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हिमाचल में 21वीं सदी में भी देवदासी प्रथा

सुनील चड्ढा/शिमला Updated Tue, 11 Dec 2012 01:28 PM IST
devadasi system in himachal in 21st century
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क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि 21वीं सदी के दूसरे दशक में भी देवभूमि हिमाचल में देवदासी प्रथा विद्यमान थी। जी हां, यह सच है। यह खुलासा हुआ है हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के शोध में। विभागाध्यक्ष प्रो. लक्ष्मण सिंह ठाकुर के निर्देशन में हुए शोध में यह तथ्य सामने आया है कि डेढ़ साल पहले तक कुल्लू में देवदासी प्रथा चल रही थी। शोध में दावा किया गया है कि उत्तर-पश्चिमी भारत की अंतिम देवदासी सेबती का 17 अगस्त 2011 को निधन हुआ है।
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‘कुल्लू की विशिष्ट देव परंपराएं और राज परिवार’ विषय पर शोध में हिमाचल की देवदासी प्रथा का खास तौर पर उल्लेख किया गया है। प्रो. लक्ष्मण सिंह ठाकुर के अनुसार कुल्लू के बिजली महादेव मंदिर में कई दशकों से आंगू डोभी गांव के विशेष हेसी परिवार से संबंध रखने वाली देवदासी सेबती ने करीब 12 वर्ष की आयु से नृत्य और गीत गाकर पौराणिक प्रथा को संजोए रखा।

शोधकर्ता खीम सिंह ने 16 जुलाई, 2011 को देवदासी सेबती से करीब 90 साल की उम्र में साक्षात्कार लिया था। कुल्लूवी भाषा में करीब 35 मिनट के साक्षात्कार में सेबती ने देवदासी परंपरा का विस्तृत विवरण देकर इतिहास के कई रहस्यों को बेपर्दा किया। देवघाटी कुल्लू के आंगू डोभी गांव के विशेष हेसी परिवार से संबंध रखने वाली कन्याएं न जाने कितनी शताब्दियों से बिजली महादेव मंदिर में देवदासी की परंपरा निभा रही थीं। इस श्रृंखला की अंतिम देवदासी सेबती थीं।

अविवाहित रहती थी देवदासी
आंगू डोभी गांव से संबंध रखने वाले हेसी परिवार की कन्याएं आजीवन अविवाहित रहकर बिजली महादेव के प्रति समर्पित रहती थीं। वे अपनी मांग में सिंदूर और मस्तक पर तिलक देवता के नाम से लगाती थीं। देवदासी को कुल्लू भाषा में ‘महादेव-री-हेसणी (बिजली महादेव की पत्नी)’ कहा जाता था। सेबती पंचायत वार्ड की पंच और पंचायत समिति की सदस्य भी रहीं।

कौन है हेसी समुदाय
देवभूमि में हेसी जाति को तुरी, बेड़ा और बैंसी नामों से पुकारा जाता है। हेसी परिवार हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, बिलासपुर, हमीरपुर, मंडी, कांगड़ा और शिमला जिलों में मौजूद हैं। 1981 की जनगणना के अनुसार इस समुदाय की जनसंख्या 2057 थी। हेसी समुदाय के लोग मंदिर में पारंपरिक वाद्य यंत्रों (शहनाई, डफली, ढोलक) को बजाने में दक्ष होते हैं। हेसी स्वयं को क्षत्रियों का वंशज मानते हैं। शोध में उत्तमू, ध्यानू, फत्ती, समोरणु, चैलू आदि कुल्लू की अन्य देवदासियों के नामों का भी पता चला है।

देवता के लिए नृत्य
साक्षात्कार में देवदासी सेबती ने बताया कि वह बिजली महादेव मंदिर में हर अनुष्ठान पर नृत्य करती थी। दशहरा पर भी नृत्य किया जाता था। नृत्य के साथ गीत वह खुद रचती थी। गीत सिर्फ देवता के लिए ही गाया जाता था। सेबती ने बताया कि बिजली महादेव मंदिर में अनेक अनुष्ठानों पर नृत्य करने के लिए उसे देवता ने जमीन दी थी, जिस पर सिर्फ उसका अधिकार था। उसे अनाज भी मिलता था।

2003 को उन्होंने देव मंदिर में अंतिम नृत्य किया। देवदासी सेबती की शादी नहीं हुई, लेकिन उन्हें एक बेटा हुआ, जिसे समाज ने महादेव के बेटे के रूप से स्वीकार किया। राजस्व रिकार्ड में उनके पुत्र को महादेव का पुत्र बताया गया है। यह जानकारी बिजली महादेव मंदिर थमाण के पुजारी ने साक्षात्कार के दौरान दी है।
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