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जंग आडवाणी और मोदी की, जीते राजनाथ
नई दिल्ली/संजय मिश्र
Updated Wed, 12 Jun 2013 12:31 AM IST
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भाजपा में नरेंद्र मोदी बनाम लालकृष्ण आडवाणी की जंग में हार-जीत पर चर्चा भविष्य में जारी रहेगी।
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दोनों ही खेमे अपने-अपने नेता की जीत के दावे करेंगे। मगर हकीकत यह है कि इस लड़ाई में जहां मोदी बादशाह साबित हुए हैं तो आडवाणी कमजोर पड़े हैं।
वहीं पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह संघ के सहारे न केवल ताकतवर बन कर उभरे हैं बल्कि पहली बार भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष अटल-आडवाणी के साए से बाहर आता दिख रहा है।
भाजपा के इस झगड़े के बाद पार्टी में बन रहे अंदरूनी राजनीतिक समीकरण भविष्य में राजनाथ की स्थिति और कद को और मजबूत ही करेंगे।
इतना ही नहीं इस विवाद ने भविष्य में राजनाथ को संघ और मोदी के सीधे समर्थन की ठोस जमीन तैयार कर दी है।
लोकसभा चुनाव के बाद अगर राजग के समक्ष सरकार बनाने की स्थिति आई तो इस नए समीकरण की बानगी देखने को मिल सकती है। साफ है कि आडवाणी और मोदी की इस जंग में जीत राजनाथ के खाते में आई है।
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पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव के एजेंडे के कारण शुरू हुए इस विवाद में भले ही पार्टी अभी भी आडवाणी की छाया से मुक्त होने के सहज सियासी दर्द से दो चार हो रही है। मगर राजनाथ न केवल आडवाणी की छाया से मुक्त हुए हैं, बल्कि अपना कद दूसरी पीढ़ी के नेताओं में बढ़ा भी लिया है।
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इससे पहले कुशाभाऊ ठाकरे को अगर अपवाद मान लें तो भाजपा का कोई भी अध्यक्ष अटल-आडवाणी की छाया से मुक्त नहीं हो पाया था। मगर ठाकरे की निजी राजनीतिक महत्वाकाक्षाएं नहीं थीं और वे अटल-आडवाणी दोनों के लिए सम्मानित थे।
खुद राजनाथ भी अपनी पहली अध्यक्षीय पारी में ऐसा नहीं कर पाए थे। डॉ. मुरली मनोहर जोशी की भले ही आडवाणी से अदावत चलती रही हो, मगर वह भी वाजपेयी की ही छाया माने जाते थे।
बाकी बचे वेंकैया नायडू, जनाकृष्णमूर्ति या बंगारू लक्ष्मण के बारे में इस संदर्भ में बात करना बेमानी है।
पार्टी में मोदी बनाम आडवाणी की जंग ने इन दोनों ही नेताओं के बीच कभी न पटने वाली खाई बना दी है। मगर इसी विवाद के कारण राजनाथ की न केवल मोदी से करीबी बढ़ी है, बल्कि संघ का भरोसा भी राजनाथ पर पहले से ज्यादा बढ़ा है।
दरअसल गोवा में राजनाथ ने पार्टी को जिस अटल-आडवाणी के छाया से मुक्त कराने के एजेंडे को अमली जामा पहनाया वह संघ का एजेंडा था।
इसके साथ ही आडवाणी को कोपभवन से बाहर निकालने के लिए भले ही राजनाथ जिस सीमा तक झुके हों, लेकिन बाहर यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि उन्होंने कोई भी समझौता मोदी की कीमत पर नहीं किया है।
इस सबके बीच आडवाणी को मनाने के लिए दिखाई गई तत्परता और महज 31 घंटे के अंदर विवाद का हल निकाल कर राजनाथ ने अपने संकट प्रबंधन की नई सियासी कुशलता का नमूना भी पेश कर दिया है।
बहरहाल नए समीकरण की बानगी लोकसभा चुनाव से पहले या इसके ठीक बाद तब देखने को मिल सकती है जब राजग को सरकार बनाने का अवसर मिल जाए।
अगर ऐसी स्थिति आती है तो मोदी के साथ सीधी जंग में उतर चुके आडवाणी राजग में शामिल अन्य दलों के माध्यम से मोदी की राह रोकने में जुटेंगे। तो मोदी किसी भी कीमत पर आडवाणी को पार्टी का साथ हासिल होने नहीं देना चाहेंगे।
ऐसे में राजनाथ वह चेहरा होंगे जिसे मजबूरी में ही सही, सभी पक्ष आगे बढ़ाने पर सहमति दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में संघ का भरोसा, मोदी की दोस्ती और आडवाणी की मजबूरी राजनाथ सिंह के काम आ सकते हैं।
वैसे भी दिलचस्प तथ्य यह है कि राजनाथ न तो भारतीय राजनीति में कट्टर हिंदुत्व का चेहरा हैं और न ही धर्मनिरपेक्ष चेहरा। वह जरूरत के समय किसी भी सांचे में ढल सकते हैं।