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क्या इन चुनावों में कांग्रेस शतक लगा पाएगी?

Mon, 21 Apr 2014 07:18 AM IST
धीरज कनोजिया/अमर उजाला, दिल्ली
धीरज कनोजिया/अमर उजाला, दिल्ली Updated Mon, 21 Apr 2014 07:18 AM IST
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does the congress will win about 100 seats in this election

भले ही देशभर में नकारात्मक माहौल और मोदी लहर की वजह से कांग्रेस सकते में है। फिर भी पार्टी के मैनेजरों की उम्मीद की किरण अभी पूरी तरह से बुझी नहीं है।

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देशभर से आ रहे पार्टी कार्यकर्त्ताओं से हो रही बात और पर्यवेक्षकों की ताजा रिपोर्ट से पार्टी के मैनेजरों को उम्मीद बंध गई है कि चार राज्य और तेलंगाना क्षेत्र के दम पर कांग्रेस शतक लगा सकती है।
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पार्टी को उम्मीद है कि कर्नाटक, केरल, असम, महाराष्ट्र और तेलंगाना क्षेत्र में पार्टी का प्रदर्शन सुधर सकता है और इसके भरोसे पार्टी 100 का आंकड़ा पार कर सकती है। इसी उम्मीद के भरोसे कुछ बड़े नेता तो सेक्यूलर गठबंधन के नाम पर दूसरे दलों को एकजुट कर सरकार बनाने की संभावनाओं के गुना भाग लगाने की बात करने लगे हैं।

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हार का पता होते हुए भी तेलंगाना से उम्मीद

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कांग्रेस के शीर्ष मैनेजर अभी पार्टी के दहाई के आंकड़े पर सिमटने की बात को नकार रहे हैं। मैनेजरों का कहना है कि पार्टी की स्थिति खराब जरूर है। मगर चुनावी सर्वेक्षणों में जो तस्वीर दिखाई जा रही है।

पार्टी की स्थिति उतनी खराब नहीं है। पार्टी की सीटों में बड़े पैमाने पर कमी तो आएगी। फिर भी 120 सीटें तो आने की उम्मीद लगाई जा रही है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल, असम और तेलंगाना क्षेत्र से पार्टी को 60 से ज्यादा सीटें हासिल हो सकती है।

कांग्रेस के वार रूम में सक्रिय एक अन्य पार्टी नेता का भी यही आकलन है। उनके मुताबिक कर्नाटक में पार्टी को 15, केरल में 13, महाराष्ट्र में 20, असम में 10 और तेलंगाना क्षेत्र में भी 8 से 10 सीटें हासिल हो सकती है।

चुनाव बाद सेक्युलर गठबंधन की कसरत?

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पार्टी के नेता कहते है कि अगर पार्टी लोकसभा में सीटों का शतक लगाती है तो देश में त्रिशंकु लोकसभा का समीकरण बनना तय है। ऐसे में पार्टी फिर से सेक्यूलर गठबंधन के नाम पर दूसरे दलों को एकजुट कर कांग्रेस नेतृत्व की सरकार बनाने की कोशिश कर सकती है।

पार्टी के कई नेता दूसरे को समर्थन देने के बजाय खुद के सरकार बनाने को लेकर पैरवी कर रहे हैं। पार्टी के एक दिग्गज नेता ने कहा कि इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने जब भी किसी को सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया है तो उसके बाद पार्टी का ग्राफ नीचे गिरा है।

इसलिए पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन कमजोर होने का जोखिम उठाकर तीसरे विकल्प को ड्राइवर सीट पर बैठाने की कसरत शायद ही करेगी।

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