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अगर ये सवाल कोई करे क्या आप पोर्न देखते हैं, तो क्या कहेंगे?

Fri, 07 Aug 2015 09:49 PM IST
Updated Fri, 07 Aug 2015 09:49 PM IST
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क्या आप पोर्न देखते हैं? अगर ये सवाल आप अपने दोस्त से भरी महफ़िल में करें तो वो शायद कभी सही जवाब नहीं देगा। शर्म के मारे उसके पसीने निकल आएंगे। किसी महिला दोस्त से ये सवाल पूछना लगभग असंभव है। मैं एक बार वाशिंगटन में कई बुद्धिजीवी दोस्तों के साथ एक क्लब में गया जहाँ लैप डांस होता है।

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बिकिनी पहने ग्यारह लड़कियां एक-एक करके फ्लोर पर आयीं, नाचीं और चली गईं।  मुझे लगा ये पैसे और समय की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं। लेकिन ये मेरी निजी राय है।
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कुछ साथियों को पसंद आया होगा। हो सकता है वो दोबारा वहां गए होंगे। एक सप्ताह पहले केंद्रीय आईटी मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने 857 पोर्न साइट्स को ब्लॉक करने का आदेश दिया जिस पर भारतीय समाज विभाजित नज़र आता है। इसके पक्ष में जितनी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं उतनी ही इसके ख़िलाफ़।

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सोशल मीडिया पर चर्चा

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सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर चर्चा अब भी जारी है जबकि सरकार ने अब ये पाबंदी केवल बच्चों के लिए इंटरनेट पर अश्लील सामग्री या पोर्न साइट्स तक प्रतिबंध सीमित कर दी है। मेरे विचार में इंटरनेट को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है और ऐसा किया भी नहीं जाना चाहिए। इंटरनेट को फ़िल्टर करना आसान नहीं। और ये एक तरीक़े की सेंसरिशप होगी।

लेकिन ये तर्क तकनीकी के बारे में नहीं है। ये भारत में एक नैतिक मुद्दा है। मेरे विचार में पोर्न देखना किसी व्यस्क का निजी फ़ैसला होना चाहिए। मेरे कई दोस्तों ने प्रतिबंध के फ़ैसले पर मोदी सरकार को बधाई दी। उनमें से महिला साथियों का तर्क ये था कि पोर्न और अश्लील सामग्री के कारण महिलाओं पर हमलें बढ़े हैं और बलात्कार की वारदातों में इज़ाफ़ा हुआ है। मैं जिस परिवार और समाज से आता हूँ वहां इस तर्क पर पूरी सहमति है। मैं इस तर्क की क़द्र करता हूँ लेकिन इससे ज़िन्दगी भर असहमत रहूंगा।

महिलाओं पर यौन हमले

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महिलाओं पर यौन हमले उनके घरों में अधिक होते हैं। तो क्या वो सभी पोर्न देख कर ऐसा करते हैं? मैं ये नहीं कहूँगा कि यौन हमले और अश्लील सामग्री देखने के बीच कोई सीधा लिंक नहीं है। मैं केवल ये कहना चाहता हूँ कि केवल अश्लील सामग्री देखने से यौन हमले नहीं बढ़ते। कई पश्चिमी देशों में फ्री पोर्न चैनल्स हैं लेकिन वहां औरतों की इज़्ज़त और समानता दोनों भारत से अधिक है।

आज भारत बदलाव के दहाने पर खड़ा है। ये खुलेपन और प्रतिबंध के बीच एक कशमकश का दौर है। लेकिन जैसा हर लोकतंत्र में शर्त होती है, हर बदलाव लोकतांत्रिक ढाँचे में पनपे। जहाँ तक पोर्न साइट्स का सवाल है तो ये एक विकल्प के तौर पर मौजूद होना चाहिए। जिसकी मर्ज़ी हो वो देखे।

मुझे लगता है कि बैन लगाने का काम तालिबान या इस्लामिक स्टेट पर छोड़ दें। भारत जैसे आधुनकि स्टेट को किसी व्यस्क की निजी ज़िंदगी में दख़ल देना शोभा नहीं देता।

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