फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   court should Be attentive in cases of rape says Supreme Court

दुष्कर्म के मामलों में चौकस रहें अदालतें: सुप्रीम कोर्ट

Fri, 12 Oct 2012 11:55 PM IST
नई दिल्ली/अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली/अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 12 Oct 2012 11:55 PM IST
विज्ञापन
court should Be attentive in cases of rape says Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दुनिया भर में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में बढ़ोतरी हो रही है। अत्याचार और दुष्कर्म के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे में बलात्कार के मामलों में न्यायपालिका को चौकस रहने की जरूरत है। सर्वोच्च अदालत ने निचली अदालतों को नसीहत देते हुए कहा है कि कमजोर आधार पर अभियुक्तों को किसी हाल में बरी न करें और बलात्कार के हर मामले में साक्ष्यों को बारीकी से परखें। कानून में तो दोषी को सख्त सजा का प्रावधान है। लेकिन अपराधी की सजा अदालतों को ही तय करनी होती है।  
विज्ञापन


जस्टिस पी सदाशिवम और जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ ने बुलंदशहर के खुर्जा के गांव कलंदर गढ़ी में दस साल पहले 11 वर्षीय लड़की की दुष्कर्म के बाद हत्या करने वाले आरोपी मुनेश को दोषी करार दिया था। पीठ ने दोषी के लिए उम्रकैद की सजा मुकर्रर करते हुए देश में लगातार बढ़ रही बलात्कार की वारदातों पर गहरी चिंता जताई है। हत्या और बलात्कार के मुजरिम को ट्रायल कोर्ट ने घटना के 11 महीने बाद ही फांसी की सजा दे दी थी। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले के आठ माह के बाद ही आरोपी मुनेश को बरी कर दिया।
विज्ञापन


हाईकोर्ट के रवैये पर सर्वोच्च अदालत ने आश्चर्य जताया है। पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 तथा 376 के तहत मुजरिम को उम्र कैद की सजा दी। उसे दो हफ्ते के अंदर आत्मसमर्पण का आदेश दिया गया है। ट्रायल कोर्ट से कहा गया है कि यदि दोषी इस अवधि में समर्पण नहीं करता तो उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया जाए।  
विज्ञापन
विज्ञापन


शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि गवाहों की ओर से पुलिस और अदालत में दिए गए बयान में अंतर के आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया। जबकि बयानों में फर्क बहुत मामूली था। अदालत को यह समझना चाहिए कि हत्या और बलात्कार के इस मामले में दो चश्मदीद गवाह हैं। गांव के दो व्यक्ति बच्ची की चीख सुनकर गेहूं के खेत पहुंचे थे।

इन दोनों लोगों ने मुजरिम मुनेश को बच्ची रोशनी का गला उसके दुपट्टे से बांधते हुए देखा। वह खेत में निर्वस्त्र पड़ी थी। गांव के दोनों लोगों ने मुनेश का पीछा भी किया लेकिन वह भागने में सफल हो गया। वारदात के दस दिन बाद उसे 14 मार्च, 2002 को गिरफ्तार किया जा सका।

सर्वोच्च अदालत ने फैसले में कहा कि हाईकोर्ट ने चिकित्सकीय परीक्षण की रिपोर्ट न आने और पुलिस की ओर से हत्या में इस्तेमाल दुपट्टा बरामद न करने पर अभियुक्त को बरी कर दिया था। लेकिन जांच में इस तरह की कमी से अभियोजन का पक्ष कमजोर नहीं होता। हाईकोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने में देरी का लाभ भी अभियुक्त को दिया। चश्मदीद गवाहों की ओर से मृतक के पिता को वारदात की जानकारी का जिक्र एफआईआर में न होने के बचाव पक्ष के तर्क पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर या प्राथमिकी विश्वकोष नहीं होती। एफआईआर वारदात की सूचना मात्र है।


एफआईआर में घटना की समूची जानकारी का होना लाजमी नहीं है। जहां तक एफआईआर में देरी का सवाल है, वारदात के सात घंटे के अंदर एफआईआर दर्ज कर ली गई। सात घंटे की देरी को पीड़ित परिवार के नजरिए से देखने की जरूरत है। एक ग्रामीण व्यक्ति की बच्ची के साथ यह वीभत्स हादसा हुआ था। पिता ने सबसे पहले बच्ची के शव को ढकने का इंतजाम किया होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed