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दहेज मामलों में घरवालों को बेवजह न फंसाया जाए
नई दिल्ली/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 26 Oct 2012 09:39 PM IST
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दहेज उत्पीड़न मामलों में बेवजह पारिवारिक सदस्यों को फंसाए जाने के रवैये को आड़े हाथों लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को सतर्कता बरतने को कहा है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि दहेज के मामलों में परिवार के सदस्यों को महज उनका नाम शिकायत में शामिल होने के आधार पर नहीं फंसाया जाना चाहिए। जब तक कि उनके खिलाफ कोई निश्चित आरोप न लगाया गया हो।
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जस्टिस टीएस ठाकुर व जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने कहा कि यदि एफआईआर में आरोपी के खिलाफ निश्चित आरोप स्पष्ट नहीं किया गया हो, खासकर सह-अभियुक्तों के खिलाफ जो वैवाहिक विवाद के दायरे से बाहर हों। ऐसे में एफआईआर में उनका नाम शामिल कर तकनीकी तौर पर ट्रायल के लिए भेजा जाना स्पष्ट तौर पर कानून और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
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पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता पत्नी को शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न देने में प्रथम दृष्टया लिप्त न पाए जाने वालों को बेवजह न्यायिक प्रक्रिया में नहीं उलझाया जाना चाहिए। सर्वोच्च अदालत के अनुसार एफआईआर में संबंधियों पर लगाए गए आरोप के तथ्य स्पष्ट नहीं हों या शिकायतकर्ता की ओर से पूरे परिवार को एक ही मामले में फंसाया जाना प्रथम दृष्टया नजर आए तो अदालतों को सतर्क रवैया अपनाना चाहिए। क्योंकि छोटी समस्याओं या घरेलू झगड़े से उपजे विवाद में अपने अहम की भरपाई के लिए शिकायतकर्ता ऐसा करता है। ऐसे मामलों को अदालतों को खासतौर पर सावधानी बरतते हुए रद्द करने का रवैया अपनाना चाहिए।
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पीठ ने यह निर्देश एक व्यक्ति के परिवार की ओर से दायर अपील पर जारी किया है जिसकी पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया था। सर्वोच्च अदालत ने पाया कि ऐसी कोई निश्चित अवस्था शिकायत में नहीं लिखी गई थी जिससे यह स्पष्ट हो कि महिला का दहेज के लिए उत्पीड़न किया गया। पीठ ने पुलिस और अदालत को चेतावनी देते हुए परिजनों के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया को खारिज कर दिया है।