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दिल्ली गैंगरेप पीड़िता फिर वेंटिलेटर पर

Sun, 23 Dec 2012 09:14 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Sun, 23 Dec 2012 09:14 PM IST
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delhi rape case victim health better say doctors

दिल्ली गैंगरेप पीडि़ता के स्वास्थ्य के बारे में डॉक्टरों का कहना है कि अभी खतरा टला नहीं है। युवती की हालत अभी भी चिंताजनक बनी हुई है। संक्रमण को कम करने के लिए रविवार को पेट का एक छोटा ऑपरेशन किया गया। उसे दुबारा से वेंटिलेटर पर शिफ्ट किया गया है। प्लेटलेट्स की कमी से चिंता और बनी हुई है।

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शनिवार को प्लेटलेट्स में काफी कमी आ गई। हालांकि चिकित्सक इस बात से राहत में हैं कि युवती बातचीत करने की स्थिति में आ गई है। सेहत में सुधार को देखते हुए उसे सेव का जूस भी दिया गया। पीड़ित युवती के स्वास्थ्य की जानकारी देते हुए सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. बी.डी. अथाणी ने बताया कि बिलीरुबिन (पीलिया) लेवल 5.9 पहुंच गया है जबकि शुक्रवार को यह 5.1 था।
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बिलीरुबिन लेवल बढ़ने से लीवर पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। चिकित्सकों का कहना है कि बिलीरुबिन लेवल बढ़ते रहने से लीवर काम करना बंद कर सकता है। इसी वजह से एम्स के चिकित्सकों की भी मदद ली जा रही है। एम्स ट्रामा सेंटर के प्रमुख व सर्जन डॉ. एम.सी. मिश्रा पहले से ही इलाज कर रहे चिकित्सकों की मदद कर रहे हैं। जी.बी. पंत अस्पताल के जीआई सर्जरी विभाग के चिकित्सक की भी मदद ली जा रही है।
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डॉ. अथाणी ने बताया कि युवती के स्वास्थ्य में सुधार है, लेकिन खतरा टला नहीं है। उन्होंने बताया कि डब्ल्यूबीसी काउंट 2600 पर आया है। शुक्रवार की तुलना में इसमें 1100 की वृद्धि हुई है। डब्ल्यूबीसी बढ़ने से रोग से लड़ने की ताकत मिलेगी लेकिन अभी भी डब्ल्यूबीसी बेहद कम है। कम से कम 4000 डब्ल्यूबीसी होना जरूरी होता है। पीड़ित युवती अब थोड़ा बहुत बोल पा रही है।

पीड़ित युवती की हालत में शनिवार को पहली बार इतना सुधार देखा गया। इसके बाद मनोचिकित्सकों की भी मदद ली गई। अस्पताल के दो वरिष्ठ मनोचिकित्सकों ने पीड़ित युवती से बात की और उसकी मानसिक स्थिति की जांच-पड़ताल की।


सांस लेने में उसे अब कोई दिक्कत नहीं हो रही है, इसी वजह से कृत्रिम तौर पर ऑक्सीजन का लेवल काफी कम कर दिया गया है। उसकी हालत में सुधार को देखते हुए उसे सेव का जूस भी पिलाया गया। चिकित्सकों का कहना है कि संक्रमण को कम करने के लिए उसे हाई एंटीबॉयोटिक दी जा रही हैं। बावजूद संक्रमण खत्म नहीं हो रहा है। चिकित्सकों के लिए यह भी चुनौती है, क्योंकि बाद में एंटीबॉयोटिक बेअसर भी हो सकता है।

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