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बच्चा जेल में बवाल, पुलिसवालों को डंडों से पीटा

Fri, 12 Dec 2014 09:04 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ Updated Fri, 12 Dec 2014 09:04 AM IST
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disturbance in juvenile jail.

मेरठ में सूरजकुंड स्थित संप्रेक्षण गृह में बृहस्पतिवार शाम फिर बवाल हो गया। बुलंदशहर से पेशी से लौटे किशोर बंदियों ने पुलिसकर्मियों को बंधक बनाकर डंडों और क्रिकेट बैट से पीटा। जान बचाकर भागे इन पुलिसकर्मियों पर बंदियों ने दौड़ाकर पथराव किया।

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बंदी वाहन में भी तोड़फोड़ की। एक हेड कांस्टेबिल से सरकारी रिवाल्वर लूटने की कोशिश की गई। बवाल में आरआई का सिर फट गया, दीवान का हाथ टूट गया। एक अन्य सिपाही का सिर फोड़ दिया, जिसकी हालत नाजुक बनी है। उसे देर रात तक दिल्ली रेफर करने की तैयारी थी।
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सूरजकुंड स्थित किशोर संप्रेक्षण गृह से बृहस्पतिवार सुबह 16 किशोर बंदियों को बंदी वाहन यूपी 15 एजी 0115 से बुलंदशहर कोर्ट पेशी पर ले जाया गया था। पुलिस लाइन से दरोगा मंतू सिंह और हेड कांस्टेबिल सत्यवीर मलिक समेत आठ पुलिसकर्मी गार्ड में साथ गए थे।
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पुलिसकर्मियों ने बताया कि बुलंदशहर से मेरठ के लिए चलते ही इन किशोर बंदियों ने राह चलती महिलाओं को देखकर फब्तियां कसनी शुरू कर दी थी। पुलिसकर्मियों ने रोका, लेकिन किशोर नहीं माने। मेरठ तक जो भी किशोरी, युवती या महिला रास्ते में दिखी, उसे बंदी वाहन की जाली से गालियां देना, अभद्र टिप्पणी करना, फब्तियां कसना जारी रखा। थोड़ी सख्ती करने पर किशोरों ने उल्टा धमकाते हुए कहा था कि जवाब हम बच्चा जेल पहुंचकर देंगे।

बंदी वाहन में जमकर तोड़फोड़

disturbance in juvenile jail.

शाम लगभग 4:30 बजे जब बंदी वाहन संप्रेक्षण गृह पहुंचा तो इन 16 किशोर बंदियों को दो-दो कर संप्रेक्षण गृह में दाखिल कराया गया। इसके बाद किशोर बंदियों को संप्रेक्षण गृह में दाखिल करने की कागजी कार्रवाई चल ही रही थी कि उन्होंने वहां अकेले मौजूद मंतू सिंह को बंधक बनाकर डंडों से पीटना शुरू कर दिया। मंतू ने शोर मचाते हुए मदद मांगी तो साथी पुलिसकर्मी उसे बचाने पहुंचे।

इसके बाद संप्रेक्षण गृह के दो दर्जन से ज्यादा किशोरों ने इन पुलिसकर्मियों को भी घेरकर पीटना शुरू कर दिया। पुलिसकर्मी जान बचाने के लिए संप्रेक्षण गृह से बाहर भागे, तब भी इन बंदियों ने पीछा नहीं छोड़ा और बाहर ही घेरकर उन पर डंडों और क्रिकेट बैट से हमला बोल दिया। हेड कांस्टेबिल सत्यवीर मलिक से बंदियों ने सरकारी रिवाल्वर लूटने की कोशिश की। सत्यवीर ने विरोध किया तो उसके हाथ पर बैट मारे गए। जिससे उनके हाथ में गंभीर चोट आई।

बंदियों ने सत्यवीर का पर्स भी लूट लिया, जिसमें साढ़े नौ हजार रुपये बताए गए। सत्यवीर ने वहां से भागकर किसी तरह जान बचाई। इसके अलावा जितेंद्र त्यागी नाम के सिपाही को भी बंदी वाहन के अंदर गिराकर बुरी तरह पीटा गया। बंदियों ने बंदी वाहन में जमकर तोड़फोड़ की। इतना ही नहीं इन बंदियों के साथियों ने संप्रेक्षण गृह से पुलिसकर्मियों को निशाना बनाकर पथराव किया।

फोर्स ने पाया हालात पर काबू

disturbance in juvenile jail.

बवाल की सूचना फ्लैश हुई तो आरआई श्रीभगवान यादव पुलिस लाइन से फोर्स लेकर संप्रेक्षण गृह पहुंचे, लेकिन बंदियों ने पथराव जारी रखा। ईंट लगने से आरआई और पुलिस लाइन के मुंशी ओमप्रकाश के सिर फूट गए। इस दौरान एसपी सिटी ओपी सिंह आसपास के थानों की फोर्स और पीएसी लेकर पहुंचे, तब हालात पर काबू पाया जा सका। मंतू सिंह और ओमप्रकाश को जसवंत राय अस्पताल में भर्ती कराया गया। सिर में ज्यादा चोट लगने से ओमप्रकाश की हालत गंभीर बताई गई है। वहीं आरआई श्रीभगवान यादव को देवलोक अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टर राजीव गुप्ता के अनुसार आरआई के सिर में पांच टांके आए हैं। गनीमत रही कि ईंट दिमाग से थोड़ा ऊपर लगी। बाद में आरआई को भी आनंद अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया।

बवाल काटकर कर लिया खुद को बंद
पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमला करने के दौरान किशोर बंदी संप्रेक्षण गृह से बाहर सड़क तक पहुंच गए थे। जब आसपास के थानों की फोर्स पहुंची तो वापस संप्रेक्षण गृह की तरफ भागकर किशोर बंदियों ने खुद को कमरों में बंद कर लिया। बंदियों ने संप्रेक्षण गृह के चैनल का ताला भी अंदर से लगा लिया, ताकि पुलिस वाले अंदर न घुस सकें।

कागजों में किशोर, उम्र में कहीं ज्यादा

इन किशोर बंदियों को रोकने या कार्रवाई करने के नाम पर संप्रेक्षण गृह प्रशासन के अलावा पुलिस और जिला प्रशासन भी बेबस दिखा। संप्रेक्षण गृह के अधीक्षक छोटे लाल ने बेबसी से कहा कि हम कर क्या सकते हैं। ये कागजों में ही किशोर हैं, जबकि उम्र में किशोरों से कहीं ज्यादा हैं। 260 किशोर बंदियों के सामने 15 लोगों का स्टाफ क्या कर सकता है। साफ बात यही है कि अगर आप इनका दबाव मान लो तो सब ठीक है, नहीं तो सख्ती करने पर जान जाने तक का डर रहता है। हालांकि पुलिस कार्रवाई तो की ही जाती है। वहीं, मौके पर पहुंची अपर नगर मजिस्ट्रेट (द्वितीय) विभा चहल ने दोषी बंदियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही।

हर सिपाही की जुबां पर अराजकता का दर्द

disturbance in juvenile jail.

राजकीय संप्रेक्षण गृह के किशोर पुलिस वालों के दुश्मन बन गए हैं। पुलिस पर रोजाना हमला किया जा रहा है। बृहस्पतिवार को हमले के बाद घटनास्थल और अस्पताल में घायल पुलिसकर्मियों को देख कर हर पुलिसवाले की जुबां पर किशोरों की अराजकता रही।

वैसे तो सिपाही खुलकर कुछ नहीं कह सकते, लेकिन दो दिन में दूसरी बार पुलिस पर हमले ने उन्हें दहशत में ला दिया है। दरअसल, बुधवार दोपहर ही संप्रेक्षण गृह के किशोरों ने सिपाही सन्नी कुमार सहित तीन पुलिसकर्मियों पर हमला किया था। विवाद सिर्फ इतना था कि जिला जेल से लाए गए बंदियों को संप्रेक्षण गृह का एक किशोर नशीला पदार्थ (सुल्फा) दे रहा था। सिपाही ने रोका, तो उसको बुरी तरह पीटा। वहीं, बृहस्पतिवार को संप्रेक्षण गृह पर जो हाल हुआ, उसे देखकर हर कोई घबरा गया। संप्रेक्षण गृह पर बुलाई गई फोर्स में सिपाही से लेकर दरोगा तक, सभी लोग किशोरों की अराजकता पर चर्चा करते रहे। कुछ सिपाहियों का तो यह भी कहना था कि ऐसे हालात में किशोरों को संप्रेक्षण गृह से पेशी के लिए कोर्ट ले जाना मुश्किल होगा, क्योंकि किशोर बगैर किसी बात के भी मारधाड़ पर उतर आते हैं।

उधर, सुशीला जसवंत राय अस्पताल में सिपाही ओमप्रकाश की चिंताजनक हालत के कारण पुलिसकर्मियों में गुस्सा साफ नजर आया। एक तरफ जहां पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी घायल सिपाही ओमप्रकाश का हाल जानने के बाद डाक्टरों से बातचीत कर रहे थे, वहीं अस्पताल में खड़े पुलिसकर्मी यही चर्चा करते मिले कि हमलावर किशोरों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

किशोरों की हरकतों से लोगों का जीना दुश्वार

disturbance in juvenile jail.

संप्रेक्षण गृह के बवाली किशोरों से आसपास के  लोग त्रस्त हैं। कालोनी में रहने वाली लड़कियां मकान के दरवाजे से बाहर कदम रखने में घबराती हैं, क्योंकि सामने ही संप्रेक्षण गृह से किशोर उन्हें देखकर अश्लील फब्तियां कसते हैं। विरोध करने पर गाली गलौज और पथराव तक कर देते हैं।

बृहस्पतिवार सायं जब संप्रेक्षण गृह पर बवाल हुआ और पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारी मौके  पर पहुंचे तो सामने नाले के पार स्थित कालोनी के लोगों का दर्द फूट पड़ा। लोग चिल्लाकर कहने लगे कि हमसे पूछा यहां का हाल, कितना नरक मचा रखा है इन किशोरों ने। नेता और अधिकारी आते हैं, किशोरों को सुविधाएं दिलाने की बात करके जाते हैं, मगर इन किशोरों ने कालोनी के लोगों का जो हाल कर रखा है, उससे किसी को सरोकार नहीं है। लोगों का कहना था कि संप्रेक्षण गृह में रहने वाले किशोर रोजाना ही बाहर आ जाते हैं। उन्हें कोई रोकता-टोकता नहीं है। बाहर निकलने के बाद कालोनी की लड़कियों और महिलाओं को देखकर सीटी बजाते हैं तथा अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं। यदि इनका कोई विरोध करता है, तो गाली गलौज करने के साथ ही पथराव कर देते हैं।

इस दहशत की वजह से परिवार की लड़कियों का घर से बाहर निकलना बंद हो गया है। कालोनी के राकेश, मनोज और विक्की का कहना था कि संप्रेक्षण गृह यहां से शिफ्ट होना चाहिए, तभी इस समस्या का समाधान हो सकेगा। साथ ही उन्होंने कहा कि यदि पुलिस प्रशासन इस बारे में सख्त कदम नहीं उठाता है, तो कालोनी के लोगों को आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

मंडलायुक्त का आदेश मान लेते तो बच सकता था बवाल

disturbance in juvenile jail.

मंडलायुक्त ने दो माह पहले मंडलीय समीक्षा बैठक में दूसरे जिलों के किशोरों को उन्हीं के जिलों में शिफ्ट करने के आदेश दिए थे। इसके लिए उन्होंने एक माह का समय दिया था, लेकिन इस पर आज तक पालन नहीं हुआ। मंडलायुक्त के इस आदेश का पालन हो जाता, तो बृहस्पतिवार को हुए बवाल से बचा जा सकता था। वजह यह कि अब तक हुए बवाल में क्षमता से अधिक किशोरों का संप्रेक्षण गृह में होना और इसके पीछे दूसरे जिलों के किशोरों की हरकतें ही सामने आई हैं।

सूरजकुंड स्थित बाल संप्रेक्षण गृह में लगातार बवाल हो रहा है। यहां रह रहे किशोरों का रवैया आक्रामक और बवाली होता जा रहा है। पिछली बार 12 सितंबर को बवाल हुआ था तो डीएम पंकज यादव ने मंडलायुक्त भूपेंद्र सिंह को पत्र लिखकर मांग की थी कि संप्रेक्षण गृह में क्षमता से अधिक किशोर हैं। इनमें कई ऐसे हैं, जो बालिग हो चुके हैं। इसके अलावा आधे से ज्यादा दूसरे जिलों के हैं। ऐसे में सभी जिलों में बाल संप्रेक्षण गृह बनना चाहिए और संबंधित जिले के किशोरों को वहां शिफ्ट कर देना चाहिए।

मंडलायुक्त ने अक्तूबर की समीक्षा बैठक में सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया था कि एक माह के भीतर सभी अपने-अपने जिले में भवन की व्यवस्था करें। यह भवन किराये पर भी लिया जा सकता है, ताकि मेरठ के बाल संप्रेक्षण गृह से भार कम हो सके और आए दिन होने वाले बवाल से भी मुक्ति मिल सके। यह आदेश अभी तक कागजी बना हुआ है और करीब 60 किशोरों की क्षमता वाले भवन में लगभग 200 किशोर रह रहे हैं।

नहीं हुआ उम्र और केस का निस्तारण:
बवाल के पीछे कुछ बड़े किशोर हैं, जो बालिग हो चुके हैं। जांच रिपोर्ट में भी यह तथ्य सामने आया था और सुझाव दिया गया था कि इनकी मेडिकल जांच कराकर उम्र का पता लगाया जाए। जो बालिग हो चुके हैं, उन्हें कारागार में शिफ्ट किया जाए। इस पर भी आज तक कोई ध्यान नहीं दिया गया। वहीं हाईकोर्ट के जस्टिस ने भी दौरा कर लंबित वादों का तेजी से निस्तारण और जमानत पर सुनवाई कर वाद निपटाने के निर्देश दिए थे। इसमें भी कोई तेजी नहीं दिखी।

मेरठ के डीएम पंकज यादव का कहना है कि घटना की मजिस्ट्रेट जांच सिटी मजिस्ट्रेट एसपी राय को सौंप दी है। जो भी जिम्मेदार होंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। साथ ही शुक्रवार को एसएसपी के साथ मंडलायुक्त से मुलाकात कर दूसरे जिलों के किशोरों को दिसंबर के अंत तक शिफ्ट कराने की मांग की जाएगी। अभी तक सिर्फ बुलंदशहर जिले से ही प्रस्ताव आया है। इस पर दो-तीन दिन में ही स्टाफ नियुक्त करने की मांग मंडलायुक्त से की जाएगी।

संप्रेक्षण गृह में अराजकता को किसका संरक्षण?

disturbance in juvenile jail.

लंबाई पांच फीट से ज्यादा। काठी भी बड़ों जैसी। इसके बावजूद अभिलेखों में किशोर बने हैं। यही वो बवाली हैं, जो वयस्क होने पर भी किशोर बनकर संप्रेक्षण गृह में रहते हैं। हर बार हंगामा और तोड़फोड़ कर बवाल मचाते हैं, मगर प्रशासनिक व्यवस्था है कि इन्हें जिला जेल में शिफ्ट करने को तैयार नहीं है।

बृहस्पतिवार को संप्रेक्षण गृह में पुलिसकर्मियों पर हमला करने वाले किशोर भी वही थे, जो वयस्क हो चुके हैं। घायल हेड कांस्टेबल सत्यवीर और आरआई ने पुलिस अफसरों को हमले की पूरी कहानी बताई। उन्होंने बताया कि संप्रेक्षण गृह से निकलकर जिन्होंने हमला किया, वह किशोर नहीं, बल्कि वयस्क थे। उन्होंने पथराव करने के साथ सड़क किनारे पड़े लकड़ी के फट्टे (क्रिकेट बैट की लकड़ी) उठाकर सिपाहियों पर बरसाए। सिपाही ओमप्रकाश के सिर पर ईंट से भी हमला किया।

जब दो दिन रहा किशोरों का कब्जा:
बात 22 अगस्त की है। किशोरों ने पुलिस वालों को पीटने के बाद संप्रेक्षण गृह अपने कब्जे में ले लिया था। अंदर से गेट का ताला बंद करके दो दिन तक किशोरों ने बवाल काटा। तब आरएएफ भी बुलानी पड़ी थी। मामले की मजिस्ट्रेटी जांच भी हुई, मगर व्यवस्था में सुधार नहीं हो सका।

30 से ज्यादा हैं यहां वयस्क:
संप्रेक्षण गृह में करीब 200 किशोर रहते हैं, जिनमें 30 से ज्यादा वयस्क हैं। वयस्क हो चुके किशोरों की सूची भी प्रोबेशन अधिकारी ने ही तैयार कराई थी। बावजूद इसके इन्हें जिला जेल में शिफ्ट नहीं किया गया। वहीं, सुभाषनगर निवासी करन कौशिक की हत्या के मामले में भी दो आरोपियों ने खुद को नाबालिग दर्शाया था। उसके लिए एक स्कूल से सर्टिफिकेट बनवाकर लगा दिया, जो जांच में फर्जी निकला। करन के पिता राकेश कौशिक ने कई बार आरोपी को जिला जेल में शिफ्ट करने की मांग की, मगर असर नहीं हुआ। इसके अलावा इंचौली क्षेत्र के सलारपुर निवासी छात्र विशाल की हत्या के मामले में भी एक आरोपी ने खुद को नाबालिग दर्शाने के लिए फर्जी प्रमाणपत्र बनवा लिए थे। इसी तरह के अन्य मामले भी हैं। संप्रेक्षण गृह में बवाल करने और कराने में हर बार इन्हीं वयस्कों की भूमिका रहती है। अहम सवाल यह है कि बवाल मचाने वाले किशोरों को संरक्षण कौन दे रहा है। क्या संप्रेक्षण गृह में रहने वाले वयस्क ही किशोरों की आड़ में आतंक मचा रहे हैं या संप्रेक्षण गृह से जुड़े कर्मचारी भी इन्हें सहयोग करते हैं। किशोरों का संप्रेक्षण गृह से बाहर निकलकर हमला करना, कई सवाल खड़े कर रहा है।

सजा से बचने को नाबालिग बनने का खेल:
18 साल से कम उम्र के किशोर के किसी अपराध में पकड़े जाने के बाद उनको राजकीय संप्रेक्षण गृह में रखा जाता है। दोषी पाए जाने के बाद सजा होने पर किशोर गृह में बिताए समय को भी सजा के समय में जोड़ा जाता है। जेजे एक्ट में किसी भी अपराध में अधिकतम सजा तीन साल है। उम्र हाईस्कूल के सर्टिफिकेट, प्रारंभिक स्कूल, शहरी निकाय या पंचायत से जारी प्रमाणपत्र से तय की जाती है। इनके न देने पर तीन चिकित्सकों की टीम से मेडिकल कराया जाता है, जो उम्र का निर्धारण करती है।

जेजे एक्ट-22 का असर:

अधिकारियों का कहना है कि जेजे एक्ट के कारण किशोरों के खिलाफ अपराध करने पर भी सख्ती नहीं बरती जा सकती। उन्हें सिर्फ समझाया जा सकता है कि वह भविष्य में ऐसा न करें। इसका फायदा वयस्क हो चुके किशोर उठा रहे हैं।

करते हैं तमंचे पे डिस्को, लेते हैं टेस्ट ड्राइव

disturbance in juvenile jail.

सूरजकुंड स्थित राजकीय संप्रेक्षण गृह में जो हो रहा है, वह आसपास के लोगों को दिखाई-सुनाई तो पड़ता है, लेकिन प्रशासन को नहीं। संप्रेक्षण गृह में अघोषित यूनियन बन चुकी है। जहां रोक-टोक का मतलब कर्मचारी अपनी आफत बुलाना समझते हैं। यहां रात को तेज आवाज में डेक बजता है। नाच-गाना होता है। यही नहीं, खुद को भाई कहने वाले किशोर टेस्ट ड्राइव भी लेते हैं।

बृहस्पतिवार शाम संप्रेक्षण गृह में बवाल के बाद अंदर का सच भी सामने आ गया। आसपास रहने वाले लोगों की मानें तो संप्रेक्षण गृह इन किशोरों की जागीर बन गया है। जहां सब कुछ इनकी मर्जी से चलता है। कोई इनके आराम या आजादी में खलल डालने की कोशिश करता है तो उसका जवाब लाठी-डंडों और ईंट-पत्थरों से दिया जाता है।

कॉलोनी के ही एक परिवार की आंखों में इन किशोर बंदियों की दहशत साफ पढ़ी जा सकती है। इस परिवार के मुखिया ने बताया कि कहने को यह सुधार गृह है, लेकिन इसमें रहने वालों ने आसपास का पूरा माहौल बिगाड़ दिया है। रात में किशोर तेज आवाज में डेक बजाकर डांस करते हैं। सीटियां मारते हैं। कभी तमंचे पे डिस्को गाने पर डांस होता है तो कभी अश्लील गाने बजाए जाते हैं। कुछ दिन पहले ही खुद को बॉस बताने वाले एक किशोर ने एक सफेद कार की टेस्ट ड्राइव ली थी।

संप्रेक्षण गृह से मेन रोड के मोड़ तक इतनी तेजी से कार को ले जाया गया कि टायरों की रगड़ की आवाज रात में दूर तक सुनी गई। इस दौरान एक वाल्मीकि युवक कार की चपेट में आने से बचा था। इस पर भी ये किशोर भागा क्यों नहीं? इस पर जवाब मिलता है कि जब इतनी ऐश मिल रही है तो कोई क्यों भागेगा। यहां रहने वाले इन किशोर बंदियों को आसपास के बच्चों तक के नाम रट गए हैं। किशोर तेज आवाज में नाम पुकार कर गाली देते हैं।

यूनियन का चलता है सिक्का:
संप्रेक्षण गृह में अमूमन 200 किशोर निरुद्ध रहते हैं। कभी-कभार यह संख्या 250 तक पहुंच जाती है। खुद संप्रेक्षण गृह के कर्मचारी बताते हैं कि करीब 15 किशोरों ने यहां अपनी यूनियन बना रखी है। राजा भैया हो या फिर सुलानिया। इनका यहां सिक्का चलता है। किसी कर्मचारी की हिम्मत नहीं कि वह इनका विरोध कर दें। सबसे ज्यादा बवाल गाजियाबाद, बुलंदशहर और नोएडा के किशोर करते हैं। अपने नेताओं के एक इशारे पर ऐसा रेला टूटता है कि कोई संभल भी नहीं पाता। जिंदाबाद के नारे लगते हैं यहां। संप्रेक्षण गृह की ऊपरी मंजिल पर इनका कब्जा रहता है।

अधीक्षक ने जताई बेबसी:
संप्रेक्षण गृह के अधीक्षक छोटे लाल भी स्वीकार करते हैं कि यहां किशोर बंदियों ने यूनियन बना रखी है। दबाव की राजनीति के आगे हम कुछ नहीं कर पाते। इनकी यहां अलग सत्ता चलती है। अगर इनका दबाव न मानो तो ये हमें ही पीटते हैं। कार्रवाई के नाम पर इनके खिलाफ रिपोर्ट तो हो जाती है, लेकिन कुछ ठोस उपाय नहीं होते।

एसीएम ने माना- सुनियोजित हमला:
मौके पर पहुंचीं अपर नगर मजिस्ट्रेट (एसीएम) सिविल लाइन विभा भी मानतीं हैं कि मुट्ठी भर किशोरों ने संप्रेक्षण गृह पर कब्जा जमा रखा है। एक तरह से अघोषित यूनियन बना रखी है। बृहस्पतिवार को भी ऐसा ही हुआ। पुलिसकर्मियों को पहले बंधक बनाकर और फिर घेरकर पीटा गया। सब सुनियोजित ढंग से हुआ। इनके दिमाग में पहले से ही होता है कि कब क्या करना है। इसके स्थायी समाधान के लिए वरिष्ठ अफसरों से वार्ता की जा रही है।

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