साबिर अली तो बहाना हैं, कहीं और निशाना है
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पूर्वी-उत्तर प्रदेश में कहावत है, 'दूसरा शौहर किया बुरा किया उसे भी छोड़ दिया और बुरा किया'। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कुछ ऐसा ही कर रही है।
पिछले एक पखवाड़े में यह दूसरी बार हुआ है कि पार्टी ने किसी को सदस्यता देने के चौबीस घंटे के अंदर उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया।
पार्टी के इस व्यवहार से दो बातें साफ़ हैं। एक कि पार्टी नेतृत्व को अपनी ही पार्टी के लोगों की पसंद-नापसंद का अंदाज़ा नहीं है। दूसरा यह कि पार्टी में कम से कम इतना आंतरिक जनतंत्र है कि विरोध करने पर बड़े नेताओँ के फ़ैसले भी बदले जा सकते हैं। लेकिन पार्टी के अंदर संवाद की कमी साफ़-साफ़ नज़र आती है।
हिंदुत्व का ऐसा चेहरा?
पहले प्रमोद मुतालिक और अब साबिर अली। दोनों में कोई साम्य न होने के बावजूद एक साम्य है। दोनों राजनीति को सांप्रदायिकता के चश्मे से देखते हैं।
प्रमोद मुतालिक हिंदुत्व का ऐसा चेहरा हैं, जिन्हें देखकर हिंदुत्ववादी भी थोड़ा शरमा जाएं। मुतालिक के लिए देश के क़ानून और संविधान से ज्यादा अहम उनकी संकीर्ण सोच है, जिसे वे समाज सुधार का क़दम मानते हैं।
साबिर अली के बारे में इतना तो पता है कि वे नरेंद्र मोदी और भाजपा को सांप्रदायिक मानते हैं। हालांकि तीन दिन के गुजरात दौरे से उनका ह्रदय परिवर्तन हो गया। वे मोदीद्रोही से मोदीभक्त हो गए।
क्या है साबिर पर गंभीर आरोप?
भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नक़वी की मानें, तो साबिर अली की इंडियन मुजाहिदीन के यासीन भटकल से दोस्ती है। इसमें कितनी सच्चाई है यह मुख्तार साहब जानें या खुफिया एजेंसियां।
इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि सार्वजनिक जीवन में आमफहम धारणा हमेशा वास्तविकता पर भारी पड़ती है। साबिर अली के किससे संबंध हैं किससे नहीं, यह तो पता नहीं पर उनको लेकर बिहार से मुंबई तक कई तरह की कहानियां हैं।
अब यह सिर्फ फ़साना ही है या हक़ीक़त, खुदा जाने, लेकिन मुख्तार का यह आरोप फ़िलहाल तो उन पर चस्पां हो ही गया है।
जीत की हड़बड़ी में भाजपा?
मुद्दा साबिर अली या प्रमोद मुतालिक नहीं हैं। ये तो महज़ मोहरे हैं। भाजपा में इस समय एक तरह की हड़बड़ी है। किसी को भी पार्टी में लाने की, जो जीतकर लोकसभा में पहुंच सके। इसलिए विचारधारा और सिद्धांत के तकाज़े इस समय मुल्तवी हैं।
जसवंत सिंह जाते हैं तो जाएं, चौधरी सोनाराम एक सीट बढ़ा सकते हैं तो उनका स्वागत है। क्या हुआ जो जगदंबिका पाल कल तक पार्टी और मोदी को गाली दे रहे थे, आज तो तारीफ़ कर रहे हैं।
पार्टी के सामने इस समय 272 के अलावा कुछ नहीं है। एक समय था जब भाजपा का मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मानता था कि विचारधारा से समझौता नहीं होना चाहिए, सत्ता तो आती-जाती रहेगी।
भाजपा की सोच बदल गई है?
अब भाजपा की सोच बदल गई है। उसे लगता है कि सत्ता ज्यादा ज़रूरी है। विचारधारा का मसला बाद में देखेंगे। विचारधारा सत्ता के रास्ते की बाधा नहीं बननी चाहिए।
इसलिए जो बाधा बन रहे हैं, वे हटाए जा रहे हैं। यह चुनाव भाजपा से ज्यादा संघ के लिए अभी नहीं तो कभी नहीं जैसा है। साबिर अली का मसला इससे अलग है। वह भाजपा में एक नई प्रवृत्ति या रणनीति का उदाहरण है।
पार्टी में ऐसे लोगों को लाया जा रहा है या ऐसे लोगों से गठबंधन की कोशिश हो रही है जो 2002 के गुजरात दंगों के मुद्दे पर भाजपा या एनडीए से अलग हो गए या उसके आलोचक रहे।
बीजेपी की चुनावी रणनीति
इसमें रामविलास पासवान से चंद्रबाबू नायडू तक शामिल हैं। इसके ज़रिए पार्टी और मोदी समर्थक यह जताने की कोशिश में हैं कि जो मोदी को सांप्रदायिक कहकर गए थे आज मोदी के नेतृत्व में पार्टी के साथ आने को तैयार हैं।
यही कारण है कि भाजपा ने रामविलास पासवान जैसे घोर अवसरवादी का गाजे-बाजे के साथ हाथ थामा। यहां सीटों के गणित से ज्यादा अहम मोदी की छवि सुधारने का मामला है।
इस तरह के लोगों को लाने के पीछे एक चुनावी रणनीति भी है। भाजपा विरोधी ताक़तों की पूरी कोशिश है कि देश का मुस्लिम मतदाता मोदी के ख़िलाफ़ लामबंद हो। भाजपा इसे रोकने की कोशिश कर रही है।
चुनाव बाद की रणनीति
उसे पता है कि उसे मुसलमानों के वोट तो नहीं मिलेंगे। पर मुसलमानों की नज़र में धर्मनिरपेक्ष समझे जाने वाले लोग भाजपा के साथ आते हैं तो उस समुदाय में मोदी विरोध की धार कुंद होगी।
इसका एक और फ़ायदा है। इससे पार्टी के अंदर उन लोगों को जवाब मिलता है जो कह रहे थे कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से नए सहयोगी नहीं मिलेंगे।
आज स्थिति यह है कि 2009 में लालकृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने पर एनडीए में जितने दल थे मोदी के नेतृत्व में उससे ज्यादा हैं। एनडीए बाहर के पुराने साथियों को भी आश्वस्त करने की कोशिश है कि जब धर्मनिरपेक्षता के कुछ झंडाबरदार चुनाव से पहले हमारे साथ आ सकते हैं, तो चुनाव बाद आपको आने में गुरेज़ क्यों?