नौकरियों पर केजरीवाल का नया दांव
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दिल्ली सरकार ने मंगलवार को दो अहम फैसले लिए। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में दिल्ली इंटीग्रेटेड मल्टी मॉडल ट्रांजिट सिस्टम (डिम्ट्स) का नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) से ऑडिट कराने का फैसला लिया गया है।
इसके अलावा अनुबंधित और अस्थायी कर्मचारियों की स्थायी भर्ती का रास्ता निकालने के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में समिति बना दी।
कैबिनेट ने महिला सुरक्षा दल का फ्रेम तैयार करने के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में समिति बनाने का भी फैसला किया है। दिल्ली के सभी 272 वार्डों में गठित किए जाने वाले इस दल के पास कोई पुलिसिया अधिकार नहीं होंगे। सिर्फ महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।
महिला सुरक्षा दल पर भी फैसला
महिला सुरक्षा दल आम आदमी पार्टी के घोषणा पत्र का हिस्सा है। इस दल के गठन का रास्ता और फ्रेम तैयार करने के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली समिति 15 फरवरी तक अपनी रिपोर्ट पेश करेगी।
कैबिनेट ने समिति को कहा है कि महिला सुरक्षा समिति के लिए सेवानिवृत सैन्य कर्मी और अन्य सेवाओं से सेवानिवृत कर्मियों की नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया का भी प्रारूप तैयार करे।
कैबिनेट बैठक में दिल्ली लोकायुक्त कानून पर भी चर्चा हुई, लेकिन अभी विभागों से आई आपत्तियों और कानूनी पहलू परखने में देरी के कारण मंत्री मनीष सिसोदिया ने इसमें और विलंब की संभावना जताई है।
हालांकि शुक्रवार तक ड्राफ्ट को फाइनल रूप दिए जाने का संकेत दिया है। संभव है कि इस कानून को पास करने के लिए सरकार फरवरी के दूसरे सप्ताह में विशेष सत्र भी बुलाए।
लोकायुक्त कानून में उत्तराखंड की झलक दिखेगी
दिल्ली लोकायुक्त कानून में उत्तराखंड की पूर्ववर्ती बीसी खंडूरी सरकार के लोकायुक्त की झलक दिखेगी।
कैबिनेट बैठक के बाद मंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि उम्मीद है कि शुक्रवार तक प्रारूप को अंतिम रूप दे दिया जाएगा। इसमें एक मुख्य लोकायुक्त समेत 11 लोकायुक्त के पद होंगे।
इनका चयन मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति करेगी।
सर्च समिति कम से कम 33 नाम देगी। जिसमें से 11 का चयन होगा। लोकायुक्त के दायरे में चुने हुए प्रतिनिधि के अलावा सभी सरकारी कर्मचारी, सरकार का फंड लेने वाली संस्थाएं आएंगी।
डिम्ट्स के जरिए पूर्ववर्ती सरकार को घेरने की कोशिश
वर्ष 2007 में बनी इस कंपनी की कैग ऑडिट, आरटीआई के दायरे में लाने, बिना टेंडर काम देने, प्राइवेट या सरकारी कंपनी होने जैसे सवाल उठते रहे हैं।
ये बातें भी सामने आती रही हैं कि बीआरटी कॉरिडोर समेत जो प्रोजेक्ट भी परिवहन विभाग को दिए गए उसे सफलता नहीं मिली।
इसके कैग ऑडिट से जहां तमाम बातों का खुलासा होगा, वहीं इस फैसले को शीला दीक्षित और उनके मंत्रियों को घेरने से जोड़कर देखा जा रहा है।