दिल्ली की जंग में मोदी भूल गए अपनी चोट?
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दिल्ली के उप राज्यपाल और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक बार फिर लोकतंत्र के दो पहलुओं की ओर ध्यान खींचा है- वैधानिकता और परंपरा। हो सकता है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा न मिलने के कारण उपराज्यपाल के पास कुछ शक्तियां हों लेकिन राजनीतिक और लोकतांत्रिक पैमाने पर देखें तो केजरीवाल अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, शिवराज सिंह चौहान और ऐसे ही अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तुलना में कहीं से भी कमतर जनप्रतिनिधि नहीं हैं।
इसे भी ध्यान में रखना चाहिए कि भारतीय संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली ब्रितानी संसदीय तंत्र से प्रेरित है, जो कि परंपरा पर आधारित है। लेकिन हमारे पास लिखित संविधान है और इसमें कानून और धाराएं लिखी हुई हैं।
पढ़ें विस्तार से
दिल्ली का गतिरोध, मौजूदा ‘आधा अधूरा’ राज्य
लेकिन परंपरा कानूनन बाध्यकारी नहीं होती है। इसकी सफलता बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित पक्षों के सभी लोग नैतिक आधार पर एक क़ानून मानने पर सहमत हों।
इसलिए हो सकता है कि जंग कानून की अदालत में अपने नंबर बढ़ा ले जाएं, लेकिन जनता की अदालत में अरविंद केजरीवाल हमेशा ऊपर बने रहेंगे। असल में दिल्ली का वर्तमान गतिरोध, दिल्ली के मौजूदा ‘आधा अधूरे’ राज्य के दर्जे में निहित है।
दोनों ही पार्टियों, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, ने पूर्ण राज्य के दर्जे के मुद्दे पर लगातार चैंपियन बनने की कोशिश की।लेकिन संसद में महिला आरक्षण के मुद्दे जैसा उनका रुख़ रहा है, उसी तरह ही इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की अपना वादा पूरा करने की कोई मंशा नहीं है। आज केंद्र में सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने अपने विजन डॉक्यूमेंट 2015 में इसका जिक्र तक नहीं किया।
साल 2013 के विधानसभा चुनावों के दौरान, तब प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में शामिल रहे नरेंद्र मोदी और भाजपा के अनौपचारिक मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हर्ष वर्धन ने लगातार इसके बारे में बातें कीं थीं।
मोदी कर सकते हैं तो केजरीवाल क्यों नहीं?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्र और राज्य के बीच में 'कोऑपरेटिव फ़ेडरलिज़्म' या सहकारी संघवाद के बारे में अक्सर बातें करते रहे हैं। उनके अनुसार, योजना आयोग और अन्य केंद्रीय एजेंसियां अक्सर उनके गुजरात के साथ सौतेला व्यवहार करती थीं।
जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो एक खास नौकरशाह को अपना प्रधान सचिव बनाने के लिए अड़ गए थे। जब नौकरशाहों से संबंधित क़ानूनी अड़चनें आईं तो संसद के मार्फत उस खास नौकरशाह के लिए संशोधन किए गए। इस तर्क में दम है कि यदि प्रधानमंत्री और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री अपने हिसाब से नौकरशाह चुनने के स्वतंत्र हैं तो दिल्ली के मुख्यमंत्री इस अधिकार से महरूम क्यों रहें?
जंग को हटा देना चाहिए?
एक आलोचना यह भी है कि दिल्ली के उप राज्यपाल रायसीना हिल्स के नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में बैठे अपने ऊपर के अधिकारियों की वाहवाही पाने की जल्दबाजी में दिख रहे हैं।
यह बहुत गंभीर आरोप है और यदि इसमें ज़रा भी दम है तो नजीब जंग को पद छोड़ने के लिए कहा जाना चाहिए या कम से कम उनका किसी अन्य राज्य में ट्रांसफर कर देना चाहिए। जंग को तत्काल दिल्ली से कहीं और भेजने के लिए, प्रधानमंत्री मोदी का कमला बेनीवाल के साथ खुद का अनुभव काफी होना चाहिए। राज्यपाल या उपराज्यपाल केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त होता है, पर उसका मातहत नहीं होता है।
पूर्व राष्ट्रपति वीवी गिरी द्वारा नियुक्त राज्यपालों को समिति ने अपनी रिपोर्ट (1971) में इस बात की पुष्टि की कि, “राज्य के मुखिया के रूप में राज्यपाल के अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में संविधान में लिखा हुआ है और किसी भी तरह वो राष्ट्रपति का एजेंट नहीं हैं (यानी केंद्र सरकार)।”
नियुक्ति पर सुझाव
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश राजेंद्र सरकारिया ने केंद्र और राज्य संबंधों पर अपनी रिपोर्ट में राज्यपालों के चुनाव के बारे में कुछ दिशा निर्देश तय किए थे।
रिपोर्ट में कहा गया था कि केवल उसी व्यक्ति को राज्य का राज्यपाल नियुक्त किया जाना चाहिए जिसने किसी क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया हो और प्रतिष्ठित व्यक्ति हो। इसमें यह भी सुझाव दिया गया है कि राज्यपालों के चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री को उपराष्ट्रपति और लोकसभा के स्पीकर से सलाह मशविरा करना चाहिए। लेकिन बाद की यूपीए और एनडीए सरकारों ने रिपोर्ट के सुझावों को नजरअंदाज किया।
संविधान सभा की बहस
आजादी के बाद 31 मई 1948 को राज्यपालों की नियुक्ति को लेकर संविधान सभा में बहस के दौरान ओडिशा के कांग्रेसी नेता बिस्वनाथ दास ने कहा था, “अगर पंडित जवाहर लाल नेहरू और सरदार बल्लभभाई पटेल जैसे नेता हमेशा ही अपने कार्यालय में बने रहें, तब तो मुझे कोई शिकायत नहीं है, लेकिन ऐसा तो होगा नहीं और किसी को पता नहीं कि भविष्य में कौन सी पार्टी आएगी।"
उन्होंने आगे कहा था, "यह हो सकता है कि प्रांत में केंद्र से अलग किसी पार्टी का शासन हो। ऐसे में हालत क्या होगी? एक्ट के तहत संवैधानिक मुखिया के रूप में राज्यपाल की नियुक्ति प्रधानमंत्री, दूसरे दल के नेता की सलाह पर करनी पड़ेगी।"
दास के मुताबिक़, "तब मैं इस बात का हवाला देता कि कैसे गवर्नर मेरी पार्टी को ख़त्म करने की कोशिशें करते रहे थे, जो कि अंग्रेज़ों के एजेंट थे। अंग्रेज़ों ने जो कुछ किया, हो सकता है कि केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी भी यही करे। (संविधान सभा बहस)”
तमिलनाडु की नजीर
सालों बाद एम करुणानिधि ने एक सवाल के जवाब में कहा था, “पंडित नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में लिखा है कि राज्यपाल (अंग्रेज़ी राज़ के दौरान) दिल्ली या शिमला के निर्देश पर काम करते थे। यही स्थिति अबतक चली आ रही है।"
एम करुणानिधि के मुताबिक, "राज्यपाल केंद्र के एजेंट और मुख़बिर के रूप में काम करते हैं। 1977 में जब तमिलनाडु में डीएमके सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया गया तब इसका कारण बताया गया था कि सरकार ने यह क़दम गवर्नर की रिपोर्ट के आधार पर उठाया। लेकिन ऐसा नहीं था।"
करुणानिधि के अनुसार, "रिपोर्ट दिल्ली में ही तैयार की गई और वहीं रखी गई। और जब धारा 356 लगाई गई उसके बाद सिर्फ हस्ताक्षर करने के लिए गवर्नर को बुलाया गया था।”