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देवयानी मामलाः कहां चूके दोनों देश?

Fri, 20 Dec 2013 05:49 PM IST
Updated Fri, 20 Dec 2013 05:49 PM IST
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deveyani case failure of both countries

सैद्धांतिक रूप से हर मुश्किल एक मौका उपलब्ध कराती है लेकिन ऐसा लगता है कि भारत और अमेरिका के बीच आए कूटनीतिक तनाव ने संकट से बचने के लिए यह मौका खो दिया।

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दोनों देश अपने संबंध मजबूत करने के बजाय आपदा प्रबंधन में लगे हुए हैं और ये जल्दी ख़त्म होता भी नहीं दिखता।

यह सारा हो-हल्ला एक भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की न्यूयॉर्क में गिरफ़्तारी के बाद शुरू हुआ।

पढ़े-जानिए, राजनयिक देवयानी पर क्या हैं आरोप?
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खोबरागड़े पर आरोप था कि उन्होंने अपनी घरेलू नौकरानी के कामकाजी वीज़ा पर ग़लत जानकारी दी और नौकरानी के पारिश्रमिक के बारे में भी सही सूचना नहीं दी थी।

न्यूयॉर्क में भारतीय रायनयिकों के संग हुए कथित दुर्व्यवहार का यह तीसरा मामला है।

अमेरिका का कहना है कि खोबरागड़े को रायनयिक के तौर पर मिलने वाले सीमित विशेषाधिकार के तहत ऐसा कोई भी आचरण नहीं आता जो अमरीकी कानून का उल्लंघन करता हो।

खोबरागड़े को जिस तरह से हिरासत में लिया गया उससे भारत में राजनीतिक भूचाल आ गया।

देवयानी को अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने के बाद हथकड़ी लगाकर हिरासत में लिया गया। उन्हें निर्वस्त्र करके शरीर के हर हिस्से की तलाशी ली गई। उसके बाद उन्हें जेल की एक कोठरी में आम कैदियों के साथ रखा गया।
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उच्च-पदस्थ भारतीय अधिकारी ने इस कार्रवाई को 'निंदनीय और बर्बर' कहा। अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन से इस घटना के लिए खेद जताया है।

पढ़े-नौकरशाह, नौकरानी और अमेरिका, 2 और कहानियां

भारत ने इस घटना के जवाब में अमेरिकी राजनयिकों को भारत में मिलने वाली विशेष सुविधाओं को वापस ले लिया और नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास से बाहर के बैरीकेड्स हटा दिए।

भारत ने खोबरागड़े की संयुक्त राष्ट्र में पदोन्नति कर दी है जिसके तहत उन्हें रायनयिकों को मिलने वाला पूर्ण विशेषाधिकार मिलने लगेगा। अदालती मामले के लिए इसका जो भी मतलब हो इससे यह तो पता चलता है कि यह विवाद केवल कूटनीतिक नहीं है बल्कि एक राजनीतिक विवाद भी है।

देवयानी का 'स्ट्रिप-सर्च' यानी निर्वस्त्र करके तलाशी एक जानबूझकर की गई ग़लती नहीं थी।

अमेरिकी पुलिस ने कहा है कि उसने 'गिरफ़्तारी की सामान्य प्रक्रिया का पालन किया', यह ब्यूरोक्रेसी की भाषा है जिसका अर्थ हुआ कि कानून का पालन किया गया।

खोबरागड़े के साथ वैसा ही व्यवहार किया गया जैसा कि अदालत में हाजिर होने वाली किसी दूसरी महिला अभियुक्त के साथ किया जाता है।

पढ़े-देवयानी की गिरफ्तारी सही: अमेरिका

लेकिन किसी राजनयिक की गिरफ़्तारी कोई दूसरा मामला नहीं होता। अगर विदेश मंत्रालय को यह नहीं पता था कि खोबरागड़े को स्ट्रिप-सर्च किया जाएगा तो उसे माँग करनी चाहिए थी कि इस मामले को विशेष तरीके से लिया जाए।

राजयनिक गलियारों में किसी भी तरह की ऊँच-नीच महसूस हो तो प्रतिक्रिया होती है। आप जैसा कदम उठाते हैं आपको भी वैसे जवाब की उम्मीद करनी चाहिए। इस मामले में राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर हंगामा तो होना ही था। उसमें भी ख़ासतौर पर भारत जैसे देश में, जहाँ मीडिया इतना सशक्त है और कई बार तो कुछ नया करने की कोशिश में रहता है।

कहाँ तो दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्र के बीच मज़बूत रिश्ते का निर्माण होना चाहिए था तो लोअर मैनहटन की अदालत जाते समय दोनों देशों ने बड़े परिदृश्य और व्यापक मुद्दों की अनदेखी की

भारत एक उभरती हुई शक्ति है जिसे अमेरिका वर्षों से बढ़ावा देता रहा है।

मानवाधिकारों के मामले में भारतीय वाणिज्य दूत के ख़राब रिकॉर्ड पर निराशा होना स्वाभाविक है लेकिन अदालत में मामला चलाना एक लंबी प्रक्रिया है, इसलिए संबंधों के बहुत अच्छे होने पर भी उस पर इस मामले की छाया तो पड़ेगी ही। मुझे इस समय इटली में अमरीकी अमांडा नॉक्स का नाम याद आ रहा है।

विदेश मंत्रालय ने भारत को इस मामले के बारे में सितंबर में ही बता दिया था लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इस मसले से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के लिए क्या कूटनीतिक प्रयास किए गए।

अमेरिका ये कर सकता था कि खोबरागड़े को 'अवांछित व्यक्ति' घोषित कर दिया जाता। फिर वह कहता कि खोबरागड़े तत्काल अमेरिका छोड़ दें और फिर अन्य भारतीय राजनयिकों के घरेलू नौकरों को रोज़गार वीज़ा देने से मना कर देता।

लेकिन जब अमेरिका ने एक बार कार्रवाई करने की सोच ली तो उसे न केवल हर कार्रवाई कानून सम्मत ढंग से करनी होगी बल्कि उसे हर उचित कदम उठाना होता है ताकि मामला उन्हीं पर केंद्रित रहे। जाहिर है कि ऐसा नहीं हुआ।

भारत के लिहाज़ से ये स्पष्ट नहीं है कि आख़िर अमरीकी अधिकारियों ने जब इस मामले में पहले से सूचना दे दी थी तो अमेरिका में भारतीय राजदूत या देश के विदेश मंत्रालय ने चीज़ें ठीक क्यों नहीं की?

भारतीय राजनयिक भी समझते हैं कि अमेरिकी कानून और अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन करना रचनात्मक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरते भारत की भूमिका को कम करता है।

भारत की ओर से सुरक्षा के लिए लगाए गए बैरीकेड्स को हटवाना ग़ैर-जिम्मेदाराना और ज़रूरत से कुछ ज़्यादा है।

अगर बाकी सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त हो तो भी वियना समझौते के तहत दूतावास को सुरक्षा उपलब्ध कराना भारत की प्राथमिक जिम्मेदारी है। भारत को समझना चाहिए कि पिछले साल लीबिया के बेनग़ाज़ी में अमरीकी कूटनीतिक पोस्ट पर हुए हमले को देखते हुए ऐसा क़दम कितना संवेदनशील हो सकता है।


जब आरोप तय हो गए तो दोनों देशों को साथ मिलकर काम करना चाहिए था। इससे कम से कम ये तय हो जाता कि दोनों के काफ़ी बेहतर हो चुके संबंध इससे ख़राब नहीं होते।

भारत और अमेरिका ने एक मामूली मामले को एक बड़े इम्तिहान में बदल दिया है। ऐसा होना ये दिखाता है कि ये नौकरशाही और कूटनीतिक स्तर पर कितनी बड़ी चूक है।

आख़िरकार सरकारों और विदेश मंत्रालयों की जीविका ही व्यापक परिदृश्य को ध्यान में रखने से चलती है।

भारत-अमेरिका संबंध को लेकर आशावान होने के वैसे अब भी ढेरों कारण हैं। दोनों देशों के बीच परस्पर लाभ के बिंदु दोनों के बीच की असहमतियों से काफ़ी ज़्यादा हैं। लेकिन इस हफ्ते जो हुआ उसमें अगर कोई इशारा छिपा हुआ है तो आगे का रास्ता ऊबड़-खाबड़ ही होगा।

(पीजे क्रॉली अमेरिका के पूर्व सहायक विदेश मंत्री हैं। फ़िलहाल वह द जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक डिप्लोमेसी एंड ग्लोबल कम्यूनिकेशन में फेलो हैं।)

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