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दिल्ली विधानसभा चुनावः बाजी इश्क की?

Fri, 06 Feb 2015 12:54 PM IST
Updated Fri, 06 Feb 2015 12:54 PM IST
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पिछले दिनों आए चुनाव पूर्व सर्वेक्षण ने यह इशारा किया है कि राजनीति में असभ्यता वोटरों को बुरी लगी है। उसे यह बात नागवार गुज़री है, जैसा मेट्रो स्टेशन ले जाते एक ऑटो वाले ने कहा, "दूसरे देश से बुला लिया 26 जनवरी को और केजरीवाल को न्योता नहीं दिया! फिर कहा कि अगर निमंत्रण चाहिए तो हमारी पार्टी में आओ।"

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वह बहुत पढ़ा-लिखा नहीं, लेकिन इतना उसे पता है कि आज तक भारतीय संसदीय राजनीति में यह बदतमीज़ी नहीं की गई थी।आपका हो तो 13 दिन का भी होकर पूर्व प्रधानमंत्री हो जाता और दूसरा 49 दिन के बाद भी पूर्व मुख्यमंत्री के लायक़ शिष्टाचार का हक़दार नहीं!
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और जैसा कि 'सफल' आउटलेट (सब्ज़ी की सरकारी दुकान) के वेंडर ने कहा, "अरे, हाल यह हो गया कि कुछ बोलने पर काटने को दौड़ते हैं इनके लोग! कल एक बड़े आदमी से थोड़ी बात क्या कह दी इनके साहब के बारे में, वह आपे से बाहर हो गए! थे तो बड़े जेंट्री के ही!"
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वेंडर का कहना था, "वह इस माहौल से फ़िक्रमंद हैं, क्या हम हम अपनी ज़ुबान खोलने से भी गए! अभी तो कुछ महीने में यह हाल है, अगर पूरी ताक़त हर जगह आ गई तो फिर जाने क्या गुल खिलाएंगे। इन्हें रोकना ज़रूरी है!"

भारत का प्रतीक

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दिल्ली जो भारत का प्रतीक है और दिल्ली को दिल्ली बनाने वालों ने इस बार कमर कस ली लगती है।ये वे लोग हैं, जिन्हें बाहरी मेहमानों के सामने हुकूमत बुलाना नहीं चाहती।


ये घर बनाते हैं, घरों में काम करते हैं, दफ्तरों में सबसे निचले पायदान पर हैं, जिनके नाम फ़ैज़ (उर्दू के शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़) ने अपनी नज़्म 'इंतसाब' (आज के नाम) लिखी थी।

ऑटो वाले ने कहा, "हमने तो साहब तय कर लिया है।"पहली बार आज़ाद भारत में किसी प्रधान ने कहा है कि उसकी क़िस्मत पर देशवासी भरोसा करें। पहली बार कोई अपने विरोधियों को बदक़िस्मत कह रहा है।

नौजवानों का शहर

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किसी ने कहा, "हम तो साहब, उस दिन घंटों लाइन में लगते हैं, वोट देते हैं, ऑटो, ठेला बंद कर देते हैं, थोड़ा खाते-पीते हैं, मस्ती करते हैं! आप लोगों का क्या, सर!"जनतंत्र की पाठशाला जैसे खुली है।

 जनता खुले आंखों देख रही है, सब कुछ सुन रही है।बड़े पंडित जिस मुद्रा को डिकोड करने के लिए 'डिस्कोर्स एनालिसिस' के सिद्धांत का सहारा लेंगे, उन्हें वह सहजबुद्धि से डिकोड कर चुकी है।

वह हर विज्ञापन, प्रेस कांफ्रेंस की टाइमिंग की जांच कर रही है और अपना फ़ैसला कर रही है। दिल्ली नौजवानों का शहर है।

हिंदी-हिंदी

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मुखर्जी नगर हो या कटवारिया सराय या मुनीरका- नौजवान, पूरे देश से भरे पड़े हैं। किसका साथ देंगे वे? परम्परा रही है, जवानी इन्साफ़ के साथ, ताक़तवर के ख़िलाफ़, कमज़ोरों के पक्ष में खड़ी हो जाती है।

वह अहंकार, दंभ को बर्दाश्त नहीं करती, ठोकरों से चूर कर देती है। तो दिल्ली में क्या जवानी का पक्ष अनिश्चित है? ऐसा नहीं सर! छात्र उत्साहित हैं। क्या मुखर्जी नगर में लाठी चार्ज को वे भूल गए हैं?

क्या वे भूल गए हैं कि हिंदी-हिंदी करने के बाद भी इस बार यूपीएससी के पर्चे वैसी ही दांततोड़ हिंदी में आए थे?

देश समाज

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ग़रीबों का अपना वजूद है और इज्‍ज़त भी। यह भी पहली बार किसी दल के प्रमुख ने कहा है कि ग़रीब को तो बस मुफ्त की चीज़ का वादा करो, वो झांसे में आ जाते हैं।

तो क्या वो इतना गए गुज़रे हैं? उन्हें अपने अलावा देश समाज की फ़िक्र नहीं! क्या वो पेट भरने और बच्चे पैदा करना भर जानते हैं? क्या यह देश सिर्फ़ खाते-पीतों का, कोठियों और गाड़ीवालों का है?


क्या वही सोच समझ कर फ़ैसला करते हैं, ग़रीब नहीं?यह अपमान और वो भी जनतंत्र के नाम पर! उन्हें यह भी ख़बर है कि यह वही पार्टी है जिसने कम पढ़े होने पर स्थानीय निकायों में चुनाव लड़ने पर राज्यों में रोक लगाना शुरू कर दिया है।

पढ़ने लिखने का ग़रीबी से कुछ तो रिश्ता है। तो क्या सत्ता पर पैसेवालों, यूनिवर्सिटी से निकले लोगों का क़ब्ज़ा होगा? फिर भारतीय लोकतंत्र का पूरा नक्शा ही क्या बदल दिया जाएगा?

यह भी अजब बात थी कि राष्ट्र का प्रधानमंत्री ये कहे कि हमारी पार्टी को इसलिए सत्ता दो क्योंकि वो मेरे डर से काम करेगी।क्या आज तक किसी नेता ने अपने ख़ौफ़ की दुहाई दी थी? क्या यह जनतंत्र की ज़ुबान है?

तो दिल्ली का चुनाव एक तरह से ख़ालिस जनतंत्र के सवाल पर लड़ा जा रहा है। जनतंत्र, यानी सत्ता को चुनौती देने की जगह का बचे रहना, आवाज़ों का बचे रहना।

धरना प्रदर्शन

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जैसा कि एक दिल्लीवाले ने कहा, "एक शख्‍स तो है साहब, जिसने हिम्मत दिखाई। और जीवट भी। क्या हुआ जो थोड़ा नातजुर्बेकार है! क्या हुआ जो पिछली बार हड़बड़ाकर इस्तीफ़ा दे दिया।

वो आगे कहते हैं कि यह तो कोई ऐसा बड़ा जुर्म नहीं। वो सीखने की बात करता है, ग़लती क़बूल करता है, ग़लती के लिए माफ़ी भी मांगता है।

टुकड़ों में सुनता हूँ लोगों को चर्चा करते हुए, एक पुराने वामपंथी कार्यकर्ता ने कहा, "यह क्या आरोप हुआ कि वो धरनेबाज़ है। जुलूस, धरना, प्रदर्शन के बिना राजनीति होती है कहीं? और क्या कुर्सी पर रहते इनके लोगों ने कभी कांग्रेस के ख़िलाफ़ कोई प्रदर्शन नहीं किया?"

दिल्ली की जीत

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जनतंत्र को जनता कई बार उसके सबसे नाज़ुक लम्हे में उबार लेती है। एक छठी इंद्रीय है शायद उसके पास। एक हद के बाद और ढील नहीं।

लग़ाम कस देनी होगी। दिल्ली की जीत, जनता को पता है, बस लगाम कसना भर है। और यह जंग अवाम ही लड़ रही है। मैक्समूलर मार्ग पर एक जत्था जा रहा है।

एक साहब सलाम करते हैं, "देखिए, ये कॉमरेड नागपुर से आए हैं, अपना टिकट लगा कर, निज़ामुद्दीन में टिके हैं। आम आदमी पार्टी के लिए काम करने को।"

देखता हूँ, वे ख़ामोशी से आगे बढ़ रहे हैं। दिल्ली की जनता पर कोई अहसान लादने नहीं आए। यहाँ के नतीजे से शायद पूरे हिन्दुस्तान में जुम्बिश आएगी।

जो लगे हैं, उनके चेहरों पर तनाव नहीं, एक रुहानी ख़ुशी है, मानो कोई भला काम कर रहे हों। ऐसा काम जो अपना पुरस्कार ख़ुद है।

जिसे करने के बाद कितनी थकान हो, झुंझलाहट नहीं होती, चैन की नींद आती है। तो अवाम ने दांव लगा दिया है। पता नहीं, उसने फ़ैज़ को सुना है या नहीं।

लेकिन मुझे तो यह कुछ इश्क़ का मामला लगने लगा है, "ग़र बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है, जो चाहो लगा दो डर कैसा।।। जो जीत गए तो क्या कहना, हारे भी तो बाज़ी मात नहीं।"

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