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'नौकरशाही के जंगल' में फंसा एक दलित स्कूल

Sat, 15 Aug 2015 07:23 AM IST
Updated Sat, 15 Aug 2015 07:23 AM IST
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dalit school in forest

इनमें सबसे बड़े बच्चे की उम्र 13 साल और बाकी की उम्र 10 से 12 के बीच है। और अंग्रेज़ी टीवी चैनलों पर बहसों को छोड़ दें तो, स्कूल डिबेट से ज़्यादा कुछ ही चीजें बोरिंग होती हैं। आमतौर पर, ‘गांधी अभी भी प्रासंगिक हैं’ जैसे विषय पर 14-16 साल की उम्र के बहुत अच्छे अंग्रेज़ी वक्ता वाद-विवाद करते मिल जाएंगे।

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अगर आप स्कूली डिबेट के ऐसे ही कार्यक्रम में मुख्य अतिथि हों तो आप अपनी उबासी दबाते हैं और कार्यक्रम ख़त्म होने का इंतज़ार करते हैं। लेकिन यहां मैं अपनी कुर्सी पर सतर्क बैठा था। ये 10-13 साल के ये बच्चे जेनेटिकली मॉडिफ़ाइड फ़सलों पर वाद-विवाद कर करे थे। दोनों पक्ष प्रतिभाशाली थे। हर वक्ता अपने विषय के बारे में अच्छी तरह जानता था और मुद्दे को लेकर गहरे से जुड़ा हुआ था।
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भाषण की विषय वस्तु, गुणवत्ता और जोश-सुनने और देखने लायक था। वाद विवाद अक्सर तीखे और तार्किक थे लेकिन बेहद संयत तरीक़े से। गोल्डेन राइस, विटामिन की कमी, फसलों को लगने वाले कीट, आर्गेनिक फॉर्मिंग, क्राई जीन्स, उल्टा परागण और प्रदूषित फसलें। ये नाम भले ही किसी और ने दिए, लेकिन इनकी जांच पड़ताल इन बच्चों ने की।
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बहस की संचालक वाकई संयमित और बेहद दृढ़ थीं। वो एक स्टॉप वॉच के साथ बैठीं और वक्ता अभी अपना वाक्य ख़त्म भी नहीं कर पाए थे कि उन्होंने समय ख़त्म होने की घोषणा कर दी। यहां शामिल अधिकांश वक्ता पहली पीढ़ी के अंग्रेज़ी भाषी हैं। हालांकि उन्होंने इस भाषा में अपने तर्क धाराप्रवाह रखे।

ट्योटा और होंडा का मतलब?

dalit school in forest

तमिलनाडु के विद्या वनम् स्कूल में ‘प्रोजेक्ट डे’ का थीम चावल था। और मैं इन स्कूली बच्चों से ऐसी ऐसी बातें जान पाया, जो मुझे पहले पता नहीं थीं। मैं नहीं जानता था कि ऑटोमोबाइल संस्कृति का प्रतीक ट्योटा शब्द खेती किसानी से निकला था।

नहीं जानता था कि मूल शब्द ट्योडा है और इसका मतलब होता है ‘उपजाऊ’ या ‘धान के सुंदर खेत।’ या मैं ये नहीं जानता था कि कंपनी की शुरुआत करने वालों ने खेती किसानी के इस सादगी भरे शब्द से खुद को अलग करने के लिए ‘डी’ को ‘टी’ से बदल दिया। मैं ये भी जानता था कि होंडा का मतलब होता है ‘असली धान के खेत’ या ‘धान के खेतों का स्रोत।’

और अगर आप ये दावा करने जा रहे हैं कि आप जानते थे कि नाकासोन का मतलब होता है ‘जड़ का मुख्य तना’ या फ़ुकुदा का मतलब होता है ‘धान से भरा खेत’ तो मुझे माफ़ करिए। मैं भी नहीं जानता था। हालांकि ये बच्चे जानते थे। प्रोजेक्ट डे पर अपनी वार्षिक प्रदर्शनी में इन विषयों पर इन्होंने पोस्टर और स्केच बना रखे थे।

धान के खेत

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इन छोटे बच्चों ने मुझे वो पांच छोटे खेत भी दिखाए जिनमें ये धान उगा रहे थे। उन बच्चों ने हमें धान की तमाम क़िस्मों और इनके तैयार होने के विभन्न चरणों के बारे में बताया। इनके साथ कोई शिक्षक नहीं था और न ही इन्हें कोई बता रहा था। इनमें से कुछ बच्चे सीमांत किसानों और भूमिहीन मज़दूरों के थे।

प्रोजेक्ट डे ख़ास है। बहुत से ग़रीब और अनपढ़ अभिभावक ये देखने के लिए आते हैं कि ऐसे स्कूल में उनके बच्चों ने क्या सीखा, जहां निर्धारित किताबें नहीं पढ़ाई जातीं। विद्या वनम् का मतलब है ‘जंगल में सीखना।’ और यहां यही हो रहा है। कोयंबटूर से कोई 30 किलोमीटर दूर, तमिलनाडु-केरल की सीमा से लगी पहाड़ियों में स्थित अनईकट्टी के इस स्कूल में क़रीब 350 छात्र पढ़ते हैं।

ये सभी बच्चे इरुला आदिवासी, आदि द्रविदार और पिछड़ा वर्ग के समाज से आते हैं। इनके लिए एक स्कूल बस है, हालांकि दूर दराज से कुछ छात्र साइकिल या पैदल ही स्कूल आते हैं क्योंकि वो ऐसे गांवों में रहते हैं जहां बसें नहीं पहुंच सकतीं।

आदिवासी बच्चों का स्कूल

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विद्या वनम इरुलाओं के बीच इतना लोकप्रिय हो चुका है कि कुछ परिवार तो स्कूल के पास के गांव में रहने आ गए हैं। नौ साल पहले प्रेमा रंगचारी द्वारा स्थापित किए गए इस स्कूल में किंडरगार्टन से लेकर आठवीं तक की कक्षाएं चलती हैं। यह द्विभाषी स्कूल है। वो कहती हैं, “यहां बच्चे आठ साल की उम्र तक तमिल और अंग्रेज़ी, दोनों भाषा में पढ़ते हैं।

उसके बाद हम अंग्रेज़ी पर ज़्यादा ध्यान देते हैं।” वो बताती हैं, “जब हमने यहां एक स्कूल बनाने को लेकर बात की तो इरुला आदिवासियों की यही मांग थी। उन्हें लगता था कि अंग्रेज़ी की कमी के कारण उनके बच्चे, अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में पढ़ने वाले संपन्न घरों के बच्चों से पिछड़ जाएंगे।” ये अभिभावक ऐसे स्कूलों के ख़र्चे कभी नहीं उठा सकते।

विद्या वनम् आदिवासी और दलित बच्चों के लिए पूरी तरह फ़्री है। स्कूल में आधे बच्चे ऐसे ही हैं। जबकि बाकी बच्चे प्रति माह 200 रुपए फ़ीस देते हैं। 73 साल की रंगचारी इस स्कूल की संस्थापक प्रिंसिपल और निदेशक हैं। छात्र उन्हें पाती (दादी) कहकर पुकारते हैं। स्कूल परिसर में उनके घर की दीवार पर लगे साइनबोर्ड पर लिखा है; पाती वीड़ू (दादी का घर)

उन्होंने मुझे प्रोजेक्ट डे आयोजन का मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया था ताकि मैं विद्यार्थियों, उनके माता पिता से बात करूं और प्रदर्शनी देखूं। मैंने पहले प्रदर्शनी देखने की बात कही और देखा।

बिना जाने कि वो कितना जानते हैं, उन बच्चों से बात करने का आमंत्रण खुद को मूर्ख बनाने जैसा था। 15 से 20 अलग अलग सेक्शन में बंटी और एक बड़े से हॉल में लगी इस प्रदर्शनी ने मुझे इस मुश्किल से बचा लिया।

विद्या वनम् के बच्चे

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यहां पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन से भी शिक्षक हैं, जो कला की कक्षाएं लेते हैं। इसके अलावा अन्य राज्यों और विदेशों से भी स्वयंसेवी शिक्षक हैं, जो विद्या वनम् में एक साल तक अपना समय देते हैं।

ये सारा कुछ विद्यार्थियों को विभन्न संस्कृतियों को सीखने में मददगार होता है। जो बच्चे, जिनमें से अधिकांश ने कोयंबटूर ज़िले से बाहर कदम भी नहीं रखा, उन्होंने गाना गया, डांस किया और भारत के बिल्कुल अलग-अलग हिस्सों के लघु नाटक किए। प्रोजेक्ट डे पर दर्शकों में अधिकांश ग़रीब अभिभावक हैं, जिन्होंने शायद एक दिन की अपनी मज़दूरी गंवा दी है।

यह अजीब लगता है कि इस स्कूल को सरकारी मान्यता नहीं मिली है। सीबीएसई से संबद्धता की कोशिशों में अड़ंगे लगते रहे हैं। हालांकि यह स्कूल अपने नवें वार्षिक सत्र में दाखिल हो चुका है लेकिन इस संस्था को सरकार की ओर से एनओसी देने से अभी तक इनकार किया जा रहा है। ताज्जुब है। और इसलिए तमिलनाडु के जंगलों में स्थित इस स्कूल को अभी भी राज्य के नौकरशाही के जंगल में अपना रास्ता तलाशना बाक़ी है।

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