...और इन बेटियों के हौसले से हारीं मुश्किलें

अभयानंद कृष्ण/ अमर उजाला, गोरखपुर Updated Mon, 20 Jan 2014 12:06 PM IST
daughters freshly crashes Difficulties
सातवीं की पढ़ाई के दौरान एक कॉलेज में वॉलीबॉल का टूर्नामेंट देख प्रियंका के भीतर इस खेल के प्रति पहली बार ललक जगी, लेकिन जंगल के किनारे बसे इस पिछड़े गांव के हालात ऐसे थे कि उसे अपनी यह इच्छा जताने से पहले भी कई बार सोचना था।

जिस स्कूल में पढ़ती थी वहां अन्य खेल तो होते थे, लेकिन वॉलीबॉल नहीं। गांव के खेल मैदान पर युवकों का कब्जा था। प्रियंका ने अपनी इच्छा सहेलियों से साझा की। फिर स्कूल में वॉलीबॉल आया और दोपहर की छुट्टी अभ्यास का मौका बनी। अब प्रियंका वॉलीबॉल की राष्टीय स्तर की प्रतियोगिता में शामिल हो चुकी है।

महराजगंज जनपद के फरेंदा क्षेत्र में उदितपुर पिपरौली गांव की प्रियंका खेतिहर मजदूर राजेश की बड़ी संतान है। एक बहन और एक भाई की दीदी प्रियंका वर्ष 2010 में अपने कस्बे के एक इंटर कॉलेज में वॉलीबॉल का मैच देखने गई थी।

वहां उसे लगा कि वह भी इस खेल में अच्छा प्रदर्शन कर सकती है, लेकिन उसके सामने मुश्किलें थीं। उन्हीं मुश्किलों के बीच उसने अपनी कोशिश शुरू की, लेकिन बिना किसी कोच और नियमित अभ्यास के उसकी शुरुआती कोशिश धराशायी हो गई।

पंचायत युवा क्रीड़ा अभियान (पायका) के तहत आयोजित वर्ष 2010 और 11 की प्रतियोगिताओं में उसे छांट दिया गया, लेकिन 2012 में उसने स्पोट्र्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित राष्टीय प्रतियोगिता के तहत अंडर-18 में खेलने का मौका मिल गया। इसके पहले राज्य स्तर पर वह यूपी की छठवें नम्बर की खिलाड़ी बन चुकी थी।

प्रियंका से प्रेरित होकर उसके पड़ोस में रहने वाली दसवीं की छात्रा अंशु ने भी इस क्षेत्र में कोशिश शुरू की और इस वर्ष 'पायका' के अंडर-16 में राज्य स्तर तक पहुंची।

अंशु के पिता सुभाष चंद मौर्या छोटे किसान हैं और पारिवारिक पृष्ठभूमि अशिक्षा और तंगी में जकड़ी। माहौल भी पहले जैसा ही है, लेकिन इन दोनों को अपने लक्ष्य के पहले ठहरना गवारा नहीं है।

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