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विश्व में पहली बार जिंदा इंसान में लगा 'मृत' हृदय

Sat, 25 Oct 2014 12:23 PM IST
एजेंसी/सिडनी
एजेंसी/सिडनी Updated Sat, 25 Oct 2014 12:23 PM IST
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dead heart transplanted first time in world.

भारतीय मूल के डॉक्टर समेत ऑस्ट्रेलियाई डॉक्टरों की एक टीम ने शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी हासिल की। इन डॉक्टरों ने ‘मृत’ हृदय को दोबारा सक्रिय कर जीवित मरीज में प्रत्यारोपित करने में सफलता हासिल की है। इसे दुनिया का पहला मृत हृदय प्रत्यारोपण माना जा रहा है।

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इस सफलता से दुनिया में महत्वपूर्ण अंगों को दान करने की दिशा में बड़े बदलाव की उम्मीद है। अभी तक प्रत्यारोपण के लिए ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती थी, जिसका हृदय तो धड़कता था लेकिन वह दिमागी रूप से मृत (ब्रेन डेड) होता था।
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इस सफलता को बहुत बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे प्रत्यारोपण के लिए मौजूद हृदयों के पूल में बढ़ोतरी की उम्मीद है। सिडनी के सेंट विंसेंट अस्पताल के हार्ट लंग ट्रांसप्लांट यूनिट के निदेशक प्रोफेसर पीटर मैकडोनाल्ड का कहना है कि इस सफलता का मतलब है कि हम और भी मृत हृदयों को जिंदा कर प्रत्यारोपित कर सकते हैं। वर्षों से अंग दानदाताओं के नहीं मिलने से कई मुश्किलें आती रही हैं।
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उन्होंने बताया कि अस्पताल में अब तक ऐसे तीन हृदयों को प्रत्यारोपित किया जा चुका है जो धड़कना बंद कर चुके थे और दानदाता से मरणोपरांत लिए गए थे। प्रत्यारोपण में ऐसे हृदयों का इस्तेमाल किया गया जोकि 20 मिनट पहले मृत घोषित किए जा चुके थे।

तस्वीरें साभार: http://www.theaustralian.com.au/

इस कामयाबी की पहली मरीज हैं मिशेल

dead heart transplanted first time in world.

इस सफलता को हासिल करने वाली डॉक्टरों की टीम का हिस्सा रहे भारतीय मूल के कुमुद धीतल ने बताया कि जब पहली सर्जरी सफल हुई तो वह उछल पड़े थे। उन्होंने कहा कि यह सब नई तकनीक की वजह से संभव हुआ। अभी तक हृदय ही ऐसा अंग था जिसे उसके सांस लेना बंद करने के बाद दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था। इसके अलावा दिमागी रूप से मृत (ब्रेन डेड) व्यक्ति के हृदय का ही इस्तेमाल किया जाता था, जिसे करीब चार घंटे तक बर्फ (आइस) में रखा जाता था और उसके बाद जरूरतमंद व्यक्ति में प्रत्यारोपित किया जाता था।

मिशेल ग्रिबिलर (57) पहली ऐसी मरीज हैं जिनमें मृत हृदय का प्रत्यारोपण किया गया। इस प्रत्यारोपण से पहले उनकी दो बार सर्जरी की गई। ग्रिबिलर ने बताया कि वह अब खुद में पूरी तरह से बदलाव महसूस करती हैं। उन्होंने कहा कि वह अब खुद को 40 साल की महिला मानती हैं। सर्जरी से पहले वह 100 मीटर भी नहीं चल पाती थीं लेकिन अब 3 किमी तक रोजाना चलती हैं।

ये प्रक्रिया अपनाई गई
प्रत्यारोपण के दौरान मृत हृदय को मशीन में विशेष सॉल्यूशन में रखा जाता है। इसे एक्स वाइवो आर्गन केयर सिस्टम (ओसीएस) कहा जाता है। ओसीएस के कारण मृृत हृदय दोबारा धड़कने लगता है। इससे पूर्व मृत ह्रदय को शरीर से बाहर निकालने के बाद एक विशेष ढांचे में रखा जाता है जहां इसे रक्त और ऑक्सीजन की शिराओं से जोड़ दिया जाता है। धीरे धीरे हृदय में रक्त और ऑक्सीजन का संचार होता है और वह धड़कना शुरू कर देता है। हृदय का तापमान शरीर के तापमान पर आ जाने के बाद ऑक्सीजन की कमी के कारण हृदय को हुए नुकसान को ओसीएस से दूर किया जाता है और प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।

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