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लेखकों की न सही, दलाई लामा की सुनेंगे मोदी?

Mon, 23 Nov 2015 03:22 PM IST
राजेश जोशी/रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
राजेश जोशी/रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी Updated Mon, 23 Nov 2015 03:22 PM IST
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पिछले हफ्ते लंदन में ब्रितानी पत्रकारों के कठिन और दोटूक सवालों का जवाब तलाशने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाँधी और बुद्ध का सहारा लेना पड़ा था। मोदी से भारत में बढती असहिष्णुता पर सवाल किया गया था, जिसके जवाब में उन्होंने कहा, “भारत, ये बुद्ध की धरती है। भारत, ये गाँधी की धरती है।"

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक होने के बावजूद मोदी ने न तो संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को याद किया और न ही संघ में पूज्यनीय कहे जाने वाले माधवराव सदाशिव गोलवलकर को। पर भारत को जिस बुद्ध की धरती मोदी बता रहे थे, उसी बौद्ध धर्म के सबसे बडे धर्मगुरू दलाई लामा ने बिहार विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार पर संतोष जताकर मोदी और उनके सिपहसालार अमित शाह की अच्छी-खासी किरकिरी कर डाली।
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नतीजे आने के तुरंत बाद जालंधर में हुए एक समारोह में दलाई लामा ने कहा, “बिहार चुनाव (के नतीजों) से जाहिर होता है कि ज्यादातर हिंदू अब भी सद्भाव पर भरोसा करते हैं।” इस बयान से तीन बातें स्पष्ट होती हैं। पहली, दलाई लामा मानते हैं कि बीजेपी को हराकर बिहार के वोटर ने सद्भाव और शांति के प्रति अपनी आस्था जताई है। दूसरी, प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने बिहार चुनाव के दौरान जो मुद्दे उठाए उनसे सद्भाव का माहौल खराब हुआ। और तीसरी, फिर भी बहुसंख्यक हिंदू समाज मोदी और अमित शाह के चुनाव प्रचार से प्रभावित नहीं हुआ और उसने बाँटने वाले मुद्दों को खारिज कर दिया।
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दलाई लामा आम तौर पर राजनीति पर टिप्पणी नहीं करते और न ही उनसे ये उम्मीद की जाती है क्योंकि उनको भारत में रहने की इजाजत इसी शर्त पर दी गई थी कि वो भारत की आंतरिक राजनीति में दिलचस्पी नहीं लेंगे। बीजेपी के नेताओं की इस बात में दम है कि बिहार चुनाव पर अपनी राय जाहिर करके दलाई लामा ने एक गैरजरूरी काम किया है। इससे बचा जा सकता था।

बयान के गूढ़ अर्थ हुए जाहिर

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इस मुद्दे पर बीबीसी हिंदी से एक खास बातचीत में तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रतिनिधि तेम्पा सेरिंग ने कहा, “भारत की आंतरिक राजनीति पर टिप्पणी करने की हमारी नीति नहीं है। पत्रकारों ने बार-बार परम पावन दलाई लामा से सवाल किया तो उन्होंने जवाब दिया। उनकी अँग्रेजी बहुत मजबूत नहीं है इसलिए जो वो कहना चाह रहे थे वह आशय नहीं आ पाया। ”

दलाई लामा के इस बयान पर भी बवाल नहीं मचता मगर जिस तरह मोदी और शाह ने बिहार चुनाव को निजी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया था, उससे दलाई लामा के बयान के और गूढ अर्थ जाहिर हो गए। दलाई लामा के बयान का अर्थ है कि मोदी और शाह ने वोटरों को गाय-समर्थक और गाय-विरोधियों में वर्गीकृत कर या विधानसभा चुनाव को पाकिस्तान से जोडकर ऐसा माहौल बना दिया था जिसे ज्यादातर हिंदू मतदाताओं ने पसंद नहीं किया।

लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण ये है कि दलाई लामा ने बहुसंख्यक हिंदुओं के शांतिप्रिय होने की बात कहकर दरअसल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नजरिए और राजनीति से अपना मतविरोध भी जाहिर किया है। दलाई लामा कह रहे हैं कि ज्यादातर हिंदू शांति और सद्भाव पर भरोसा रखते हैं और ये बात बिहार के चुनाव नतीजों से जाहिर होती है।

बयान को लेकर बैचेन संघ परिवार!

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बिहार में मोदी की हार पर बौद्ध धर्मगुरू की ये टिप्पणी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को माफिक नहीं आई होगी, मगर फिर भी इसे दोनों संगठनों ने ज्यादा तूल नहीं दिया। उसकी एक साफ वजह है। संघ और भाजपा बौद्ध धर्म को विराट हिंदू परिवार में ही शामिल करती हैं।

दूसरे, दलाई लामा ही वो शख्स हैं जो संघ के अलावा भारत को जगदगुरू कहते हैं। ऐसा व्यक्ति अगर बीजेपी की हार पर संतोष जताए तो संघ परिवार में बेचैनी लाजिमी है। लेकिन दलाई लामा के प्रति नरमी बरतने की सिर्फ यही एक वजह नहीं है। संघ परिवार को मालूम है कि भारत के बौद्ध समाज में दलाई लामा की पूजा की जाती है और दलितों का एक बडा हिस्सा बौद्ध है।

यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने हिंदू धर्म छोडकर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। दलितों को बहुजन समाज पार्टी और दूसरी दलित पार्टियों के प्रभाव से निकालकर संघ परिवार की विचारधारा के नजदीक लाना संघ परिवार की सोशल इंजीनियरिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये काम दलाई लामा को नाराज करके नहीं किया जा सकता। इसलिए भी बिहार चुनाव के नतीजों पर दलाई लामा का बयान संघ परिवार को बेचैन कर रहा होगा।

स्वामी आ जाते हैं सामने

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आम तौर पर संघ परिवार अपने विरोधियों को खुला खेलने की छूट कम ही देता है। मगर बीजेपी नेता और समर्थक दलाई लामा को आडे हाथों लेने की जल्दी में नजर नहीं आए। उन्होंने इसे रफा-दफा करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। अक्सर पेचीदा मामलों में जब बीजेपी सीधे-सीधे कोई साफ स्टैंड नहीं लेना चाहती, तो डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी सामने आ जाते हैं।

अचरज इस बात का है कि अपने विरोधियों को घर तक दौडा लेने के लिए मशहूर स्वामी भी दलाई लामा के प्रति काफी नरमी बरतते नजर आए। उन्होंने कहा दलाई लामा को मुद्दे की समझ नहीं है। स्वामी ने कहा “दलाई लामा इस देश में शरणार्थी की तरह आए और शर्त ये थी कि वो सिर्फ धार्मिक गतिविधियों तक ही खुद को सीमित रखेंगे।

लेकिन अगर वो भारत के आंतरिक राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करना चाहते हैं तो उन्हें भारत की नागरिकता लेनी चाहिए। ”भाजपा और मोदी के सामने असल मुश्किल ये है कि वो भीतरी असंतोष से निपटे या संघ विरोधियों के हमलों से। पार्टी के भीतर लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता तो थे ही, सार्वजनिक मंचों से अरुण शौरी जैसे लोग भी अब काँग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को याद करने लगे हैं।

उग्र हिंदुकत्व की विचारधारा

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मीडिया मे भी खुले बाजार की समर्थक तवलीन सिंह जैसे जिन पत्रकारों ने मोदी को लोकसभा चुनाव से पहले और बाद में भारत की तमाम समस्याओं की अचूक दवा बताया था, आज वो त्यौरियाँ चढा रहे हैं। क्योंकि उनके मुताबिक मोदी बाजार के दरवाजे खोल नहीं पा रहे हैं और संघ परिवार गाय को राष्ट्रीय बहस में खींच लाया है।

लेकिन ये समझना जरूरी है कि मोदी और अमित शाह लोकसभा चुनाव में सवा तीन सौ सीटों का आँकडा पार करने में विकास और अच्छे दिन का वादा करके कामयाब हुए, भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का सपना दिखाकर नहीं। पर संघ को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने हिंदू राष्ट्र के लक्ष्य को न कभी छिपाया है और न ही कभी हिंदुओं को शौर्य और पराक्रमशाली समाज में बदलने की अपनी इच्छा को ही छोडा है।

उग्र हिंदुत्व की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने वाले वीर सावरकर की संघ में बडी प्रतिष्ठा है। उन्हीं सावरकर ने भारत में ‘राजनीति के हिंदूकरण और हिंदुओं के सैन्यीकरण’ की बात कही थी। एक मजबूत और दबंग हिंदू समाज की परिकल्पना संघ के ‘पदाधिकारी’ भी करते आए हैं–एक ऐसा हिंदू समाज जो जातिभेद से परे एक मजबूत इकाई के तौर पर उभरे और भारत में इन्हीं बहुसंख्यकों का दबदबा हो।

मुद्दा बनाए रखना चाहते हैं

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हिंदुओं के प्रभुत्व और दबदबे वाले समाज की परिकल्पना करने वाले संघ के पदाधिकारियों को कई बार हिंदुओं में ‘उग्रता की कमी’ के कारण कुढन होती है। उन्होंने हिंदू समाज को कायर तक बताया है। जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 1999 में इंडियन एअरलाइंस के अपहृत विमान को तालिबान के चंगुल से छुडवाने के लिए उनके चरमपंथियों को रिहा किया, तब आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक प्रोफेसर राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया ने हिंदू समाज को कायर बताया था और सुझाव दिया था कि “विमान में भी आठ-दस युवक एक साथ खडे होकर, शोर मचाकर अपहरणकर्ताओं पर काबू पाने की कोशिश कर सकते थे। परन्तु प्राणों के भय ने सबको एक सहयात्री की हत्या पर भी उद्वेलित नहीं किया। ”

संघ जातिभेद से ऊपर एक ऐसे मजबूत हिंदू समाज का निर्माण करना चाहता है जो ‘कायर’ न हो और किसी से न दबे। संघ की इस समझ की तुलना अब बिहार चुनाव पर दलाई लामा के बयान से करें। संघ एक शक्तिशाली हिंदू समाज चाहता है और इसे हासिल करने के लिए उसने लगातार, खासतौर से इमरजेंसी के बाद से ‘हिंदू अस्मिता’ से जुडे ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिनसे समाज का एक वर्ग हिंदू विरोधी के तौर पर चिन्हित हो सके और उसके खिलाफ सामाजिक और राजनीतिक तौर पर हिंदुओं को एकजुट किया जा सके।

नब्बे के दशक में रामजन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद के विवाद को संघ परिवार ने राजनीति के एक कारगर हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया और इसके जरिए भारतीय राजनीति का ध्रुवीकरण करने और उसे एक हद कर बदलने में सफलता भी पाई। पर 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद पूरे देश को बताया जा रहा था कि हिंदुत्व के ज्वार को अब कोई नहीं रोक सकता, तभी चार राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी परास्त हो गई थी। संघ और बीजेपी की हार सिर्फ एक कारण से हुई — जातियों में बँटा हिंदू समाज। यही कारण है कि संघ जातिवाद के विरोध में खुलकर बोलता है और बार-बार इस बात का दावा किया जाता है कि संघ में जात-पाँत को नहीं माना जाता। इसे साबित करने के लिए संघ के अधिकारीगण उदाहरण देते हैं कि गाँधीजी एक बार संघ के एक सम्मेलन में आमंत्रित किए गए तो उन्होंने जातिभेद न देख कर संघ की प्रशंसा की थी।

लेकिन संघ की दिक्कत ये है कि उसे जहाँ एक ओर राजनीति का हिंदूकरण करने के लिए जात-पाँत से ऊपर एकजुट हिंदू समाज चाहिए जो एक ब्लॉक के रूप में वोट ही नहीं दे, बल्कि हिंदू मुद्दों पर तुरंत सडकों पर उतरने को तैयार हो जाए, वहीं वर्णाश्रम धर्म पर अटूट विश्वास के कारण वो ब्राह्मणों के वर्चस्व को भी बनाए रखना चाहता।

हिन्दू वोट बैंक का हिस्सा बनाना

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एक-आध अपवाद को छोडकर सभी सरसंघचालक ब्राह्मण रहे हैं। यही कारण है कि जहाँ आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत सरकारी नौकरियों में आरक्षण की समीक्षा करने की बात कहते हैं ताकि ऊँची जातियों की भावनाओं को स्वर दे सकें, वहीं चुनावी राजनीति मोदी को मजबूर करती है कि वो बिहार के दलित और पिछडी जातियों के वोटरों को बताएँ कि नीतीश कुमार और लालू यादव उनके आरक्षण का हक छीन कर 'दूसरे समुदायों' को देना चाहते हैं।

ये सीधे-सीधे जातियों में बँटे हिंदू समाज को एकजुट करके गैरहिंदुओं के सामने खडा करने की कोशिश थी। क्योंकि जातियों में बँटा हिंदू समाज ही संघ की कल्पना के हिंदू राष्ट्र की राह का सबसे बडा रोडा है। इसीलिए हिंदू समाज को एकजुट करने के लिए संघ के विचारक और बीजेपी के महत्वपूर्ण नेता रहे केएन गोविंदाचार्य ने नब्बे के दशक में सोशल इंजीनियरिंग की बात कही थी - यानी दलित, पिछडों और आदिवासियों को भाजपा के प्रभाव में लाकर उन्हें व्यापक हिंदू वोट बैंक का हिस्सा बनाना। पर अलग-अलग जातियों को संघ की छतरी के नीचे लामबंद करना तभी संभव हो सकता है जब उन्हें ये विश्वास दिलाया जाए कि दरअसल ब्राह्मण का दुश्मन राजपूत या जाटव का दुश्मन जाट नहीं बल्कि उन सबका एक सामूहिक दुश्मन है और वो दुश्मन हिंदू धर्म से बाहर है।

इसी दुश्मन की शक्ल गढने की कोशिश में संघ परिवार अलग-अलग प्रयोग करता है, इसीलिए कभी रामजन्म भूमि राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बन जाता है तो कभी किसी ईदगाह, किसी मजार या किसी मध्यकालीन इमारत को हिंदू इमारत बताकर आंदोलन छेड दिया जाता है। या फिर लव जिहाद, घर वापसी, गोरक्षा आदि मुद्दे अचानक राष्ट्रीय विमर्श में आ जाते हैं। ये सभी मुद्दे किसी ब्राह्मण, राजपूत, कुर्मी, कोइरी, दलित, यादव या आदिवासी के अपने मुद्दे नहीं हैं, बल्कि इन्हें एक सूत्र में व्यापक हिंदू समाज के मुद्दों के तौर पर चिन्हित किया जा सकता है।

बयान को गंभीरता से लेते हैं या नहीं

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पर क्या ऐसे मुद्दे उठाने के लिए सिर्फ संघ परिवार और भाजपा को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? क्या काँग्रेस वाकई धर्मनिरपेक्षता के दूध में धुली हुई है, जैसा कि कई बार काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी के बयानों से आभास होता है?एक ठोस हिंदू वोटबैंक के महत्व को संघ परिवार और बीजेपी ही नहीं, बल्कि काँग्रेस भी अच्छी तरह समझती है।

पर अपनी विचारधारात्मक साफगोई और प्रतिबद्धता के कारण बीजेपी खुलकर हिंदुओं के लिए एजेंडा तय करती है और काँग्रेस को उसी लाइन पर चलने को मजबूर करती है। वरना क्या कारण है कि दादरी में गोमांस खाने के शक में हिंदू भीड के हाथों अखलाक की हत्या के बाद छिडी बहस में काँग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह बीजेपी के साथ खडे नजर आए। उन्होंने कहा, “बीजेपी को ये समझना चाहिए कि कई राज्यों में गोहत्या पर पाबंदी काँग्रेस ने लगाई। ” दिग्विजय सिंह ने 1930 के दशक में पास किए गए एक प्रस्ताव का हवाला देते हुए कहा कि अगर बीजेपी गोहत्या पर पाबंदी का बिल लाती है तो काँग्रेस उसे पूरा समर्थन देगी।

यानी ‘सेक्युलर' काँग्रेस की एक आँख भी बहुसंख्यक हिंदू वोट बैंक पर रहती है। ये अलग बात है कि गाय को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना दिए जाने और बीजेपी-विरोधी नेताओं का गाय के मुद्दे पर जवाब तलब करने के बावजूद बिहार के वोटरों ने अपना फैसला सुना दिया। ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर है कि वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से लिए जाने वाले दलाई लामा के बयान को गंभीरता से लेते हैं या नहीं।

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