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बयान पर कायम युवती का मित्र, देर से पहुंची थी पुलिस

Mon, 07 Jan 2013 12:38 AM IST
नई दिल्ली/एजेंसी
नई दिल्ली/एजेंसी Updated Mon, 07 Jan 2013 12:38 AM IST
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delhi gangrape victim friend told police arrived late

गैंगरेप का शिकार हुई युवती के मित्र ने घटना की सूचना मिलते ही तेजी से हरकत में आने के पुलिस के दावे को फिर खारिज कर दिया है। उसने कहा कि घटनास्थल पर काफी देर बाद तीन पीसीआर वैन पहुंची थीं।

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इसके बाद भी पुलिस वाले इलाके को लेकर बहस में उलझे रहे। उन्होंने मेरी गंभीर घायल दोस्त को अस्पताल ले जाने में कोई तत्परता नहीं दिखाई थी। युवक ने कहा कि वह चाहता है कि आरोपियों को वही सजा मिले जो उसकी दोस्त चाहती थी, यानी उन्हें जिंदा जलाकर मार देना चाहिए।  
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मित्र ने एक चैनल से बातचीत में कहा कि मैं और मेरी दोस्त सड़क पर बिना कपड़ों के पड़े थे। सर्दी में हम मदद के लिए चीख रहे थे। लोग उधर से गुजरते रहे, लेकिन कोई रुका नहीं। काफी देर बाद एक बाइक वाला रुका तो पुलिस को सूचना दी गई।
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तब तक वहां कई लोग जमा हो चुके थे। सब हमें देखकर बातें करते रहे, लेकिन किसी ने हमें ढकने के लिए एक कपड़ा तक नहीं दिया। काफी देर बाद वहां एक के बाद एक तीन पीसीआर वैन आईं। लेकिन पुलिसकर्मी इलाके को लेकर ही उलझे रहे।

मैं उनसे एंबुलेंस बुलाने और अस्पताल ले चलने के लिए कहता रहा, लेकिन वे सुन ही नहीं रहे थे। कुछ देर बाद हमसे एक वैन में बैठने के लिए कहा गया। मैंने अपनी दोस्त को खुद वैन में लिटाया। युवक ने कहा कि वह यह बात किसी के दबाव में नहीं बोल रहा है, बल्कि उस दिन उसे और उसकी दोस्त को यही झेलना पड़ा था।
 
मित्र ने कहा कि नाबालिग आरोपी ज्यादा से ज्यादा तीन साल में ही छूट जाएगा। लेकिन अगर वह छूट गया तो हमारी सारी मेहनत बेकार जाएगी। वह दिमाग से नाबालिग नहीं है। दरिंदगी में वह पूरी तरह शामिल था। उसकी शक्ल हमेशा मेरी आंखों से सामने घूमती रहती है। उसने बहुत भोला बनकर और बार-बार बुलाकर हमें बस में बिठाया था।

सफदरजंग अस्पताल में स्टाफ के रवैये पर सवाल उठाते हुए उसने कहा कि यदि मेरी दोस्त को वक्त पर और सही इलाज मिलता तो वह बच जाती। मुझे लगता है कि अस्पताल में जैसा बर्ताव मेरे साथ हुआ, वैसा ही मेरी दोस्त के साथ भी हुआ होगा।

जब हम अस्पताल पहुंचे मैं बहुत देर तक बिना कपड़ों के फर्श पर पड़ा रहा। मैं शरीर ढकने के लिए पर्दे या कोई कपड़ा मांगता रहा। लेकिन सब टालते रहे। मेरा इलाज भी मेरे परिजनों के पहुंचने के बाद ही शुरू हो सका।

पहचान छिपाने का अब कोई अर्थ नहीं
युवती के दोस्त ने कहा कि पहचान छिपाने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। अब उनकी दोस्त इस दुनिया में नहीं है। उसने कहा कि यह विडंबना ही है कि भुगतते भी हम हैं और छिपाना भी हमें ही पड़ता है।


उसने युवती को याद करते हुए बताया कि वह बहुत हंसमुख और बहादुर थी। वह हमेशा दूसरों को प्रेरणा देती थी। वह पढ़ने में बहुत अच्छी थी और पढ़ाई के साथ जॉब भी किया करती थी। उसकी हमेशा ही भविष्य की नई नई योजनाएं रहती थीं।

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