फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   delhi assembly election

चुनाव में 'रोबो' बना दिए गए दिग्गज भाजपा नेता

Fri, 06 Feb 2015 12:43 AM IST
Updated Fri, 06 Feb 2015 12:43 AM IST
विज्ञापन
delhi assembly election

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा के स्थानीय दिग्गज नेताओं की भूमिका महज निर्देशों का पालन करने वाले रोबो की तरह रही। रणनीति बनाने के लिए न तो पार्टी नेतृत्व ने इन नेताओं की सलाह लेना जरूरी समझा और न ही इन नेताओं ने आगे बढ़कर आलाकमान को सुझाव दिया।

विज्ञापन


इन नेताओं की भूमिका महज चुनाव अभियान समिति का निर्देश मानने तक सीमित कर दी गई थी। इनमें से किसी को प्रतिदिन प्रदेश मुख्यालय में निश्चित अवधि तक उपस्थित रहने की हिदायत दी गई, तो किसी को सीएम पद की प्रत्याशी किरण बेदी के साथ खड़े रहने की।
विज्ञापन


इस सब के इतर रणनीति बनाने की बाहरी नेताओं को मिली खुली छूट ने इन नेताओं का जायका खराब कर दिया था। यही कारण है कि इन नेताओं ने कार्यकर्ताओं में जारी असंतोष सहित अन्य मामलों में खुद को हस्तक्षेप से दूर रखा।
विज्ञापन
विज्ञापन

बाहरी नेताओं को मिली खुली छूट ने बिगाड़ा जायका

delhi assembly election

यह प्रबंधन से जुड़े बाहरी नेताओं का ही कमाल था कि कम टिकट मिलने से नाराज पूर्वांचल के मतदाताओं को मनाने के लिए किसी ने न तो सांसद मनोज तिवारी की मदद ली और न ही पहाड़ी मतदाताओं को मनाने के लिए उत्तराखंड के दिग्गज नेताओं को ही मैदान में उतारा।

स्थानीय नेता मानते हैं कि अगर चुनाव नतीजे प्रतिकूल आए तो इसके लिए चुनाव प्रबंधन संभाल रहे नेताओं की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा होगी। कभी पार्टी में सीएम पद के उम्मीदवार रहे एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि इस बार के चुनाव में नेतृत्व ने उनकी भूमिका प्रदेश दफ्तर में प्रतिदिन छह घंटे की उपस्थिति दर्ज कराने की थी।

वह दो हफ्ते से लगातार दफ्तर आ रहे हैं, मगर उनसे किसी तरह की रणनीतिक सलाह नहीं ली गई। इसी प्रकार बीते विधानसभा चुनाव में सीएम उम्मीदवार बनाए गए हर्षवर्द्धन का ज्यादातर समय बेदी के साथ रोड शो और रैलियों में गुजरा।

भाजपा को उठाना पड़ सकता है इसका नुकसान

delhi assembly election

कुछ सांसदों से रैलियां और नुक्कड़ सभाएं कराई तो गई, मगर इनसे भी रणनीति के स्तर पर सलाह नहीं ली गई। उक्त नेता के मुताबिक प्रचार प्रबंधन में चूंकि बाहरी नेताओं को लगाया गया था, इसलिए इससे जुड़े नेता कई बार जमीनी हकीकत नहीं भांप पाए।

जमीनी हकीकत न भांप पाने के कारण हालात संभालने के लिए स्थानीय नेताओं का बेहतर उपयोग नहीं हो पाया। उल्लेखनीय है कि पार्टी ने बीते विधानसभा चुनावों से लेकर लोकसभा चुनाव तक पूर्वांचल और पहाड़ी मतदाताओं को लुभाने के लिए इन राज्यों से जुड़े कद्दावर नेताओं का व्यापक इस्तेमाल करती रही है।

प्रबंध तंत्र ऐसा था कि बेदी की उम्मीदवारी पर नाराजगी जताने वाले सांसद मनोज तिवारी तक का बेहतर उपयोग नहीं हो पाया, जबकि उनकी पूर्वांचल के मतदाताओं में अच्छी पकड़ थी। इसी प्रकार इस चुनाव में उत्तराखंड के दिग्गज नेताओं और पूर्व मुख्यमंत्रियों भुवनचंद खंडूरी, भगत सिंह कोश्यारी और रमेश पोखरियाल निशंक की भी सेवा नहीं ली गई।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed