फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   debate between kiran bedi and arvind kejriwal

बीजेपी को क्यों पसंद नहीं आया केजरीवाल का अमेरिकन दांव?

Wed, 21 Jan 2015 01:16 PM IST
Updated Wed, 21 Jan 2015 01:16 PM IST
विज्ञापन
debate between kiran bedi and arvind kejriwal

अमेरिकन स्टाइल में चुनाव लड़ना हिंदुस्तानी सियासतदानों की पुरानी तमन्ना रही है। नरेंद्र मोदी ने पिछले लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया और 3डी भाषणों के जरिए आम अवाम को अमेरिकी स्टाइल के जलवे दिखाए भी।

विज्ञापन


नरेंद्र मोदी और बीजेपी को उन्हीं के हथियारों के जरिए मात देने की कोशिश में लगी आम आदमी पार्टी ने भी दिल्ली विधानसभा चुनावों में अमेरिकन स्टाइल का दांव चला है। आप मुखिया अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार को भाजपा की नवनियुक्त मुख्यमंत्री प्रत्याशी किरण बेदी को बहस की चुनौती दी है।
विज्ञापन


हालांकि किरण बेदी बहस के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने कहा है कि वे अरविंद केजरीवान से बहस करेंगी, लेकिन विधानसभा में, जबकि केजरीवाल की मांग है कि दिल्ली के मुद्दों पर किरण बेदी जनता के बीच बहस करें। बहस का संचालन का तटस्थ व्यक्ति करे, और उसे टीवी पर प्रसारित किया जाए।
विज्ञापन
विज्ञापन

मोदी भी हैं चुनावों में बहस के पैरोकार

debate between kiran bedi and arvind kejriwal

अरविंद केजरीवाल की मांग को कई टीवी चैनलों ने लपक लिया है, चूंकि किरण बेदी तैयार नहीं है। इसलिए बात बन नहीं पा रही है। सोशल मीडिया समेत आम बहसों में ये सवाल तेजी से घूम रहा है कि किरण बेदी को बहस से एतराज क्यों है?

चुनावों में बहस के पैरोकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी रहे हैं। 2013 में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विकास और सुशासन पर बहस की चुनौती दी थी।

15 अगस्त यानी स्‍वतंत्रता दिवस को लाल किले की प्राचीर से ‌‌‌दिए मनमोहन सिंह के भाषण की धज्जियां उड़ाते हुए उन्होंने उसी दिन भुज में आयोजित राज्य सरकार के स्वंतत्रता दिवस समारोह में कहा था कि गुजरात और देश के विकास में प्रतियोगिता होने दीजिए। प्रधानमंत्री (मनमोहन सिंह) मुझसे विकास और सुशासन पर बहस कर लें।

मोदी ने मनमोहन को जब चुनौती दी थी, तब तक भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार भी नहीं बनाया था।

किरण बेदी भी हैं बहस की पुरानी समर्थक

debate between kiran bedi and arvind kejriwal

वैसे केजरीवाल से बहस का विरोध कर रहीं किरण बेदी चुनावों में बहस की विरोधी नहीं हैं।

इन दिनों किरण बेदी के पुराने ट्वीट्स की खुदाई में व्यस्त कुमार विश्वास ने मंगलवार को ऐसे ट्वीट्स ढूंढ़ निकाले, जिसमें उन्होंने कामना की थी कि जैसे अमेरिकन चुनावों में डेमोक्रेट बराक ओबामा और रिपब्लिकन मिट रोमनी बहस कर रहे हैं, वैसे बहस कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और भाजपा अध्यक्ष नीतिन गडकरी के बीच भी होनी चाहिए। राष्ट्रपति चुनावों में उन्होंने ऐसी ही इच्छा प्रणब मुखर्जी और पीए संगमा के लिए व्यक्त की थी।

किरण बेदी तीन अक्टूबर, 2012 को ‌ट्वीट किया था, कल्पना क‌रिए सोनिया (गांधी) और (न‌ीतिन) गडकरी के बीच एक बहस की। दो प्रमुख पार्टियों के नेता, बिलकुल उसी तर्ज पर जैसे टीवी पर (बराक) ओबामा ओर मिट (रोमनी) कर रहे हैं।



प्रणब और संगमा के बीच बहस चाहती थी बेदी

debate between kiran bedi and arvind kejriwal

22 जून, 2012 को किए एक ‌ट्वीट में किरण बेदी ने कहा कि (पीए) संगमा ने प्रणब (मुखर्जी) को टीवी पर खुली बहस की चुनौती दी है, जो बिलकुल ठीक है। हमारी भी यही मांग है। उस‌ ट्वीट में उन्होंने मीडिया से मुद्दे को तूल देने की मांग भी की और कहा कि मीडिया बहस के लिए किसी एंकर की पहचान भी करे।

राष्ट्रप‌ति चुनावों में पीए संगमा ने कांग्रेस प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। मंगलवार को ऐसी बहस की मांग किरण बेदी से की गई तो उन्होंने उसे ड्रामा करार दिया। बेदी के बचाव में कमान संभालने वाले भाजपा प्रवक्ताओं ने भी बहस की मांग को ड्रामा करार दिया।

भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा‌ कि आम आदमी पार्टी बहस के जरिए नया ड्रामा करना चाहती है। आप ड्रामा करती है, जबकि भाजपा डिलवरी में विश्वास करती है।



बीजेपी को अब बहस में दिख रहा ड्रामा

debate between kiran bedi and arvind kejriwal

बहस न करने के सवाल पर भाजपा प्रवक्ता अनील बलुनी ने कहा कि आम आदमी पार्टी का पूरा प्रचार मीडिया-सेंट्रिक है और मीडिया के जरिए प्रचार पाने लिए वे बहस की मांग कर रहे हैं। बलूनी ने कहा कि बहस के जरिए आम आदमी पार्टी बीजेपी का एजेंडा सेट करने की कोशिश कर रही है। और भाजपा आप के एजेंडे पर काम नहीं करेगी।

यही सवाल जब भाजपा के एक अन्य प्रवक्ता नलिन कोहली से किया गया तो उन्होंने कहा कि चुनावों बस 15 दिन बचे हैं, ऐसे में बहस कैसे हो सकती है। उन्होंने कहा कि ये आम आदमी पार्टी का मीडिया में प्रचार पाने का नया हथकंडा है।

वैसे दिल्‍ली चुनावों में बहस हो या ना हो लेकिन किरण बेदी के इनकार से सोशल मीडिया ने भी बहस-समर्थक एक नेता को जरूर खो दिया है। अब शायद ही वो बड़े नेताओं की बहस की मांग में ट्वीट करें। जानकार भी इस बात से आहत हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed