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मनमोहन सिंह पर तरस है तो शिकायत भी

Sat, 17 May 2014 05:28 PM IST
इमरान क़ुरैशी/बीबीसी के लिए
इमरान क़ुरैशी/बीबीसी के लिए Updated Sat, 17 May 2014 05:28 PM IST
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deferent angels of people on manmohan singh

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस्तीफ़ा आ चुका है। इस्तीफ़ा देने के बाद वे जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद तीसरे ऐसे प्रधानमंत्री बन रहे हैं जिसने 10 साल तक लगातार काम करने के बाद अपना पद छोड़ा हो।

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मगर मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना, नेहरू और इंदिरा गांधी के इतर, अलग मायने रखता है। उनके कार्यकाल में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र भारत में बहुत तेज़ी से विकसित हुआ और उसने विदेशों में भी बहुत नाम कमाया और भारत का सम्मान बढ़ा।
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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रति लोगों की भावनाएं इतनी मिली जुली है कि उन्हें एक खांचे में फिट करना मुश्किल है। एक ओर तो उनके उल्लेखनीय कार्यों के प्रति लोगों के दिल में ख़ास इज्ज़त है। मगर साथ ही, वो जो काम नहीं कर पाए उसके लिए लोगों के मन में नाराज़गी भी है।
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मनमोहन सिंह की आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के कारण जिन क्षेत्रों में भारी तरक़्क़ी हुई उसके लिए वे ऐसे खुदा हैं जो अंत में नाकाम रहा।

वैसे तो उनकी शख़्शियत को किसी हिंदी फिल्मी गीत से अभिव्यक्त करना असंगत होगा लेकिन उनके बारे में सोचते हुए मन में 'डेली बेली' के एक गीत की ये पंक्तियां गूंज उठती हैं, "आई हेट यू लाइक आई लव यू"।

एक असफल प्रधानमंत्री?

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प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह के कार्यों का आकलन करते हुए एक कंसल्टिंग कंपनी के अध्यक्ष और जाने माने लेखक सुब्रतो बागची ने बीबीसी को बताया, "एक तरफ़ तो वो कैदी के समान थे तो दूसरी ओर रखवाले की भूमिका भी निभा रहे थे। उनके इस विखंडित शख्सियत का असर ये हुआ कि एक अरब से अधिक आबादी वाला यह देश 10 साल पीछे चला गया।"

भारतीय उद्योग संघ (सीआईआई) के पूर्व अध्यक्ष अशोक सूटा बागची से अलग राय रखते हैं।

अशोक का कहना है, "मुझे भरोसा है कि उनकी अपेक्षाओं के मुताबिक देश का इतिहास उनके साथ अधिक उदार तरीके़ से पेश आएगा। वे एक कमज़ोर प्रधानमंत्री रहे हैं, इस बात से मैं इत्तेफाक़ नहीं रखता। यदि वे परमाणु मोर्चे पर देश को अगड़ी पंक्ति में रख सकते हैं, तो वे अपने अगले कार्यकाल में भी अच्छा प्रदर्शन कर सकते थे।’’

प्रधानमंत्री के 2004 से 2009 कार्यकाल के बारे में जिससे भी बात की गई किसी ने उनके बारे में किसी तरह की नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी।

इंफोसिस के पूर्व निदेशक और 'मणिपाल ग्लोबल एजुकेशन' के अध्यक्ष मोहनदास पई का कहना है, ''यूपीए-वन के कार्यकाल में वे एक ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में उभरे जिस पर भारत को गर्व था। लेकिन यूपीए-टू के कार्यकाल के दौरान उन्हें एक असफल प्रधानमंत्री क़रार दिया गया। लेकिन अंततः वे एक संवेदनशील, दयालु और विनम्र व्यक्ति साबित हुए और जिसने भारत को ख़ुद से ज्यादा तरजीह दी।"

उन्होंने आगे कहा, "उनकी पार्टी ने उनके साथ धोखा किया है। साल 2009 में मनमोहन सिंह की विकास की रणनीति के कारण ही यूपीए-टू की सत्ता में वापसी हुई थी।"

प्रधानमंत्री का आर्थिक मोर्चा

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सीआईआई के अध्यक्ष और इंफोसिस के कार्यकारी उपाध्यक्ष क्रिस गोपालकृष्णन कहते हैं, "पिछले 10 साल के दौरान उच्च आर्थिक विकास दर बनाए रखना डॉ। मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। देश में इस माहौल के कारण रोज़गार और धन का सृजन हुआ। लोगों की आय का स्तर बढ़ा। यहां तक कि साल 2007-2008 के बीच उभरे वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान भारत की स्थिति दूसरे बड़े देशों के मुक़ाबले बेहतर रही।"

लेकिन इसके बाद साल 2008 में यूरोपीय संकट के उभरने के कारण आर्थिक मोर्चे पर समस्याएं पैदा होनी शुरू हो गईं। मुबंई में हुए 26/11 हमले के तुरंत बाद उभरा लेहमैन संकट, सत्यम संकट और अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के चुनाव को दौरान 'एंटी-आउटसोर्सिंग' अभियान का भी भारत पर व्यापक असर हुआ।

सॉफ्टवेयर उद्योग संगठन, 'नेसकॉम' के पूर्व अध्यक्ष सोम मित्तल ने कहा, ''डॉ। मनमोहन सिंह ने उद्योग-धंधों के लिए सकारात्मक माहौल पैदा किया लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया जब वे 'ट्रांसफर प्राइसिंग' नीति से निपटने में असफल साबित हुए।

'ट्रांसफर प्राइसिंग' का मतलब उस वैल्यू से है जिसके आधार पर विभिन्न देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने उत्पादों या सेवाओं का एक से दूसरी इकाई के बीच कारोबार करती हैं।

सत्ता का केंद्र कहां था?

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कर्नाटक सरकार के पूर्व सूचना प्रोद्योगिकी सचिव तथा एक फर्म के सीईओ विवेक कुलकर्णी का कहना है, ''साल 2008 में सूचना तकनीक क्षेत्र को करों में रियायत से वंचित रखा गया। सेज या विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति ने केवल उन कंपनियों की मदद की जिनके पास अधिक बड़ी जमीन थी। इसका असर ये हुआ कि छोटे और मध्यम उद्यमियों को काफी नुक़सान उठाना पड़ा।"

विवेक कुलकर्णी ने आगे कहा, "सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में स्वाभाविक तौर पर निवेश घट गया। ऐसे में इस क्षेत्र को जब प्रधानमंत्री के नेतृत्व की ज़रूरत थी डॉ। सिंह न तो आगे आए न ही इसके बारे में चिंता की। तब देश का वित्त मंत्री प्रधानमंत्री से ज्यादा शक्तिशाली था। ऐसी स्थिति तभी उत्पन्न होती है जब देश का प्रधानमंत्री सत्ता के केंद्र में नहीं होता।"

सारी मुसीबतों की शुरूआत तब हुई जब डॉ। सिंह के पहले वित्त मंत्री ने कंपनियों पर और ज्यादा कर लगाए। वोडाफोन मामला इसका अच्छा उदाहरण है।

सीआईआई के पूर्व अध्यक्ष सूटा बताते हैं, 'उन्होंने अपने वरिष्ठ मंत्रियों को पूरी आज़ादी तो दी लेकिन उन्हें इस मामले में आम राय बनाने के लिए पहल करने की ज़रूरत थी।’’

वहीं पई कहते हैं, ''ऐसे में भारत के बारे में दुनिया भर में ये धारणा बनी कि उद्योग-धंधों के लिए यहां का वातावरण ठीक नहीं है। नतीजा ये हुआ कि भारत से दुनिया का भरोसा लगभग उठ गया। यही नहीं, ऐसे माहौल के कारण भारत के लोगों का भी विश्वास कम हुआ और उन्होंने देश में पैसा लगाने की बजाय विदेशों में निवेश करना शुरू कर दिया।’’

कई मामलों पर अलग-थलग मनमोहन

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दिलचस्प बात ये है कि सूटा, पई और कुलकर्णी की आम राय है कि अगर सिंह ने खुद पद छोड़ने की पेशकश की होती तो किसी ने इसका विरोध नहीं किया होता।

सूटा कहते हैं, "वे अपने केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए राजा के फ़ैसले को बदल सकते थे। फिर भले डीएमके समर्थन वापस ले लेती, यदि वे जनता के पास दोबारा जाते तो जरूर विजयी होते।’’

पई का कहना है, ''वे मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ गए थे। उन्हें इस बात आभास नहीं हुआ कि उनके पहले कार्यकाल की सफलता ने देश के युवाओ में ढेरों अरमान जगा दिए हैं। अब महज़ रोज़गार ही नहीं चाहिए बल्कि उनके दिल में दूसरे ऐशो आराम की तमन्नाएं भी जाग उठी हैं।’

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