फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   decision to free masarat Alam taken during central rule claims letters

मोदी सरकार की सरपरस्ती में रिहा हुआ मसर्रत

Tue, 10 Mar 2015 03:54 PM IST
Updated Tue, 10 Mar 2015 03:54 PM IST
विज्ञापन
decision to free masarat Alam taken during central rule claims letters

कट्टर अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की रिहाई का फैसला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने नहीं लिया था। बल्कि मुफ्ती की सरकार बनने से पहले ही राज्यपाल शासन में मसर्रत की रिहाई के फैसले मोहर लगा दी गई थी।

विज्ञापन


मसर्रत की रिहाई के संबंध में जम्मू-कश्मीर के गृह सचिव सुरेश कुमार और जम्मू के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के बीच फरवरी में पत्राचार हुआ था। उस पत्राचार में ही मसर्रत को हिरासत में रखे जाने के आदेश को निरस्त करने की जानकारी दी गई थी। हिरासत के आदेश निरस्त करने की फैसला गृह और कानून एवं न्याय मंत्रालय की सहमति से लिया गया।
विज्ञापन


उल्लेखनीय है कि राज्यपाल शासन अथवा राष्ट्रपति शासन में संबंधित राज्य की सत्ता परोक्ष रूप से केंद्र सरकार के ही नियंत्रण में होती है। इसलिए मसर्रत की रिहाई का फैसला केंद्र सरकार का ही फैसला माना जा सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

कांग्रेस ने मोदी सरकार पर किया हमला

decision to free masarat Alam taken during central rule claims letters

सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में कहा था कि मसर्रत की रिहाई के मामले में केंद्र सराकार को अंधेरे में रखा गया। जम्मू-कश्मीर की मुफ्ती मोहम्मद सईद सरकार को कड़ा संदेश देते हुए मोदी ने कहा था कि ऐसी हरकत को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। देश की एकता और अखंडता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

हालांकि मंगलवार को मसर्रत की रिहाई के फैसले में राज्यपाल शासन की भूमिका सामने आने के बाद कांग्रेस ने मोदी सरकार पर तगड़ा हमला बोल दिया।

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने ट्विटर पर कहा कि मसर्रत आलम की रिहाई के लिए जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मोहम्मद सईद को क्यों दोषी ठहाराया जा रहा है, जबकि ये फैसला राज्यपाल शासन में लिया गया था और राज्यपाल स‌ीधे मोदी सरकार के नियंत्रण में था।

गृह सचिव ने डीएम को लिखी थी चिट्ठी

decision to free masarat Alam taken during central rule claims letters

मसर्रत आलम की रिहाई को लेकर दो पत्र सामने आए हैं। पहला पत्र जम्‍मू-कश्मीर के गृह सचिव सुरेश कुमार और जम्‍मू के ‌डिस्ट्रिक्‍ट मजिस्ट्रेट को चार फरवरी को लिखा था।

उस पत्र में गृह सचिव ने डिस्ट्रिक्‍ट मजिस्ट्रेट ने कहा है कि अलगाववादी (मसर्रत आलम) को जन सुरक्षा कानून के तहत सितंबर में हिरासत में रखने को जो आदेश दिया गया था, वह निरस्त हो चुका है, क्योंकि गृहमंत्रालय (राज्य) ने उस पर सहमति नहीं जताई है।

पत्र में कहा गया है कि आदेश पर सहमति देने के लिए आवश्यक 12 दिनों की समय सीमा पहले ही खत्म हो चुकी है। इसलिए कानून की नजर में हिरासत में रखने का आदेश गैर जरूरी हो गया।

गृह सचिव ने पत्र में ये जरूर कहा कि अलगाववादी को नए अधार पर हिरासत में लिया जा सकता है। हालांक‌ि डिस्ट्रिक्‍ट मजिस्ट्रेट नए आधार पर हिरासत में रखने के बजाय एसपी को लिखे पत्र में मसर्रत को रिहा करने के आदेश दिया हैं।

15 और अलगाववादियों के रिहाई संभव

decision to free masarat Alam taken during central rule claims letters

गृह सचिव और डिस्ट्रिक्‍ट मजिस्ट्रेट के बीच पत्राचार फरवरी में हुआ है, जबकि मुफ्ती मोहम्‍मद सरकार एक मार्च को सत्ता में आई थी।

हालांकि पूरे मामले में आश्चर्यजनक पहलू यह है कि मसर्रत के मामले में बीजेपी मुफ्ती पर हमलावर रही है, जबकि फैसला उसी की सरकार के शासन के दरम्यान लिया गया। और मुफ्ती मोहम्मद सईद, ये जानते हुए कि मसर्रत की रिहाई की फैसला उनकी सरकार का नहीं है, चुप्पी साधे रहे और कश्मीरी अलगाववादी नेताओं की वाहवाही लूटते रहे।

एक रिपोर्ट के मुताबिक कश्मीर में कुल 145 राजनीतिक कैदी हैं, जिनमें 15 की रिहाई संभावित है। काबिले गौर ये है कि मसर्रत आलम पर हो रहे हंगामे के बाद भी मुफ्ती सरकार उनकी रिहाई के फैसले पर आगे बढ़ती है या नहीं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed