं।