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धीरूभाई अंबानी: सफलता को किसी डिग्री की जरूरत नहीं

Fri, 28 Dec 2012 09:38 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Fri, 28 Dec 2012 09:38 AM IST
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dhirubhai ambani success does not require a degree

पेट्रोल पंप पर काम करने से लेकर पेट्रो केमिकल रिफाइनरी बनाने वाले धीरूभाई अंबानी ने करोड़ों लोगों के लिए एक आदर्श स्थापित किया है। 28 दिसंबर 1933 को सौराष्ट्र के जूनागढ़ जिले में जन्मे धीरूभाई ने अपनी मेहनत और लगन से साबित किया कि साधारण से साधारण व्यक्ति भी बड़े से बड़ा सपना देख सकता है और उन्हें साकार कर सकता है। एक मामूली व्यक्ति से देश की प्रमुख औद्योगिक कंपनी रिलायंस के सिरमौर बनने का उनका सफर काफी संघर्षशील है।

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आर्थिक तंगी के कारण धीरूभाई सिर्फ कक्षा 9 तक की ही पढ़ाई कर पाए और उसके बाद छोटे-मोटे काम-धंधों में लग गए। धीरूभाई की आंखों में बड़े सपने थे और इन्हीं सपनों को साकार करने के लिए वे मुंबई चले आए। मुंबई आकर उन्होंने सड़कों पर फल बेचकर और दुकानों पर काम करके अपनी आजीविका चलाई। इसके बाद अदन जाकर उन्होंने एक रिफाइनरी में मजदूरी और पेट्रोल पंप पर तेल भरने का काम किया।
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उद्योग की शुरुआत
धीरूभाई खुद का व्यवसाय शुरू करना चाहते थे। 1952 में उन्होंने ‘रिलायंस कमर्शियल कॉरपोरेशन’ नामक कंपनी बनाई। इस कंपनी के जरिए धीरूभाई ने शुरुआत में पश्चिमी देशों में अदरक, हल्दी और अन्य मसालों का निर्यात किया। इसके बाद धीरूभाई ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने पालियस्टर धागे, वस्त्र उद्योग, पेट्रो रसायन, तेल और गैस, टेलिकॉम आदि क्षेत्रों में असाधारण उन्नति की। उन्होंने जनता में शेयर बेचकर पैसा इकट्ठा किया और शेयरधारकों का भरोसा भी हमेशा बनाए रखा।
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सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले सीईओ
धीरूभाई अंबानी भारत में सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले सीईओ थे। धीरुभाई वेतन के तौर पर अपनी कंपनी से एक साल में 8.85 करोड़ रुपये लेते थे, जो उस समय देश की सबसे अमीर कंपनी विप्रो के अजीम प्रेमजी को मिलने वाले वेतन 4.28 करोड़ रुपये से भी अधिक था। 2000-01 में धीरुभाई अंबानी को 8.85 करोड़ रुपए का सालाना वेतन दिया गया, जो 1999-2000 के उनके वेतन की तुलना में 73.87 प्रतिशत अधिक था।


जितना बड़ा सोचोगे उतना ज्यादा पाओगे
धीरूभाई का मानना था कि जितना बड़ा सोचोगे उतना ज्यादा पाओगे। जब धीरुभाई एक जगह पर नौकरी करते थे तो उनके साथ काम करने वाले एक मजदूर ने उनसे पूछा कि जब हमारी और तुम्हारी तनख्वाह बराबर है तो तुम उस होटल में जाकर एक रुपए की चाय क्यों पीते हो, जबकि हम सब इस ढाबे में पच्चीस पैसे की चाय पीते हैं। धीरूभाई ने इस बात का जवाब देते हुए कहा कि मुझे तुम्हारे साथ चाय पीने में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन जो तुम्हारी छोटी-छोटी बाते हैं उनसे मुझे परेशानी है। मैं जिस होटल में एक रुपए की चाय पीता हूं, वहां मुझे यह पता चलता है कि हजारों-लाखों के सौदे कैसे होते हैं। इसलिए में वहां चाय पीता हूं। ऐसे बड़े स्वप्नदृष्टा थे धीरूभाई अंबानी। 6 जुलाई, 2002 को मुंबई के एक अस्पताल में उनका देहांत हो गया।

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