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दाभोलकर को मिली थी गांधी की तरह मारने की धमकी
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
Updated Wed, 21 Aug 2013 01:39 PM IST
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महाराष्ट्र में अंधविश्वास के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या से पहले उन्हें गांधी की तरह मारने की धमकी दी गई थी।
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पुणे में दाभोलकर की मंगलवार को दो अनजान हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। दाभोलकर उस समय सैर पर गए हुए थे।
दाभोलकर को अपने आंदोलन के खिलाफ कई बार जान से मारने की धमकियां मिल चुकी थी। उनके परिवारवालों और दोस्तों ने अनुसार उन्हें अक्सर धमकियां मिलती थीं और उनपर कई बार हथियारों और लाठियों से हमला भी किया गया। लेकिन उन्होंने पुलिस सुरक्षा लेने से मना कर दिया था।
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अंधविश्वास का विरोध किया तो सिर में मारी गोली
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टीओआई के मुताबिक नरेंद्र दाभोलकर को दक्षिणपंथी संगठनों की ओर से आखिरी धमकी यह मिली थी कि गांधी को याद करो: याद करो कि हमने उसके साथ क्या किया था।
दाभोलकर पिछले 40 साल से अंधश्रद्घा के विरुद्घ आंदोलन चलाकर लोगों को जागरूक कर रहे थे। उनकी अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति पिछले 14 बरस से अंधश्रद्धा निर्मूलन कानून बनवाने के लिए अभियान चला रही है।
डॉक्टर से सामाजिक कार्यकर्ता
नरेंद्र दाभोलकर ने डॉक्टरी से सामाजिक कार्यों का रुख किया। इस क्षेत्र में वह लागातर काम करते रहे और धीरे-धारे उनसे कई युवा कार्यकर्ता जुड़े और समर्थक बनें।
मिराज से एमबीबीएस की डिग्री लेकर दाभोलकर ने 12 साल तक चिकित्सक के तौर पर काम करने के बाद सामाजिक सेवा के क्षेत्र में आने का फैसला किया। हांलाकि इसके पहले भी वह बाबा अधव के कुछ आंदोलनों से जुड़े हुए थे।
समाज में व्याप्त अंधिवश्वास और ग्रामीणों के इससे अधिक प्रभावित होने की समस्या के निपटने के लिए उन्होंने साल 1983 में इन सामाजिक बुराइयों को खत्म करने की ठानी।
इसके लिए उन्होंने वर्ष 1989 में 'महाराष्ट्र अंधश्रद्घा निरमूलन समिति' (एमएएनएस) का गठन किया। एमएएनएस की इस समय पूरे महाराष्ट्र में 180 शाखाएं हैं।
तांत्रिक और बाबाओं की दुकान पर खतरा
पिछले दो दशकों में उन्होंने लोगों को श्रद्घा के नाम पर बरगलाने और लूटने वाले कई तांत्रिकों, बाबाओं और गुरुओं को निशाना बनाया। अंधविश्वास के खिलाफ बिल आने पर इन्हें ही सबसे अधिक नुकसान होने वाला था।
दाभोलकर पिछले 40 सालों से अंधश्रद्धा निर्मूलन कानून बनवाने के लिए कोशिश कर रहे थे। साल 2005 में उनका यह विधेयक महाराष्ट्र विधान परिषद में पेश भी हुआ, लेकिन इसे पुनर्विचार समिति के पास भेज दिया गया। बीते 8 सालों से यह विधेयक वहीं अटका हुआ है।
साथ ही वह लोगों को अंधविश्वास के संबंध में जागरुकता लाने के लिए कई कार्यक्रम भी चला रहे थे।
दाभोलकर पर्यावरण सुरक्षा को लेकर भी सक्रिय थे। वह रीति-रिवाज के नाम पर जानवरों को मारने के भी सख्त खिलाफ थे। उन्होंने समाज में फैले अंधविश्वासों उजागर करने वाली 11 किताबें भी लिखी हैं। इन किताबों में वैज्ञानिक कारण देकर अंधविश्वास पर भरोसा करने वालों को समझाने की कोशिश भी की गई है।
उनकी एक किताब 'तिमिरातुन तेजकड़े' (अंधेरे से प्रकाश की ओर) को राज्य सरकार की ओर से अवॉर्ड भी मिल चुका है।
दाभोलकर ने मराठी साप्ताहिक पत्रिका साधना के संपादक भी रहे। वह वर्ष 1998 में साधाना से तब जुड़े जब वह डूबने के कगार पर थी, लेकिन उन्होंने पत्रिका को फिर से ऊंचाइयों तक पहुंचाया।